Wednesday, February 19, 2025

शेव रात्रि के पीछे का विज्ञान

महाशिवरात्रि कि रात वो रात होती है जब सूरज धरती की भूमध्य रेखा या विषुवत रेखा (Equator) की सीध में होता है।

हमारे प्राचीन ग्रंथों में इसे विषुव कहा गया है। यह वो तारीख होती है जब पूरी धरती पर रात और दिन बराबर होते हैं। इस खगोलीय अवस्था में अपनी धुरी पर चक्कर काट रही धरती के कारण जो ऊर्जा पैदा होती है वो नीचे की तरफ से ऊपर की ओर बढ़ती है। विज्ञान की भाषा में इसे अपकेंद्रीय बल या centrifugal force कहा जाता है। 

हमारा शरीर भी इस ब्रह्मांड और धरती का ही हिस्सा है। इसलिए अगर इस दिन हम अपने शरीर को सीधा रखें जैसे कि योग की मुद्रा में बैठे या खड़े रहें तो हमें शिव की ऊर्जा मिलती है। यही कारण है कि महाशिवरात्रि के रात्रि में सोने से मना किया जाता है और रात भर लोग जागरण करते हैं। ऐसा करने के पीछे जो मंशा है वो यह कि व्यक्ति की रीढ़ की हड्डी झुकी हुई नहीं, बल्कि सीधी होनी चाहिए ताकि वो ऊर्जा के इस प्रवाह का पूरा लाभ उठा सके। ऊर्जा के इस प्रवाह के कारण ही महाशिवरात्रि को जागृति अथवा चेतना की रात भी कहा जाता है। ब्रह्मांड से जुड़ा यह विज्ञान भारतीयों को हजारों साल से पता था और वो इस दिन को महाशिवरात्रि के रूप में मनाते थे। आधुनिक विज्ञान के लिए यह ज्ञान महज कुछ सौ साल ही पुराना है।

वास्तव में महाशिवरात्रि एक खगोलीय अवसर है जब हम ब्रह्मांडीय ऊर्जा का अपने शरीर और जीवन में संचार कर सकते हैं। लेकिन आम लोगों की समझ के लिए इसे कुछ धार्मिक परंपराओं और कथा कहानियों के साथ भी जोड़ा गया है। ये कहानियाँ भी किसी न किसी सत्य की तरफ़ इशारा कर करता हैं। उदाहरण के तौर पर कहा जाता है कि इसी दिन सृष्टि की रचना का काम शुरू हुआ था। पुराणों के अनुसार इस दिन अग्निलिंग का उदय हुआ था जो आगे चलकर सृष्टि की उत्पत्ति का कारण बना। इसी अग्निलिंग के सिद्धांत को आधुनिक विज्ञान में बिग बैग जैसे नामों से पुकारा जाता है। महाशिवरात्रि का संबंध समुद्र मंथन की कथा से भी है। ये वो दिन है जब समुद्र से विष निकला था और भगवान शिव ने विष का पान करके सृष्टि को बचाया था।

महाशिवरात्रि के दिन, शिव तत्व  का पृथ्वी संपर्क से होता है। जो हमारी चेतना और हमारा आभामंडल भौतिक स्तर से कुछ 10 इंच ऊपर होता है और महाशिवरात्रि के दिन ब्रह्माण्डीय चेतना पृथ्वी तत्व  को छूती है। मौन में रहने का या अपनी चेतना के साथ रहने का यह सब से उत्तम समय होता है। इसलिए महाशिवरात्रि का उत्सव साधक के जीवन में विशेष महत्व रखता है। यह भौतिकता और अध्यात्म के विवाह का समय है। जिसने स्थितिज और गतिज ऊर्जा का परिणय होता है। जिसके कारण बल, शक्ति और क्रिया का सिद्धांत आया।


Friday, December 27, 2024

त्रिनेत्र तपस्या..?

तीसरी आंख थर्ड आई दिव्य चक्षु..
      तीसरी आंख के जाग्रत होने पर ब्रह्मांड में कार्य करने वाले बहुत से नीति नियमों का ज्ञान हो जाता है जैसे कि "आ कर्षण का नियम् " !  यह नियम् कैसे कार्य करता है तब ही अच्छे से समझ में आता है जब तीसरी आंख पूरी जाग्रत हो उससे पूर्व व्यक्ति इसको समझने का बहुत प्रयास करता है किंतु सही तरीके से समझ नहीं पाता न ही इसका उपयोग नहीं कर पाता है ! 
 जानते हो ऐसा क्यों होता है ..??? सोचो ..सोचो खूब सोचो..
   क्योंकि वह जो कुछ भी इसके द्वारा पाना चाहता है वह सब वही होता है जो भौतिक आंखें दिखाती हैं लेकिन यह नियम् हमारी दोनों आंखों का प्रयोग नहीं वरन् यह तो "तीसरी आंख का नियम् है और उसी से संबंधित है ! ये आ कर्षण का नियम् वह नहीं देता है जो आप मांगते हो अपितु वह देता है जिसको पाने के लिए स्वयं को तैयार किए हो ! 

 तो जब भी किसी की तीसरी आंख जाग्रत हो जाती है तो ऐसे व्यक्ति को कमाल की कल्पना शक्ति और रचनात्मक शक्ति दे देती है जिसकी माध्यम से वह बहुत कुछ ऐसी रचना कर पाता है जिसे देख सुन और महसूस करके लोग आश्चर्यचकित रह जाते हैं और खुशी से भर जाते हैं ! उसी से वे नाम प्रसिद्धि प्रेम सब कुछ पा जाते हैं ! ( आपने बहुत से उदाहरण देखे होंगे उनका नाम लेना उचित नहीं ...)

तो जब भी किसी व्यक्ति की तीसरी आंख पूरी तरह से जाग्रत हो जाती है तो उसकी चेतना समय और जीवन के कई सारे आयाम से सीधा ही कनेक्ट होने के साथ साथ बहुत सारी प्रेरणा - उत्साह पाने लगती है ! व्यक्ति बहुत सी संभावनाओं से भर जाता है ! व्यक्ति किसी भी दूसरे के बारे में बिल्कुल सटीक भविष्यवाणी करने में सक्षम हो जाता है क्योंकि ऐसा व्यक्ति  किसी घटना को घटने से पूर्व शुरुआती से आंकलन लगाने में सफल होने लगते हैं कि क्या क्या घटने वाला हैं ! जिससे वो स्वयं को और साथ ही साथ दूसरों को अनचाही मुसीबतों से बचाने में सफल हो जाता  हैं ! कुछ लोग तो इतने ताकतवर भी बन जाते हैं कि घर ऑफिस विवाह समारोह आदि में घुसते ही या किसी का फेस लुक देखते ही उसके औरा एनर्जी मानसिक स्थिति आदि का भी बिल्कुल सही से अंदाजा लगा लेते हैं बल्कि यह कहना ज्यादा सही रहेगा कि इन लोगों को स्वयं ही यह सब कुछ पता चल जाता है ! ( उदाहरण बहुत है आपने अवश्य ही देखा सुना होगा ऐसे लोग भी इस पटल पर हैं )

गहनता से समझें :--  जब भी किसी की थर्ड आई पूर्ण रूप से सक्रिय हो जाती है तो ऐसे लोग ऐसी ऐसी चीजों को देखने और महसूस करने लगते हैं जो कि साधारण आंखों से दिखाई ही नहीं देती है , जैसे कोई कोई व्यक्ति आत्माओं के संसार से जुड़ जाता है जिस संसार में आत्माएं अपने सूक्ष्म रूप में रहती है ! ऐसा व्यक्ति हर तरह के व्यक्ति की आत्मा से सही से संपर्क कर पाता है और उसको कुछ करने का आदेश तक भी भेज सकता है जिसको सामने वाली आत्माओं को पालन भी करना पड़ता है ! जो लोग अपनी  तीसरी आंख के चलते आत्माओं के संसार से कनेक्ट हो जाते हैं तो ये लोग ऐसे होते हैं जिनसे बुरी आत्माएं भयभीत होने लगती है ( ऐसे भी कुछ लोग आपको इसी पटल पर मिल जाएंगे यदि ढूंढोगे सर्च करोगे तो ही ) !

 तो जब भी किसी की थर्ड आई पूरी तरह से जागृत हो जाती है  तो ऐसे व्यक्ति को पहली बार महसूस होने लगता है कि यह ब्रह्माण्ड एक विशेष प्रकार की ऊर्जा बना हुआ है और उसी पर कार्य करता है प्रत्येक चीज़ अपनी फ्रीकवेंसी पर कार्य कर रही है ! इसी कारण इस बात पर जोर दिया जाता है कि आपको भी अपनी फ्रीकवेंसी को बदलना आना चाहिए जिसकी सहायता से कोई भी व्यक्ति एक ही मिनट में कई सारी एनर्जी और वाइब्रेशंस को महसूस कर सकता है ! अपने माइंड को शरीर पर तुरंत ही अलग-अलग प्रभाव दे सकता है !  लेकिन यह सब कैसे होगा आने वाले लेख में समझेंगे ..!!

Wednesday, November 6, 2024

मानस जाप अनहद जागृति

शिव: शक्तया युक्तो यदि भवति शक्त: प्रभावितं
न सीदेवं देवो न खलु कुशल: स्पंदितुमपि ।
अतस्त्वामाराद्यं हरिहरवीर्यंकादिभिरपि
प्राणन्तुं स्तोतुम् वा कथाकृतपुण्यः प्रभावति ।।
जब तुम मानस जाप करते हो तो विचार ज्यादा तेजी से पैदा होते हैं। मन इस प्रकार के काम से छटपटाएगा ही। 
मन से जाप का तरीका ये है कि शरीर में किसी प्रकार का स्पंदन न हो, होंठ नहीं हिलेंगे, कंठ में हलचल नहीं होना चाहिए, जिह्वा में किसी प्रकार का बेचैनी नहीं होनी चाहिए। ये थोड़े से अभ्यास से आ जाएगा। 
इस तरीका से यदि तुमने पंद्रह दिन भी मंत्र जाप कर लिया तो मंत्र तुम्हें अपने ही सामने से एक-एक शब्द गति करता हुआ दिखेगा। तुम्हें ये साफ एहसास होगा तुम जाप नहीं बल्कि मंत्र का एक-एक शब्द तुम्हारे सामने से गुजर रहा है। ये बिल्कुल अनुभव सिद्ध प्रक्रिया है। हमारे अनुभव से निकली हुई प्रक्रिया है। 
लेकिन इसे जब भी करें सुबह ही करें, स्वस्थ वातावरण में करें, आसानी होगी । ये ध्यान और योग की एक कंबाइन प्रक्रिया है। विपश्यना में श्वांस को देखना होता है। आपको मंत्र देखना नहीं है। जहां और जिस मन में विचार चल रहा है उस जगह पर मंत्र को चलाएं। विचार की जगह मंत्र को चलाएं । मंत्र के एक-एक शब्द को साफ उच्चारित होने दें। जीभ पर जोर नहीं पड़ना चाहिए । मस्तिष्क और शरीर किसी पर जोर नहीं पड़ना चाहिए, सब कुछ सामान्य गति से होने दें ।
मंत्र के करने में जब तक रिदम नहीं है। तो आपकी सारी मेहनत व्यर्थ हो जाती है। जैसे संगीत में एक प्रवाह होता है।बस ऐसे ही मंत्र करना होता है। संगीत सभी ने सुना होगा ध्वनि और विश्राम का तालमेल है। मंत्र भी ऐसा ही है। किस शब्द का कितना उच्चारण, कहां और कैसे विश्राम। वैसे तो आप इसे चलते फिरते कर सकते हैं। पर ऐसा न करें। क्योंकि आदत बन जाए तो विचार अन्यत्र मार्ग ढूँढने लगते हैं। छोटे अभ्यास से आदत बनाएं। गलतियाँ न करें । मंत्र, तंत्र में एक गलती भी पूरा जीवन तबाह कर सकती है। 
इसलिए मंत्र करने से पहले मंत्र कैसे किया जाए इसकी सही जानकारी का ठीक अभ्यास होना ही चाहिए। इसे किसी जाप करने वाले ब्राह्मण से मार्गदर्शन ले सकते हैं। मंत्र करने से पहले खुद को शारीरिक और मानसिक रूप से तैयार करें।
मंत्र में आपने देखा होगा ध्यान, आवाहन, आसन, पूजन यही सब होता है। आपको किसी को निमंत्रण भेजना है तो सबसे पहले उस व्यक्ति को दिमाग में लाया जाता है कि उनको आमंत्रित करते हैं। सम्मान उस स्तर का जिस स्तर का व्यक्ति है। ये है उस मंत्र के देवता का ध्यान। फिर आमंत्रण के लिए निवेदन पत्र लिखा है। ये है मंत्र के देवता का आवाहन। अब वो व्यक्ति हमारे घर आ गया। तो सबसे पहले उसे बैठने को कुर्सी जो कुछ भी है देते हैं। इसे ही आसन कहा जाता है। अब व्यक्ति हमारे घर आ गया तो उसका आदर सत्कार भी करते हैं, सबसे पहले नमस्कार से शुरू । अब मंत्र का देवता आसन पर विराज गया तो फिर उसका पूजन। पुष्प समर्पयामि, नैवद्यम समर्पयामि और भी जो कुछ सामग्री है उसे भेंट करते हैं। इसके बाद मंत्र जाप। बस सब कुछ वैसा ही हाँ जैसा हम अपने घर में करते हैं। ये किसी परम श्रद्धेय का आमंत्रण है।
अगर करने का मन ही बना लिया है तो पहले उसकी व्यवस्थित तैयारी करें । शारीरिक और मानसिक दोनों ही तैयारी जरूरी है। तंत्र में रात्रि कालीन जाप होते है। रात्रि 10 के बाद से सुबह चार बजे तक, आप अंदाज लगा सकते है कितना शारीरिक और मानसिक तैयारी की जरूरत होती है। बहुत से लोग सोचते हैं एक बार कर लेते हैं फिर जिंदगी भर बैठकर खाएंगे।ऐसी सोच लेकर साधना में न उतरें। कभी हित होने वाला नहीं है। दूसरों को देखकर प्रभावित होने की जरूरत नहीं है। बैराग वृत्ति से सब कुछ सफल है और आसक्ति तुम्हें गर्त में ही ले जाएगी। 
जब बहुत परेशानी में हों खुद मंत्र न करें। किसी से बदला लेने के ले लिए मंत्र न करें ईश्वर पर भरोसा रखें । गलत चीजों के परिणाम भी गलत ही होते हैं।.

Tuesday, October 15, 2024

अनहद की यात्रा,अनन्त की यात्रा

आध्यात्मिक यात्रा , धन और अकेलापन :-- 
             जब कोई व्यक्ति भीतर की यात्रा पर होता है आत्मिक स्तर पर जीने की शुरुआत करता है तब बहुत बदलाव उसके शरीर और बुद्धि पर होने लगते हैं ! भौतिक संसार व भौतिक सुख से उसका मन दूर होने लगता है ! वो अपने भीतर खोया रहना चाहता है जिससे वह ऐसा कुछ नही करना चाहता कि स्वयं को अपग्रेड कर सके माने धन संपत्ति बढ़ाए जैसे कि यदि बहुत धन कमाने की बात करें तो आध्यात्मिक दुनिया में जाने पर बहुत से लोग या सोच बना सकते हैं अधिक धनोपार्जन का क्या करना है , उनको जो "सुख" अधिक धन कमाकर चीजों को खरीदने से मिलेगा वह तो अध्यात्मिकता में जाने पर अभी ही महसूस कर रहे हैं किंतु यही सोच अधूरी ही सच है !
     यदि अधिक धन कमा सकते हैं तो कमाना चाहिए यह बात अलग है कि यदि अधिक धन की इच्छा नहीं तो कोई बात नही यह धन उनपर खर्च कर सकते हैं जो पैसा कमाने में सफल नहीं हो पा रहे ! क्योंकि ऐसा करके भी आप दूसरों का जीवन सुधारने में अपना योग दान कर रहे हैं यदि धन नहीं होगा तो कैसे किसी के सहायक बनेंगे ?? सोचो  "भला इससे बड़ा पुण्य कार्य और क्या हो सकता है"  ?? 
         आप इस भौतिक संसार को पूरी तरह नकार नहीं सकते माना आपकी बुद्धि और चेतना दोनों ही तीसरे आयाम से ऊपर की चीज हैं ! ""किंतु इन दोनों को जो "शरीर" सम्हाल कर चल रहा है वो " तीसरे आयाम और भौतिक संसार" से जुड़ा है ! यह शरीर इस भौतिक संसार की भाषा को ही जानता है इसीलिए इसे यहीं की चीजें पसंद आती हैं ! अतः यदि आपके माइंड में भी कुछ इस तरह के विचार आने लगें कि भौतिक संसार व्यर्थ की चीज है तो आपको अभी इस तरह के विचारों को बदल देने की जरूरत है ! 
       *भौतिक संसार भी आध्यात्मिक संसार की भांति बहुत आवश्यक है क्योंकि बिना भौतिक जरूरतों को पूरा किए आप अध्यात्म की दुनिया में सही से प्रवेश नही कर पाएंगे ! आपको ये उपरोक्त विचार आश्चर्य से लगेंगे किंतु यह नीम सा सच है !*     
      इसलिए आपको इन दोनो में से किसी एक को चुनने की जरूरत नहीं अपितु दोनों संसार को एक साथ अपनाने की जरूरत है ! एक दूसरे संसार के कीमती नियमों को एक दूसरे संसार में सफलता प्राप्त करने की जरूरत है ! जैसे आत्मिक यात्रा में जाने के बाद ज्ञात होता है विचार कितने शक्तिशाली हैं और आप चाहे तो इसको कई बार परीक्षण भी करके भी देख सकते हैं और इसको सीखने के बाद इसी तरह के विचारों को आप भौतिक संसार में भी इस्तेमाल कर सकते हैं जिससे कि आपकी सफलता बहुत पहले ही निश्चित हो जाती है बस उसमें एक समय की दूरी होती है !
        जब कोई भीतर की यात्रा में बहुत गहरे से जाने लगता है तब वह स्वयं को सबसे बड़ा आलसी महसूस करने लगता है ! जबकि उसकी आत्मा और बुद्धि बिल्कुल स्पष्ट बता देते हैं कि यदि वह कोई कार्य करेगा तो परिणाम क्या होंगे फिर भी वह आलसी बना रहता है इस तरह वो भीतरी यात्रा में जाने का भी लाभ नहीं उठा पता है !
      भीतर की यात्रा में जाने का सबसे बड़े लाभ में से एक यही है कि आपको इसमें जाने के बाद किसी भी कार्य को करने के पूरे के पूरे "ब्लूप्रिंट" मिल जाते हैं कि कोई कार्य कैसे सफलता पूर्वक पूर्ण किया जा सकता है ! लोग ब्लूप्रिंट को अपने माइंड में सोच सोचकर प्रसन्न होते रहते हैं कि वो जो भी करना चाहते हैं उसे जब चाहे तब कर सकते हैं  हैं और इसी कारण आलसी बने रहते हैं ! यदि आपके साथ भी ऐसा ही हो रहा है तो अपने ब्लूप्रिंट को साकार करने के लिए अपने शरीर और बुद्धि को पुनः से तैयार कीजिए और अपने कार्य पर लग जाइए !
        चूंकि अक्सर हमारा माइंड ही यहां पर गेम खेल रहा होता है और लोगों को बस कल्पनाओं में खोए रखता है जिसमें वे बहुत सी अलग-अलग तरह की कल्पनाएं करते रहते हैं ! अब जबकि आपको कल्पना करने की जरूरत तो है किंतु रोज-रोज अलग-अलग तरह की नहीं ! बस आप अपने आप को एक ही तरह की कल्पना पर रोकना सीख लो और फिर देखो कैसे यही आपका दिमाग खुद के ही जल में फंस जाएगा और आपका सोचा गया कार्य इसकी गलती से सही किंतु पूरा अवश्य होगा ! 
       जब कोई व्यक्ति भीतर की यात्रा में गहरे से जाता है तब वह स्वयं को दूसरों से अकेला सा महसूस करने लगता है और कभी-कभी तो बहुत ही ज्यादा स्वयं को अकेला महसूस करता है ! अकेलापन भी दो तरह का होता है ! एक तो अकेलापन भीतरी यात्रा के कारण किसी को तब तक महसूस होता है जब तक कोई व्यक्ति पूरी तरह से अध्यात्मिकता में नहीं चला जाता एवं यहां के सभी नियम नहीं सीख जाता ! इसी कारण जब भी किसी को अकेलापन महसूस होता है वह इस समय बहुत सी नई-नई चीज रोजाना सीखना जाता है पर परेशान- दुखी नहीं होता !
    जब वह उतना सबकुछ सीख जाता है जितना उसके लिए पर्याप्त होता है तब उसका संबंध इस दुनिया के लोगों से ही नहीं अपितु दुनिया की हर चीज से "जोड़" दिया जाता है  आप इसको ऐसे कहा सकते हो ऐसे व्यक्ति का संबंध इस दुनिया के हर जीव से अपने आप ही जुड़ जाता है ! जब ऐसा किसी के साथ हो जाता है तो तभी उसका अकेलापन किसी भीड़ से भी अधिक अच्छा होता है ! 
     दूसरे अकेलापन वह होता है जिसमें कोई किसी से इसलिए नहीं मिलना चाहता है क्योंकि उसे दूसरों में कोई भी दिलचस्पी नहीं लेकिन इस समय ऐसा व्यक्ति स्वयं में भी दिलचस्पी नहीं ले रहा होता जिससे वह बहुत सी चीजों के लिए मन ही मन असहज होने लगता है ! यदि ऐसा किसी के साथ हो रहा है तो आप समझ सकते हैं कि ऐसा किसी नेगेटिव सोच विचार के कारण भी हो जाता है इसमें आध्यात्मिकता का कोई हाथ नहीं इसलिए आपको यह समझना भी बहुत आवश्यक है !

    यदि उपरोक्त सभी बातों को सोचा विचार जाए तो जब भी किसी व्यक्ति की आत्मिक ग्रोथ शुरू होती है तो उसके अंदर बहुत से बदलाव कर देती है जिसका स्वयं उस व्यक्ति को भी विश्वास नहीं होता है जो कि सारे के सारे पॉजिटिव होते हैं ! लेकिन यदि आपको लगता है कि भीतर की यात्रा से आपके भीतर किसी तरह की नेगेटिविटी चल रही है तो आप समझ सकते हैं कि आपने अपनी आत्मा की पावर का गलत उपयोग  कर लिया जिसको यदि आप खोजोगे तो पाओगे कि इसमें आपके माइंड और उसमे चल रहे निगेटिव विचार ही शामिल मिलेंगे ! इसलिए आपको अपने विचारों पर भी आपको थोड़ा  अधिक ध्यान देने की जरूरत है क्योंकि आप जो जो भी विचार सोच रहे हो उसका आपके जीवन में बहुत बड़ा योगदान होता है !
🚩ॐ नमः शिवाय 🚩

Wednesday, May 8, 2024

वेदस्य निर्मलं चक्षु ज्योतिषशास्त्रमकल्मषम् विनैतदखिलं श्रीतमा कर्म न सिद्ध्यति।

 ●ज्योतिष में धर्म प्रतिष्ठित है। धर्म में ज्योतिष समाहित है। धार्मिक ज्योतिषी होता है। ज्योतिषी धार्मिक होता है। जहाँ ज्योतिष नहीं, वहाँ धर्म नहीं। जहाँ धर्म नहीं, वहाँ ज्योतिष नहीं। ज्योतिष सिद्धान्त मात्र नहीं है। अपितु वह फलीभूत है। फलित बिना सिद्धान्त व्यर्थ है। जैसे वृक्ष फल के बिना। आम्रादि वृक्षों में यदि मधुर स्वादिष्ट फल न लगे तो इन का इतना महत्व ही न रहे। जिस सिद्धान्त/ ज्ञान से मनुष्य का कल्याण न हो, वह महत्वहीन है। ऐसे ही सिद्धान्त ज्योतिष के साथ फलितशास्त्र अभिन्न रूप से है। सिद्धान्त है तो फलित है। फलित है तो सिद्धान्त है। इन में से जो एक को स्वीकार करे, दूसरे को नहीं तो वह बालक है, विज्ञ नहीं। नारद जी कहते हैं ...

"वेदस्य निर्मलं चक्षु ज्योतिषशास्त्रमकल्मषम्
विनैतदखिलं श्रीतमा कर्म न सिद्ध्यति।
तस्माज्जगद्धितायेदं ब्रह्मणा रचितं पुरा,
अतएव द्विजैः एतद् अध्येतव्यं प्रयत्नतः इति ।।"
√●[ अकल्मष है, यह ज्योतिषशास्त्र यह ज्ञान का निर्मल नेत्र है। बिना इसके सम्पूर्ण श्रौत स्मार्त कम की सिद्धि नहीं होती है। इसलिये विश्वकल्याण हेतु ब्रह्मा जी ने सर्वप्रथम इस को रचा। अतः ब्राहाणों को प्रयत्नपूर्वक इसका अध्ययन करना चाहिये । ]
√●इस ज्योतिषशास्त्र की गहराइयों में में बार-बार गोते लगाता रहा हूँ। इसके अतल तल से कभी-कभी रत्न प्राप्त होते हैं। उन रत्नों को मैं अपने पास रखना उचित नहीं समझता। श्री पं. जी के चरणों में मस्तक झुका कर मैं इन्हें वैष्णव जनों को अर्पित करता हूँ। श्री पं. जी अनुग्रहपूर्वक इसे स्वीकार करते हैं। इससे मैं कृतार्थ हूँ।
√●श्री राम नाम के प्रताप से मुझे एक मणि मिली है। इसमें ८४ फलक हैं। इस मणि में २५२ कोनें हैं। यह अद्भुत मणि है। सर्व कार्मार्थ, यह प्रयोज्य है। मुझे अपने घर में दो ग्रन्थों के दर्शन हुए। प्रथम ग्रंथ है-८४ वैष्णवों की वार्ता द्वितीय ग्रंथ है- २५२ वैष्णवों की वार्ता । इन ग्रन्थों को मैं पढ़ा नहीं हूँ। मेरे मन में ८४ एवं २५२ की संख्याएँ तब से मँडरा रही हैं। इन संख्याओं की सिद्धि मुझे अब हुई है। यह महती भगवत्कृपा है नाम संकीर्तन एवं श्रवण से जब बुद्धि के ऊपर पड़ी मैल छिल गई, तभी इसका बोध हुआ।
"नाम शुभं वृद्धिकरं प्रशस्तं
मांगल्यमेवाथ तथा यशस्यम् ।
जयावहं धर्मभरावहं च
दुःस्वप्नाशं परिकीर्त्यमानम् ।
करोति पापं च तथा विहन्ति
श्रृण्वन् सदा नाम सहस्ररत्नम् ।
पुण्यं च पुष्ट्यभ्युदयावहं
नारायस्येष्ट मुरारकीर्तेः ॥"
( व्यास जी)
√●शरीर आत्मा का वाहन है, घर है। आदि ब्रह्मा ने ८४ लाख योनियों को रचा। इन ८४ लाख योनियों में भटकता जीव भगत्कृपा से ही मनुष्य योनि पाता है। तुलसीदास कहते हैं...
"कबहुँ करि करुना वर देही।
देत ईस बिनु हेतु सनेही ।"
(रा. च. मा. उत्तरकाण्ड ।)
√● [ बिना हेतु, स्नेहवश परमात्मा इस जीव को करुणा कर के मनुष्य का शरीर प्रदान करता है ।]
व्यास जी कहते हैं...
"दुर्लभो मानुषो देहो देहिनां क्षणभंगुरः।"
(भागवत ११ । २ । २९ ।)
√● यह मनुष्य तन भाग्यवश मिलता है। सभी एक स्वर से कहते हैं कि यह देवदुर्लभ है। मानस की चौपाई है...
"बड़े भाग मानुष तन पावा ।
सुर दुर्लभ सब ग्रन्थन गावा ।।"
( उत्तर काण्ड । )
√●ऐसे मनुष्य शरीर को पा कर जो आत्मोद्वार में प्रवृत्त नहीं होता, वह निन्द्य है। यह केवल विषय भोग के लिये नहीं है। संत तुलसी दास कहते हैं ...
"इहि तन कर फल विषय न भाई ।
भजिय राम सब काम बिहाई ॥"
(रा.च.मा. )
√●हम लोग इस संसार में हजारों माता-पिताओं एवं सैकड़ों श्री पुत्रों का संयोग-वियोग पा चुके है, पा रहे हैं तथा पाते रहेंगे।
"मातापितृसहस्राणि पुत्रदारशतानि च।
संसारेष्वनुभूतानि यान्ति यास्यन्ति चापरे ।"
(महाभारत स्वर्गारोहण पर्व ५।६०)
√●इसलिये, इन सबके चक्कर में न पड़ कर हमें श्रेय मार्ग का ही अवलम्बन करना चाहिये। सरल श्रेय मार्ग को छोड़ कर कठिन श्रेय मार्ग का अनुसरण करना बुद्धिमानी नहीं है, विशेष कर कलियुग में। ज्ञान सब से बड़ा धन है। यह धन नाम जप से सरलतापूर्वक प्राप्त होता है। गोस्वामी जी कहते हैं...
"राम विमुख सठ चहसि संपदा ?"
(लंकाकाण्ड । )
"राम विमुख संपति प्रभुताई ।
जाइ रही, पाई बिनु पाई ||"
( सुन्दर काण्ड । )
√●राम से अविमुख रहते हुए जो ज्ञान पाता हूँ, वही लुटाता हूँ-पं. जी के श्री चरणों में रखता हूँ ।
√●●राशि चक्र एक है। इसके तीन विभाग हैं। इन विभागों को त्र्यम्बक, त्रिनेत्र, त्रिनयन कहते हैं। इस चक्र के एक विभाग से सर्जन क्रिया होती है, दूसरे से पालन कर्म होता है तथा तीसरे से संहार का कार्य होता है।
√★१. मेष, वृष, मिथुन, कर्कये चार राशियाँ सृष्टिसंज्ञक है।
√★२. सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक- ये चार राशियाँ स्थिति संज्ञक हैं।
√★३. धनु, मकर, कुंभ, मीन- ये चार राशियाँ विनाश संज्ञक हैं।
√★ ये राशियाँ जब पृथ्वी के पूर्वी क्षितिज पर लगी होती हैं तो इन्हें लग्न कहते हैं। लग्न राशि का संक्षिप्त नाम है-लग्न लग्नें भी राशियों के समान संख्या में १२ हैं।
√★ चक्रीयमाण राशियाँ जब स्थिर होती हैं, तो इन्हें भाव कहते हैं। जितनी राशियाँ हैं, उतने भाव हैं। किन्तु भावों के नाम राशियों से भिन्न हैं। तन, धन, बल, सुख, सुत, रिपु, काम, आयु, धर्म, कर्म, आय, व्यय ।
√★१२ अरों वाला यह चक्र आकाश में है, इस शरीर में है, सर्वत्र है। यह सब में है, सब से परे है। यह अदृश्य होकर भी देखने में अद्भुत और सुन्दर है। इसलिये इसे सुदर्शन चक्र कहते हैं। इसका प्रत्येक अर सृष्टि संहार और पालन का कार्य करता है। जिस अर में जन्म होता है, वह जन्म लग्न है। अतः मैं जन्म लग्न पर विचार करता हूँ।
√★जन्म लग्न का निर्धारण करने के लिये जन्म समय का ठीक-ठीक ज्ञान होना आवश्यक है। जन्म का समय क्या माना जाय ? इस पर विवाद है।
√★१. बच्चा जब गर्भ से बाहर आता है तो वह रोता है। रोने से उसकी श्वासनली खुलती है। उसी समय वह साँस लेता है। माता के गर्भ से बाहर आने पर प्रथम श्वाँस के लेने का समय ही उसका जन्म समय है।
√★२. बच्चा शल्य चिकित्सा / क्रिया द्वारा गर्भ से निकाला जाता है। ऐसी परिस्थिति में वह रोता नहीं है। तो उसका जन्म समय क्या माना जाय ? इसका निर्धारण सहज नहीं है। अतः नाल काटने के समय को जन्म काल माना जाय। जब तक नाल नहीं कटती तब तक बच्चा माता का अंग होता है। नाल कटने के साथ ही वह माता से अलग होता है और अपना स्वतन्त्र अस्तित्व रखता है।
√★ ३. समय के अतिरिक्त जन्म लग्न के निर्धारण में दूसरा महत्वपूर्ण घटक स्थान का है। पृथ्वी तल पर जो बच्चा पैदा होता है, उस का अक्षांश रेखांश जाना जाता है। किन्तु जो बच्चा आकाश में वायुयान में यात्रा कर रही महिला के पेट से बाहर निकलता है, उसके अक्षांश रेखांश के निर्धारण में कठिनाई आती है। ऐसी परिस्थिति में शुद्ध लग्नायन हो नहीं पाता।
√★४. घड़ी का वास्तविक राष्ट्रीय समय से आगे या पीछे होना तथा प्रसूतिगृहों की परिचारिकाओं / चिकित्सकों द्वारा समयांकन में सतर्कता न रखना भी शुद्ध लग्नायन में बाधक होता है। देखा गया है, कभी-कभी समयांकन में आधे घंटे तक का अन्तर होता है।
√★लग्न का ठीक-ठीक ज्ञान ज्योतिषी को कुशलता पर निर्भर करता है। कुशाम बुद्धि, व्यावहारि प्रौढ़ता तथा सत्यान्वेषण की क्षमता द्वारा लग्न ज्ञात कर ली जाती है। घड़ी के अभाव में समय का अनुमान किया जाता है। ऐसी परिस्थिति में ज्योतिषी का उत्तरदायित्व बढ़ जाता है।
√★पाराशरीय विंशोत्तरी दशा पद्धति को आधार मान कर लग्नायन की एक सूक्ष्म विधि है। स्पष्टता के साथ मैं इसका उल्लेख कर रहा हूँ। विशोली दशा पद्धति में मनुष्य की आयु १२० वर्ष मानी गई है। अर्थात् १ नक्षत्र = १२० वर्ष किसी भी नक्षत्र में जन्म लेने वाला जातक दीर्घायु योग प्राप्त होने पर १२० वर्ष की आयु का भोग करता है। यही इसका आधार है।
√★विंशोत्तरी दशा पद्धति में महों के लिये नियत वर्ष संख्या इस प्रकार है ...
★केतु = ७ वर्ष ।
★शुक्र = २० वर्ष ।
★सूर्य = ६ वर्ष ।
★चन्द्र = १० वर्ष।
★गुरु = १६ वर्ष ।
★मंगल = ७ वर्ष।
★राहु १८ वर्ष ।
★शानि = १९ वर्ष
★ बुध = १७ वर्ष ।
√★१ चक्र = २७ नक्षत्र ३६० अंश।
√★अतः १ नक्षत्र= ३६० ÷ २७ =१३° अंश २०' कला।
√★ जातक किसी भी नक्षत्र में जन्मे, उसकी दीर्घायु सीमा १२० वर्ष है।
★१ नक्षत्र = १२० वर्ष।
★तथा, १ नक्षत्र = १३° २०' = ८००'
★१२० वर्ष = ८०० कला।
★अथवा, १ वर्ष =८००/१२० =२०/३ कला।
★ अतः, सूर्य का भाग = ६ x २०/३ = १२०/३=४० कला।
★२०० =१ अंश ६ कला ४० निकला।
★ चन्द्र का भाग = १० x २०/३=२००/३=१°अंश ६'कला४०''विकला।
★ मंगल का भाग = ७ X २०/३=१४०/३=४६'कला४०विकला।
★राहु का भाग =१८ x २०/३ = ३६०/३ = १२०' कला = २° अंश ।
★गुरु का भाग = १६ X२०/३=३२०/३= १° अंश ४६' कला ४०'' विकला।
★शनि का भाग = १९× २०/३=३८०/३ = २° अंश ६' कला ४०'' विकला।
★बुध का भाग = १७×२०/३=३४०/३=१°अंश ५२'कला२०''विकला।
★केतु का भाग =७×२०/३=१४०/३=४६'कला४०''विकला।
★शुक्र का भाग = २०×२०/३=४००/३=२°अंश१३'कला२०''विकला।
√★इस गणितीय क्रिया में ग्रहों की नियत वर्ष संख्या को अंश कला विकला में परिवर्तित किया गया है। 【चित्र देखें ग्रहोंकी की वर्ष-अंशकला सारणी नीचें संलग्न है】
√★अब तक ज्योतिष शास्त्र में सूक्ष्म फल कहते के लिये प्रत्येक राशि को ९ भागों में विभाजित कर कुल राशियों अर्थात् १२ × ९ = १०८ की संख्या को महत्व दिया जाता रहा है। किन्तु अब यहाँ इससे भी अधिक सूक्ष्म फल को पाने के लिये राशियों के स्थान पर नक्षत्रों को ९ भागों में विभाजित करके फल कहने की परम्परा का श्री गणेश मैं भगवान् की कृपा से करने जा रहा हूँ।
【चित्र देखें मेष लग्न सारणी नीचें संलग्न है १२राशियों की सारणी के साथ】
√★इस सारणी को देखने पर स्पष्ट होता है कि २७ x ९ = ३४३ नक्षत्र भाग होने के स्थान पर २५२ नक्षत्र भाग हुए हैं। ऐसा क्यों ?
√★१. मेष, सिंह, धनु, राशियों का अन्त क्रमशः कृत्तिका, उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ़ नक्षत्रों में सूर्य के भाग से होता है।
√★२. वृष, कन्या, मकर राशियों का प्रारंभ क्रमशः कृत्तिका, उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ़ नक्षत्रों में सूर्य के भाग से होता है।
√★३. वृष, कन्या, मकर राशियों का अन्त क्रमशः मृगशिरा, चित्रा, धनिष्ठा नक्षत्रों में राहु के भाग से होता है।
√★ ४. मिथुन, तुला, कुम्भ राशियों का प्रारंभ क्रमशः मृगशिरा, चित्रा, धनिष्ठा नक्षत्रों में राहु के भाग से होता है।
√★ ५. मिथुन, तुला, कुम्भ राशियों का प्रारंभ क्रमशः मृगशिरा, चित्रा, धनिष्ठा नक्षत्रों में राहु के भाग से होता है।
√★६. मिथुन, तुला, कुम्भ राशियों का अन्त क्रमशः पुनर्वसु, विशाखा, पू.भा. नक्षत्रों में शनि के भाग से होता है।
√★७. कर्क, वृश्चिक, मीन राशियों का प्रारंभ क्रमशः पुनर्वसु विशाखा, पू.भा. नक्षत्रों में शनि के भाग से होता है।
√★इस प्रकार सूर्य, राहु और शनि में से प्रत्येक ग्रह का नक्षत्र भाग ३ x ३ = ९ बार अधिक आया है। अतः २४३ + ९ = २५२ भाग प्राप्त हुए हैं।
√★पूरा भचक्र २५२ की संख्या में बँटा हुआ है। प्रत्येक राशि का अन्त एक निश्चित संख्या के नक्षत्र भाग से हो, इस कारण से ९ विभाग बढ़ गये हैं। यदि वेद वर्णित २८ नक्षत्रों को लिया जाय और उसके विभाग किये जायें तो २८ x ९ = २५२ की संख्या प्राप्त होती है। यह २५२ की संख्या पूर्णत: वेद सम्मत भी है ।
√★१ से लेकर २१ तक की संख्याएँ तक मेष लग्न के अन्तर्गत हैं।
√★२२ से लेकर ४३ तक की संख्याएँ वृष राशि के अन्तर्गत आती हैं।
√★४४ से ६४ तक की संख्याएँ मिथुन लग्न के अन्तर्गत हैं।
√★६५ से ८४ तक की संख्याएँ कर्क लग्नान्तर्गत हैं।
√★८५ से १०५ तक की संख्याएँ सिंह लग्न के अन्तर्गत हैं।
√★१०६ से १२७ तक की संख्याएँ कंन्यालग्न की द्योतक हैं।
√★१२८ से १४८ तक की संख्याएँ तुलान्तर्गत हैं।
√★ १४९ से १६८ तक की संख्याएँ वृश्चिकलग्न में हैं।
√★१६९ से १८९ तक की संख्याएँ धनुलग्न गत हैं।
√★१९० से २११ तक की संख्याएँ मकर लग्न की प्रतीक हैं।
√★२१२ से २३२ तक की संख्याएँ कुम्भ गत हैं।
√★२३३ से २५२ तक की संख्याएँ मीनाद्यन्त की द्योतक हैं ।
√◆अतिगण्ड संख्याएँ कुल ६ हैं।
√◆८४ विशिष्ट गण्ड संख्या है।
√● कर्कान्त ८४ ।
√● सिंहारंभ ८५ ।
√●वृश्चिकान्त १६८ ।
√●धन्वारंभ १६९ ।
√●मीनान्त २५२ ।
√●मेषारंभ १ ।
√●८४ x १ = ८४ से कर्कलग्न का अन्त होता है।
√●८४ x २ = १६८ से वृश्चिक लग्न का अन्त होता है।
√●८४ x ३ = २५२ से मीन लग्न का अन्त होता है।
√● (८४ × १) + १ = ८५ से सिंह लग्न का आरंभ होता है।
√●(८४ X २) + १ = १६९ से धनुलग्न का आरंभ होता है।
√●(८४ x ३ + १ = २५३÷२५२ = १ से मेष लग्न का आरंभ होता है।
√●८४,८५ । १६८, १६९ । २५२,१ । ये ६ संख्याएँ अतिगण्ड इस लिये हैं कि इनसे नक्षत्र के साथ-साथ राशि का आरंभ वा अन्त होता है।
√●●सभी लग्नों के साथ बराबर संख्याएँ नियत नहीं हैं।
√●१. मेष, सिंह, धनु लग्नों में बराबर संख्याएँ हैं। इन की कुल संख्या २१ है ।
√●२. वृष, कन्या मकर लग्नों में बराबर संख्याएँ हैं। इन की कुल संख्या २२ है।
√●३. मिथुन, तुला, लग्नों में बराबर-बराबर संख्याएं हैं। इनकी संख्या २१ है ।
√●४. कर्क, वृश्चिक, मीन लग्नों में बराबर-बराबर संख्याएँ हैं। इनकी संख्या २० है ।
√●इस प्रकार, मेष सिंह धनु की कुल संख्याएँ = २१ x ३ = ६३ ।
√●वृष कन्या मकर की कुल संख्याएँ =२२×३=६६।
√●मिथुन तुला कुंभ की कुल संख्याएँ = २१ x ३ = ६३ ।
√●कर्क वृश्चिक मीन की कुल संख्याएँ = २० x ३ = ६० ।
√●● इन द्वादश राशियों का कुल योग = २५२।
√●राशि/लग्न/ आदित्य १२ है १२ की संख्या पूर्ण है। इसमें १ दहाई है तथा २ इकाई है। यदि अंकों का स्थान बदल दिया जाय तो नई संख्या २१ हो जाती है। इन उल्टा सुल्दा संख्याओं का गुणनफल २१ x १२ = २५२ होता है। ८४ भूलोक की प्रतीक है। भुवः और स्वः दो और लोक होने से ८४ की ३ आवृत्ति = ८४ x ३ = २५२ हुई। आदित्य में सप्त रश्मियाँ हैं। द्वादश आदित्य हैं। अतएव ७ X १२= ८४ रश्मियाँ हुई। ये रश्मियाँ केवल भूलोक में ही नहीं, अपितु भुवः और सुत्रः लोक में भी व्याप्त । इसलिये ८४ x ३ = २५२ रश्मियाँ लोक लोकान्तरों तक फैली हैं।
√●कुल ३६ व्यञ्जन वर्ण है।
√●५ कवर्ग + ५ चवर्ग + ५ टवर्ग + ५ तवर्ण + ५ पवर्ग + ४ यवर्ग + ३ शवर्ग + १ वर्ग + ३ संयुक्ताक्षर (क्ष,त्र,ज्ञ ) ।
√●कुल १२ स्वर वर्ण हैं।
अ ,आ, इ, ई ,उ ,ऊ , ऋ, ॠ , ए, ऐ ,ओ, औ ।
√●इन ३६ व्यञ्जनों तथा १२ स्वरों के मेल से ३६ x १२ = २५२ मात्रिक वर्ण बनते हैं।
√●सम्पूर्ण वाड्मय इन्हीं से है। सभी वेद, ब्राह्मण ग्रन्थ, आरण्यक उपनिषद्, सभी शास्त्र, सभी पुराण सभी स्मृतियाँ इन्हीं से ओतप्रोत हैं। यह २५२ की संख्या वाक ब्रह्म की प्रतीक है। जो इस २५२ को जान लेता है, उसके लिये वेद (ज्ञान) हस्तामलकवत है। कहा गया है।...
"जुवती साख नृपति बस नाहीं।।"
( रा.च.मा. अरण्य काण्ड )
√●इस २५२ के रहस्य को जो जान लेता है, उसके वश मे युवती शास्त्र और राजा तीनों हो जायेंगे। क्योंकि इसको जानने वाला भगवान् का भक्त होता है। भक्त के वश में भगवान् होते हैं। औरों की बात क्या की जाय ?
√● एक को अनेक टुकड़ों में बाँट देना भक्ति है। भज्धातु भ्वादि उभयगणी भजति ते हिस्से करना अर्थ में प्रयुक्त होती है। भज् + क्त= भक्त जो विभाजित है, वह भक्त है। इस प्रक्रिया को भक्ति कहते हैं। तत्व एक है। एक के दो भाग करना-ईश्वर एवं जीव के रूप में, अथवा एक के बहुत समान / असमान भाग करना चराचर विश्व के रूप में, भक्ति का प्रतिफल है। ऐसा करने वाला भी भक्त है। जो एक के अनेक भाग करता है, वह भक्त है। जो अनेक को परस्पर मिलाते हुए एक कर देता है, वह ज्ञानी है, अभक्त है। विश्लेषणपरक प्रक्रिया भक्ति है। संश्लेषण परक कर्म ज्ञान है। विश्लेषक को भक्त कहते हैं। संश्लेषक को ज्ञानी कहते हैं। जो संश्लेषण कर सकता है, वह विश्लेषण भी करता है। जो विश्लेषण करता है, वह संश्लेषण करने में भी सक्षम होता है। इस तरह जो ज्ञानी है, वह भक्त है तथा जो भक्त है, वह ज्ञानी भी है। भक्त और ज्ञानी एक ही हैं। ज्ञान और भक्ति में कोई अन्तर नहीं है। मूर्ख लोग इसमें अन्तर करते हैं।
"ज्ञानिहि भक्तिहि नहि कछु भेदा।
उभय हरहि भव संभव खेदा ।।"
(रा. च. मा. उत्तरकाण्ड ।)
√● मैंने १ को २५२ भागों में बाँटा है। अतः मैं भक्त हूँ। जो लोग इसे स्वीकार करते हैं, वे सब भक्त हैं। भक्ति से सारा व्यवहार है। यदि मैं २५२ को पुनः १ कर दूं तो ज्ञानी कहलाऊंगा। किन्तु तब व्यवहार समाप्त हो जायेगा। मौनावास्था का नाम १ है अभी मैं मौन वा ज्ञानी नहीं हूँ। अज्ञानी रहना ही ठीक है। किचित् मुखर हूँ।
√● जो नहीं होने वाला है, वह नहीं होता। जो होने वाला है, वही होता है। इसके विपरीत कुछ नहीं होता।
"यद्भावि न तद् भावि,
भावि चेन्न तदन्यथा ।"
(-व्यास ।)
√●कहा गया है ...
"सा सा सम्पद्यते बुद्धिः सा मतिः सा च भावना ।
सहायास्तादृशा एव यादृशी भवितव्यता ।।"
√● [वैसी वैसी बुद्धि उत्पन्न होती है, उसी प्रकार के विचार होते हैं, सहायक मिलते हैं। जैसी भवितव्यता होती है।]
√●वैसी भावना जागृत होती है, वैसे इसी बात को संत तुलसीदास इस प्रकार कहते हैं।...
"तुलसी जस भवितव्यता तैसी मिली सहाय आपुन आवै ताहि पर, ताहि तहाँ लै जाय ।।"
(बालकाण्ड)
√●इस भवितव्यता को जानने की जिज्ञासा सब में होती है। ज्ञानी तपी पण्डित मूर्ख, धनी-निर्धनी, राजा प्रजा, श्री-पुरुष, स्वामी सेवक सभी अपनी-अपनी भवितव्यता को जानने के लिये उत्सुक होते हैं। प्रश्न के माध्यम जे प्रश्न कुण्डली बनाकर तथा जन्म समय के द्वारा जन्म चक्र बना कर उनकी इस उत्सुकता का प्रशमन किया जाता है। यह २५२ संख्याओं वाली वैष्णव सारणी इस कार्य में अत्यधिक सहायक है। इस की महत्ता अक्षुण्ण है।
√● इस सारणों के प्रयोग का एक सूत्र है और वह है- 'विश्वम्'। जो आदि में है, वही अन्त में है, रही मध्य में है। विष्णु सहस्रनाम का पहला पद है-'विश्वम्'। इस विश्वं में सभी अन्य ९९९ नाम हैं। स विश्व को समझ लेना ही सभी नामों को जानना है। 'सत्यभाष्य' से सब कुछ स्पष्ट हो जाता है। बस ही इसका मूल सूत्र है। हर संख्या व्यापक है। कोई भी संख्या लें चाहे वह २५२ के भीतर हो वा बाहर, इस संख्या से संबंधित लग्नांश कलाविकला इस सारणी से ज्ञात हो जाने पर तात्कालिक ग्रहों की सहायता रे फल कथन अचूक होता है। यदि संख्या २५२ से अधिक है तो उसमें २५२ का भाग देने पर जो शेष आवे, उससे लग्नांश कला विकला जाना जाता है। संख्या का स्फुरण स्वयं के मन में हो अथवा प्रश्न कर्ता के मन में, फलित अचूक होगा। कोई भी व्यक्ति अपनी काल्पनिक अथवा वास्तविक पंजीयन संख्या, परीक्षा अनुक्रमांक संख्या, वाहन संख्या, गृह संख्या, दूरभाष संख्या, बीमा पालिसी संख्या, बैंक खाता लेखा संख्या, नगर पिन कोड संख्या आदि दे कर किसी भी प्रश्न का उत्तर जान सकता है। फल के शुभाशुभ का परिज्ञान नक्षत्र भाग पति से होता है।
√●इस सारणी का प्रयोग जन्म कुण्डली देखने में धड़ल्ले से किया जा सकता है। ग्रहस्पष्ट एवं आर्य भावस्पष्ट के द्वारा उनके नक्षत्र तथा नक्षत्रभागाधिपतियों की शुभाशुभता को ज्ञात कर फल कहना सरल हो जात
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कुण्डलिनी जागरण की प्रक्रिया

सहस्रार चक्र सिर के शिखर पर स्थित है। इसे "हजार पंखुडिय़ों वाले कमल”, ईश्वर का द्वार या "लक्ष किरणों का केन्द्र” भी कहा जाता है, क्योंकि यह सूर्य की भांति प्रकाश का विकिरण करता है। अन्य कोई प्रकाश सूर्य की चमक के निकट नहीं पहुंच सकता।
कुण्डलिनी के सहस्रार में प्रवेश करने में एकादश रुद्र सबसे बडी समस्या है यह समस्या भवसागर से आती है, इस प्रकार यह तालू क्षेत्र में भी प्रवेश करती है। हजार दलों वालें महापद्म पर, जिसे साधना ही महासाधना है ;वही सत्यलोक है। अमरत्व, मुक्ति,निर्वाण सब कुछ वहीं पहुचने पर है।
सारी तैयारी उसी की साधना की है। शरीर के कपाल के उर्ध्व भाग में स्थित सहस्रार चक्र के बारे में शास्त्र कहते हैं कि “विद्युतधारा की तरह इन छह चक्रों से होती हुई, ऊपर सहस्रार कमल में तुम जा विराजती हो । सूर्य, चन्द्र और अग्नि (इड़ा, पिंगला, और सुषुम्ना) तुम्हारी कला पर आश्रित हैं |
मायातीत जो परात्पर महापुरुष हैं, तुम्हारी ही आनंदलहरी में स्नान करते हैं” सहस्रार पर पहुंचने पर साधक निवर्विचार हो जाता है। ह्दय में शुद्ध स्पंदनहोता है-लप-टप-लप- टप । सारे स्वर एकत्रित होकर इस समन्वय से उत्पन्न होने वाला स्वर ॐ…होता है।
सूर्य के सातों रंग अंततः सफेद किरणें बन जाती हैं या स्वर्णिम रंग की किरणें ह्दय सात चक्रों के सात परिमलों से घिरा हुआ है और इसके अन्दर आत्मा निवास करती है । आपके सिर के शिखर पर सर्व शक्तिमान सदाशिव निवास करते हैं।
कुण्डलिनी जब इस विन्दु को छूती है तो आत्मा प्रसारित होने लगती है,और आपके मध्य नाडी तन्त्र पर कार्य करने लगती है क्योंकि स्वतःचैतन्य सपंदन आपके मस्तिष्क में प्रवाहित होने लगती है। और आपकी नाडियों को ज्योतिर्मय करती है।
परन्तु अभी भी ह्दय में पहचान नहीं आई लेकिन आप चेतन्य स्पंदन महसूस करने लगते हैं। आप उस स्थिति में दूसरो लोगों को रोग मुक्त कर सकते हैं । परन्तु अभी भी यह पहचान नहीं है क्योंकि पहचान आपके ह्दय की मानसिक गतिविधि है ।
आपको याद रखना होगा ,ह्दय पूरी तरह से मस्तिष्क से जुडा हुआ है। ह्दय जब रुक जाता है तो मस्तिष्क भी रुक जाता ,सारा शरीर बेकार हो जाता है। कोई खतरा दिखने लगता है कि ह्दय धडकने लगता है। आपके ह्दय में जब दिव्यत्व और आध्यात्मिकता का अनुभव विकसित होने लगता है ।
तब आप जान पाते हैं कि आप दिव्य व्यक्ति हैं । और जब तक आप पूर्ण रूपेण विश्वस्त नहीं होते कि आप दिव्य व्यक्ति हैं तो चाहे जितनी श्रद्धा आपमें हो यह पहचान अधूरी है। हम जब भी और जहॉ भी विद्युत चुम्बकीय शक्ति को कार्य करते हुये देखते हैं ।
तो यह हनुमान जी के आशीर्वाद से होता है। वे ही विद्युत चुम्बकीय शक्तियों का सृजन करते हैं । गणेश मूलाधार चक्र पर विराजमान हैं ।श्री गणेश जी के अन्दर चुम्बकीय शक्तियॉ हैं ; पदार्थ की अवस्था में वे मस्तिष्क तक जाते हैं मस्तिष्क के विभिन्न पक्षों में सहसम्बंधों का सृजन करते हैं ।
गणेश जी हमें बुद्धि प्रदान करते हैं तो श्री हनुमान हमें सद्विवेक प्रदान करते ।क्योंकि कुण्डलिनी गौरी शक्ति है और गणेश जी हर क्षण उनकी रक्षा करने के लिए वहॉ होते हैं, शिव आत्मा का प्रतिनिधित्व करते हैं और आत्मा का निवास आपके ह्दय में है।
वास्तव में,सदा शिव का स्थान आपके सिर के शिखर पर है परन्तु वे आपके ह्दय में प्रतिविम्बित होते हैं। आपका मस्तिष्क विठ्ठल है अथार्त हरिहर। पूरी साधना हरिहर को समझने की ही है। हरि माया का प्रतिनिधित्व करते हैं और हर आत्मा का।
जब तक दोनों ... मस्तिष्क और आत्मा में यह सपंदन नहीं पहुंचता । हमारी साधना का लक्ष्य भी पूरा नहीं होता। आत्मा को आपके मस्तिष्क में लाने का अर्थ आपके मस्तिष्क का ज्योतिर्मय होना परमात्मा का साक्षात्कार करने की आपके मस्तिष्क की सीमित क्षमता का असीमित बनना है।
जब आत्मा मस्तिष्क में आती है तो आप जीवन्त चीजों का सृजन करते हैं..मृत भी जीवित की तरह से व्यवहार करने लगता है। सहस्रार चक्र में ‘अ’ से ‘क्ष’ तक की सभी स्वर और वर्ण ध्वनि उत्पन्न होती है। पिट्यूटी और पीनियल ग्रंथि का आंशिक भाग इसमें संबंधित है।
यह मस्तिष्क का ऊपरी हिस्सा और दाईं आंख को नियंत्रित करता है तथा आत्मज्ञान, आत्म दर्शन, एकीकरण, स्वर्गीय अनुभूति के विकास का मनोवैज्ञानिक केंद्र है। सहस्रार को कैलास पर्वत के रूप में इंगित करने भगवान शंकर के तप रत होने की स्थिति को भी कहते हैं।
सहस्रार चक्र दोनों कनपटियों से दो-दो इंच अंदर और भौहों से भी लगभग तीन-तीन इंच अंदर हैं। मस्तिष्क मध्य में महावीर नामक महारुद्र के ऊपर छोटे से पोले भाग में ज्योतिपुंज के रूप में अवस्थित है। तत्व दर्शीयों के अनुसार यह छोटे उलटे कटोरे के समान दिखाई देता है।
सहस्रार को जागृत कर लेने वाला व्यक्ति संपूर्ण भौतिक विज्ञान की सिद्धियां हस्तगत कर लेता है। यही वह शक्ति केंद्र है जहां से मस्तिष्क शरीर का नियंत्रण करता है।और विश्व में जो कुछ भी मानव-हित के लिए विलक्षण विज्ञान दिखाई देता है -उसका संपादन करता है।
इसे ही दिव्य दृष्टि का स्थान कहते है। मूलाधार से लेकर आज्ञा चक्र तक सभी चक्रों के जागरण की कुंजी सहस्रार चक्र के पास ही है । शरीर शास्त्र के अनुसार मोटे विभाजन की दृष्टि से मस्तिष्क को पाँच भागों में विभक्त किया गया है।
(1) बृहद् मस्तिष्क-सेरिव्रम (2) लघु मस्तिष्क- सेरिवेलम (3) मध्य मस्तिष्क-मिड ब्रेन (4) मस्तिष्क सेतु-पाँन्स (5) सुषुम्ना शीर्य -मेडुला आँवलाँगेटा। इनमें से अन्तिम तीन को संयुक्त रूप से मस्तिष्क स्तम्भ ब्रेन स्टीम भी कहते है।
इस तरह मस्तिष्क के गहन अनुसंधान में ऐसी कितनी ही सूक्ष्म परतें आती है जो सोचने-विचारने सहायता देने भर का नहीं, वरन् समूचे व्यक्तित्व के निर्माण में भारी योगदान करती है। वैज्ञानिक इस तरह की विशिष्ट क्षमताओं का केन्द्र ‘फ्रन्टललोब ‘ को मानते है ।
जिसके द्वारा मनुष्य के व्यक्तित्व, आकांक्षायें, व्यवहार प्रक्रिया, अनुभूतियाँ संवेदनाएँ आदि अनेक महत्वपूर्ण प्रवृत्तियों का निर्माण और निर्धारण होता हैं। इस केन्द्र को प्रभावित कर सकना किसी औषधि उपचार या शल्य क्रिया से सम्भव नहीं हो सकता।
इसके लिए योग साधना की ध्यान धारण जैसी उच्चस्तरीय प्रक्रियायें ही उपयुक्त हो सकती है, जिन्हें कुण्डलिनी जागरण के नाम से जाना जाता है। अध्यात्म शास्त्र के अनुसार मस्तिष्क रूपी स्वर्ग लोक में यों तो तैंतीस कोटि देवता रहते, पर उनमें से पाँच मुख्य हैं।
इन्हीं का समस्त देव स्थान पर नियंत्रण है। उक्त मस्तिष्कीय पाँच क्षेत्रों को पाँच देव परिधि कह सकते है। इन्हीं के द्वारा पाँच कोशों की पाँच शक्तियों का संचार-संचालन होता है। मस्तिष्क के विभाजन तथा सहस्रार चक्र के सम्बन्ध में इसी प्रकार एक ही तथ्य के भिन्न-भिन्न विवेचन मिलते है।
शास्त्रों में इसी को अमृत कलश ‘ कहा गया है। उसमें से सोमरस स्रवित होने की चर्चा है। देवता इसी अमृत कलश से सुधा पान करते अजर अमर बनते है। वर्तमान वैज्ञानिक की मान्यतानुसार मस्तिष्क में एक विशेष द्रव भरा रहता है जिसे ‘सेरिब्रोस्पाइनल फ्ल्यूड’ कहते है ।
यही मस्तिष्क के विभिन्न केन्द्रों को पोषण,संरक्षण देता रहता है। मस्तिष्कीय झिल्लियों से यह झरता रहता है और विभिन्न केन्द्रों तथा सुषुम्ना में सोखा जाता हैं। अमृत कलश में सोलह पटल गिनाये गये हैं। इसी प्रकार कहीं- कहीं सहस्रार की सोलह पंखुड़ियों का वर्णन है।
यह मस्तिष्क के ही सोलह महत्वपूर्ण विभाग-विभाजन है। शिव संहिता में भी सहस्रार की कलाओं का वर्णन करते हुए कहा है- ‘कपाल के मध्य प्रकाशमान सोलह कलायुक्त सहस्रार की यह सोलह कलायें मस्तिष्क के सेरिब्रोस्पाइनल फ्ल्यूड से सम्बन्धित मस्तिष्क के सोलह भाग है।
इन सभी विभागों में शरीर को संचालित करने वाले एवं अतीन्द्रिय क्षमताओं से युक्त अनेक केन्द्र है। सहस्रार अमृत कलश को जागृत कर योगीजन उन्हें अधिक सक्रिय बनाकर असाधारण लाभ प्राप्त करते है। योग शास्त्रों में इन्हीं ही ऋद्धि-सिद्धियाँ कहते है ।
इस सहस्रार कमल की साधना से योगी का चित्त स्थिर होकर आत्म-भाव में लीन हो जाता है। तब वह समग्र शक्तियों से सम्पन्न हो जाता हैं और भव बंधन से छूट जाता है। सहस्रार से बाहर आया हुए अमृत पर भी विजय प्राप्त कर लेता है।
सहस्रार मनुष्य का अपना उत्पादन नहीं, वरन् दैवी अनुदान हैं ; जिसका सम्बन्ध ब्रह्मरंध्र से होता है। ब्रह्मरंध्र को दशम द्वार कहा गया है। नौ द्वार है- दोनों नथुने, दो आँखें, दो कान, एक मुख, दो मल-मूत्र के छिद्र। दसवाँ ब्रह्मरंध्र है।
इसी के माध्यम से दिव्य शक्तियों तथा दिव्य अनुभूतियों का आदान-प्रदान होता है। योगी जन इसी से होकर प्राण त्यागते हैं। मरणोपरान्त कपाल क्रिया करने का उद्देश्य यही है कि प्राण का कोई अंश शेष रह गया हो तो वह उसी में होकर निकले और ऊर्ध्वगामी प्राप्त करे।
सहस्रार और ब्रह्मरंध्र मिलकर एक संयुक्त इकाई यूनिट के रूप में काम करते है। अतः योग साधना में इन्हें संयुक्त रूप में प्रभावित करने का विधान है। मानव काया की धुरी उत्तरी ध्रुव सहस्रार और ब्रह्मरंध्र ब्रह्माण्डीय चेतना के साथ सम्पर्क बनाकर आदान-प्रदान का पथ प्रशस्त करता है।
भौतिक ऋद्धियाँ और आत्मिक सिद्धियाँ जागृत सहस्रार के सहारे निखिल ब्रह्माण्ड से आकर्षित की जा सकती है।चेतन और अचेतन मस्तिष्कों द्वारा जो इन्द्रियगम्य और अतीन्द्रिय ज्ञान उपलब्ध होता है, उसका केन्द्र यही है। ध्यान से लेकर समाधि तक और आत्मिक चिन्तन से लेकर भक्ति योग तक की समस्त साधनायें यहीं से फलित होती और विकसित होती है।सुषुम्ना नाड़ी के भीतर भी तीन अत्यन्त सूक्ष्म धाराएँ प्रवाहित हैं। जिन्हें वज्रा, चित्रणी और ब्रह्म नाड़ी कहते हैं। ब्रह्म नाड़ी सब नाड़ियों का मर्मस्थल केन्द्र एवं शक्ति स्रोत है। ब्रह्म नाड़ी ही मस्तिष्क के केन्द्र में ब्रह्मरन्ध्र में पहुँचकर हजारों भागों में चारों ओर फैल जाती है।
इसी कारण उस स्थान को सहस्र दल कमल कहते हैं। सहस्र दल सूक्ष्म लोकों- विश्व व्यापी शक्तियों से सम्बन्धित है। जिसके द्वारा परमात्मा की अनन्त शक्तियों को सूक्ष्म लोक से पकड़ा जाता , मेरुदण्ड के नीचे अन्तिम भाग में सुषुम्ना के भीतर रहने वाली ब्रह्म नाड़ी एक काले वर्ण के षट्कोण वाले परमाणु से लिपटकर बंध जाती है।
षट्कोण परमाणु को यौगिक ग्रन्थों में अलंकारिक भाषा में कूर्म कहा गया है। उसकी आकृति कछुए जैसी होती है। पृथ्वी कूर्म भगवान पर टिकी है। शेषनाग के फन पर अवलम्बित है। इस उक्ति का आधार ब्रह्मनाड़ी की वह आकृति है जिसमें वह इस कूर्म में लिपटकर बैठी हुई है ।
और जीवन को धारण किए हुए है। यदि वह अपना आधार त्याग दे तो जीवन भूमि के चूर-चूर हो जाने में थोड़ी भी देरी न लगे। कूर्म से ब्रह्म नाड़ी के गुन्थन स्थल को आध्यात्मिक भाषा में कुण्डलिनी कहते हैं। कुण्डलाकार होने के कारण ही उसका नाम कुण्डलिनी पड़ा।
कुण्डलिनी की महिमा, शक्ति एवं उपयोगिता इतनी अधिक है जितनी कि बुद्धि कल्पना भी नहीं कर सकती। भौतिक विज्ञान के अन्वेषकों के लिए परमाणु एक चमत्कार बना हुआ है। उसके तोड़ने की विधि प्राप्त हो जाने पर प्रचण्ड ऊर्जा का स्रोत वैज्ञानिकों के हाथ लग गया है।
अभी तो उसकी ऊर्जा के एक अंश का विध्वंसात्मक स्वरूप देखा गया है। रचनात्मक एवं शक्ति का एक बड़ा पक्ष अछूता है।यह तो जड़ जगत के एक नगण्य से परमाणु की शक्ति की बात हुई जिसे देखकर आश्चर्यचकित हो जाना पड़ता तो चैतन्य जगत का एक स्फुल्लिंग जो जड़ परमाणु की तुलना में अनन्त गुना शक्तिशाली है।
विज्ञान की शक्ति एवं उपलब्धियों से सभी परिचित हैं। योग की उपलब्धियाँ हैं ऋद्धियाँ और सिद्धियाँ। जिस प्रकार परमाणु की शोध में अनेकों वैज्ञानिक जुटे हैं। उसी प्रकार पूर्वकाल के आध्यात्मिक विज्ञान वेत्ताओं, तत्वदर्शी ऋषियों ने मानव शरीर के अंतर्गत एक बीज परमाणु की अत्यधिक शोध की थी ओर उसकी असीम शक्ति से लाभ उठाया।
दो परमाणुओं को तोड़ने, मिलाने या स्थानान्तरित करने का सर्वोत्तम स्थान कुण्डलिनी केन्द्र में होता है क्योंकि अन्य सभी स्थानों के चैतन्य परमाणु गोल और चिकने होते हैं पर कुण्डलिनी में यह मिथुन के रूप में लिपटा हुआ है।
जिस प्रकार युरेनियम एवं प्लूटोनियम धातु के परमाणुओं का गुन्थन ऐसे टेढ़े-तिरछे ढंग से हुआ है कि उनका तोड़ा जाना अन्य पदार्थों के परमाणुओं की अपेक्षा अधिक सरल है । उसी प्रकार कुण्डलिनी स्फुल्लिंग परमाणुओं की गतिविधि का इच्छानुकूल संचालन अधिक सुगम है।
अत एव पूर्वकाल के ऋषियों ने बड़ी तत्परता से कुण्डलिनी जागरण पर शोध की। शोध के परीक्षण एवं प्रयोग के उपरांत उन्होंने इतनी सामर्थ्य प्राप्त कर ली जिसे चमत्कार समझा जाता है।कुण्डलिनी को गुप्त शक्तियों का भण्डार-तिजोरी कहा गया है।
बहुमूल्य रत्नों को तिजोरी में रखकर किसी गुप्त स्थान में रख दिया जाता है। उसमें मजबूत ताले लगा दिये जाते हैं जिससे कोई अनाधिकारी बाहरी व्यक्ति न प्राप्त कर सके।परमात्मा ने भी मनुष्य की अनन्त शक्तियों के भण्डार दिए हैं पर उन पर छह ताले लगा दिए हैं।
इन्हें ही षट्चक्र कहते ,चक्रों के रूप में यह ताले इसलिए लगाये गये हैं कि कोई उन्हें कुपात्र न प्राप्त करले। कुण्डलिनी शक्ति पर लगे छह तालों- छह चक्रों को बेधना- खोलना पड़ता है। सामान्यतया कुण्डलिनी अस्त-व्यस्त स्थिति में मूलाधार में नीचे की ओर मुँह किए बैठी रहती है।
उसे जगाने के लिए सविता की प्राण शक्ति का आश्रय लेना होता है। ध्यान योग की उच्चस्तरीय साधना द्वारा मूर्छित पड़ी कुण्डलिनी महाशक्ति का जागरण किया जाता है। योग में प्राण साधना इसी लक्ष्य की आपूर्ति करती है।
कुण्डलिनी जागरण की प्रक्रिया के साथ साधक को आत्मपरिष्कार आत्मसुधार का अवलम्बन लेना पड़ता है। दोहरे मोर्चे पर किया गया साधना पुरुषार्थ साधक के अन्तरंग को शक्ति सामर्थ्य से परिपूर्ण बनाता है।

Monday, February 19, 2024

अघोरा (रहस्य ओर रोमांच की अदभुद कहानी

अघोरा 
रहस्य रोमांच और परा विज्ञान की अनोखी कथा
12 दिसंबर 2023
आज फिर से एक बार मन हुआ कि अपने जीवन की उन पुरानी कहानियों को फिर से शुरू करें,जिसे लिखने में कई बार हमने आनाकानी की और सोचा कि इस अध्याय को लिखो न तो ज्यादा अच्छा है, क्योंकि कुछ चीज जीवन में ऐसी भी होती हैं जो आम व्यक्ति की सोच से परे होती हैं जिन्हें  पचाना उनके लिए आसान नहीं होता,क्या करें मन के किसी कोने में सत्य को उजागर करना भी निश्चित किया गया है यह जो मैं लिख रहा हूं यह सत्य कथा कहे या इसे कुछ और अब  ये आप पर हैं, मन आये तो सच मानना या कहानी मानकर आनन्द लेना,अब ये आप पर छोड़ता हुं,
आज से ठीक 2003 में इसे अन कही घटना को लिखाना आरंभ किया था मैंने, इस कथा के लगभग 50 पन्ने लिखने के बाद में इस कथा को रोक दिया, आज ठीक 2023 में फिर से इस अध्याय को शुरू करते हैं कहानी कहे या इतिहास हमेशा दोहराया जाता है दुनिया में कुछ भी ऐसा नहीं जिसे आप छुपा सके आप अपने भीतर के सत्य को उजागर किए बिना ना तो जी पाएंगे और ना मर पाएंगे, इस संसार में जिस कर्म को लेकर आप इस धरती पर जन्मे हैं निश्चित है कि आपको उसे आपको ही पूरा करना होगा और जो भी काम आपको दिया गया है यदि आप उसे अधूरा छोड़ते हैं तो सांसारिक कर्म की तरह आवागमन करना होगा क्योंकि कोई भी अपने कार्य को पूरा किए बिना परमेश्वर तक नहीं जा सकते है  मेरी इच्छा थी इस कथा को वा हीं विराम दे दिया जाए और इसे कभी लिखा ना जाए, लेकिन 2023 बहुत कुछ लेकर चला गया,...
 फिर कुछ लोग ऐसे मिले जो लोग जीवन के सत्य को जानने के साथ-साथ इस ब्रह्मांड के रहस्य को भी जानना चाहते हैं पूर्व  जन्म की योगिनी रमिका के आग्रह पर ये कथा आरम्भ होती हैं ये कथा आप के भीतरी चक्षु खोल सकती हैं तो चलिए एक बार फिर से ना चाहते हुए इस कथा को वहीं से शुरू करते हैं जहां इसे विराम दिया गया या रोक दिया गया
 यह बात 1986 की है वहीं से शुरू करते हैं जहां से यह कहानी शुरू हुई है आज के समय में जीवन जीना कोई सरल काम नहीं है पर मुझे लगता है कि आगे आने वाला समय मनुष्य  के लिए ओर कठिन होगा भगवान ही मालिक है इस दुनिया का, 
करोड़ो वर्ष इस दुनिया पर डायनासोर की प्रजाति ने राज किया पर मनुष्य के मात्र 100 वर्ष के विकास ने मनुष्य को अंत की ओर बढ़ा दिया है जोकि यह वह जीव हैं जिसे आयै मात्र डेढ़ लाख वर्ष ही हुए हैं भविष्य दर्शन आयेगा आगे फिर बात करेंगे नही कथा आनंद मिट जायेगा,
आज का मनुष्य क्या सोचता है क्या करता हैं ऐसे ही हजारों प्रकार के सवालों की तरह आज भी मैं विचार करता हुआ अपने विचारों में खोया था पहले तो मैं आपको बता दूं कि मैं बचपन से ही एक सामाजिक चिंतक रहा हूं अपने आसपास कुछ भी अगर मैं दुखद होता हुआ देखता हूं तो मैं तुरंत परेशान जाता, 
प्राय दूसरों के दुख दर्द को लेकर चिंतित हो जाना मेरा स्वभाव बनता जा रहा था बता दूंगा कि मैं हमेशा ऐसा नहीं था क्योंकि बचपन में मेरा स्वभाव अलग ही था हंसते रहना दूसरों का हंसना कभी अपना मजाक बन जाना तो कभी दूसरों का मजाक बनाना विदूषक की तरह, बड़ा आनंद आ रहा था बचपन की बात ही अलग है किंतु कहते हैं कि जीवन के पड़ाव में कई बार कुछ परिवर्तन निश्चित है शारीरिक रूप से और मानसिक रूप से दोनो ही जरूरी भी है
1986 के चार-पांच माह पहले ही मुझमे शायद अपने आपमें कुछ अलग परिवर्तन महसूस होने लगे, जाने क्यों ना तो मैं किसी से मजाक करता था और ना किसी से मिलना पसंद करता हूं हमेशा अपने में सोचते रहना यह मेरा स्वभाव बनता जा रहा था प्रश्न तो थे पर उनके उतर की तलाश थी,इससे पहले की मेरे मित्र और मेरे परिवार वाले कुछ चिंतित होने लगे, मैं छोटी-छोटी बातों पर खींजने लगा था, यह कहे कि मैं अलग रहना पसंद करता था कभी अकेले पार्क में बैठे रहना, घंटा घंटा कभी सड़क के किनारे पर बैठकर आने जाने वाले वाहनों को देखकर समय को बिताना,
मुझे अच्छा लगता था अकेलापन आते-जाते हुए लोग, वे सब कहा जा रहे है क्यों जा रहे कब जाओगे, बस ऐसे करोड़ प्रश्न कहा से आ रहे है वे प्रश्न क्या सब को आतै है या मैं ही हु कोन हू मैं
वहां से मेरे जीवन का सबसे बड़ा परिवर्तन हुआ सन 1987 आतै आतै जिसने मेरे जीवन को ही बदल कर रख दिया
 शाम का समय था लगभग 4:00 बजे होंगे सावन को लगे अभी थोडे दिन ही हुए थे आकाश में चारों तरफ बादल दिखाई देने लगे शाम के 4 बजे का समय और बिजली कड़कने लगी अभी तक तो समय अंधेरे का नहीं हुआ था तेज चमक बिजली के कड़कने आकाश में काले बादलों ने शहर को घरना शुरू कर दिया कालै अंधेरे का अनुभव होने लगा, जो अभी तक हल्की हल्की मंद मंद हवा चल रही थी जो अभी तक मौसम खुश गवार था उसने शीघ्र ही आंधी का रूप ले लिया देखते-देखते तेज हवाएं अपने साथ उत्तर की ओर से काले घने बादलों को लेकर आती नजर आने लगी और धीरे-धीरे काले बादलों ने सारे इलाके को घेर लिया जो बादल अभी तक गरज रहे थे अब बरसने की तैयारी में थे मैं खड़ा अपने घर के पास रेलवे लाइन के पहले  पुलिस बूथ जो आज भी है पर पहले न था,पर आते हुए वाहनों को देख रहा था तभी बूंदाबांदी होने लगी और साथ में तेज हवाएं बरसात तेज होने वाली है मन ने कहा,वहीं दूसरी और मन कहने लगा नहीं बसंत का आनंद लिया जाए बरसात में भीगा जाए सावन का महीना अपनी पहली बरसात को लेकर आया था कहते हैं ना कि सावन में बरसात में नहाने से पर पहली बारिश में नहाने से चरमरोग समाप्त हो जाते हैं शरीर का कायाकल्प हो जाता है ऐसे मेरे पिताजी का करते थे मेरे खड़े खड़े ही मानो मन की मुराद पूरी हो गई और मनद बारिश तेज होने लगी और धीरे-धीरे सारे इलाके को बारिश ने घेर लिया बरसात का आनंद ले रहा था भीगने से मुझे हल्के हल्के ठंड भी लगने लगी थी किंतु मुझे इसकी परवाह नहीं थी आप जानते होंगे कि दिल्ली के यमुनापार के इलाकों को उसे उस समय भी पिछड़ा कहा जाता था और अभी भी,
 बहुत सारे इलाके पिछड़े ही माने जाते हैं कभी जमुनापार की दो चीज बहुत मशहूर थी एक शाहदरा का पागलखाना और दूसरा कोड़ी बस्ती
 और पिताजी कहा करतैं थे कि जमुनापार में इसके अलावा कोई आना भी पसंद नहीं करता था आज के विकास ने यमुनापार को दिल्ली का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बना दिया है विशेषकर कोई विशेष सम्मान यमुना पार को आज भी नहीं है आज भी कोई ऑटो वाला और टैक्सी वाला आसानी से यमुनापार जाना नहीं चाहता, क्योंकि यहा ऐसा कुछ है नही जिस के लिए कोई आये,बात शुरू करते हैं अपनी आगे कहानी की, आज मैं आनंद ले रहा था धीरे-धीरे बरसात कभी तेज होने लग जाती कभी कम, जो आनंद की सीमा थी वह अब पानी भरने में जाने वाली थी, यमुनापार आपको मालूम ही है की छोटी सी बारिश हुई नहीं कि चारों ओर पानी भरने लग जाता है हल्की बारिश से ही जमुनापार की पोल खुल जाती है और देखते ही देखते पूरा क्षेत्र बाढ़ जैसी स्थिति में दिखाई देने लग गया, नालियों का पानी सडक पर स्थिति यह थी,कि धीरे-धीरे आम लोगों के घरों तक अंदर पानी जाने लग गया था जिनके घर नीचे थे मैंने अपने घर की ओर रुख करने की तैयारी कर ली मैंने सोचा क्यों ना कि अब बारिश में बहुत भीग चुके हैं ठंड से लगने लगी है अब कपड़ों को बदल लिया जाए, तभी मैंने घर की और कदम बढ़ाया घर आकर मैंने तुरंत अपने कपड़े बदले,
 तभी मम्मी की आवाज आई 
चाय पिएगा
 मैंने हल्के से सर हिलाया 
बोला हां
मम्मी ने चाय लाकर मुझे दी 
अभी मैं चाय पीता 
 तभी बाहर से आवाज आई
 दादा,दादा,दादा
 मैंने बाहर जाकर देखा बाहर अशोक मौर्य मेरा इंतजार कर रहा था इस कहानी में इसका बहुत बड़ा योगदान है खासतौर पर, वह मेरे पड़ोस में ही रहता है आज भी वही है अशोक को पढ़ने लिखने का बहुत शौक है उसका अधिक समय पढ़ने लिखने मे व्यतीत होता है वह उम्र मे मुझसै छोटा हैं अशोक एक सभ्य और समझदार और बेहतरीन लड़का है उसका अचानक आना मेरी समझ में नहीं आया
 क्या बात है 
अशोक मैंने कहा 
आज बरसात में कैसे आया
 दादा पुल के नीचे पानी भर गया चलो देखने चलते हैं 
अशोक ने हंसते हुए कहा
 मैं मुस्कुराकर अशोक के साथ बाहर रेलवे पुल के नीचे पहुंचने लगा यह कांति नगर और बिहारी कॉलोनी के पास वाला रेलवे पुल है जिसके पार श्यामलाल कालेज हैं तब तक यहां ना कोई मेट्रो थी ना कुछ और 
आज मेट्रो का पुल भी है अक्सर पुल के नीचे पानी भर जाता है पुरानी दिल्ली की ओर लोहे के पुल की ओर जाने वाला यह मार्ग बड़ा ही महत्वपूर्ण है प्राय इसी रास्ते से रेल पुरानी दिल्ली की ओर वाया शाहदरा होकर गुजरती है या फिर गाजियाबाद की ओर जाती है इस पुल के नीचे से शाहदरा सीलमपुर श्यामलाल कॉलेज को पार किया जाता है इस पुल के एक तरफ अगर हम काति नगर एक्सटेंशन देखे तो दूसरी और बिहारी कॉलोनी है स्कूल के नीचे अक्सर पंप खराब होने के कारण बरसाती पानी की निकासी नहीं हो पाती अक्सर होता है और इतना पानी जाम हो जाता है कि उस मे मारुति कर आसानी से इसमें डूब जाती थी और डी टी सी की बसे भी आधे आधे पानी में डूब जाती थी जो ज्यादा  जल्दबाजी करके निकलना चाहता था वह फस जाता था और उस दिन भी ऐसा ही हुआ एक डीटीसी की बस और एक कार पानी में डूबी हुई थी बस आधी डूबी थी और दोनों किनारो पर पब्लिक का हजूम भरा था सभी लोग आनंद ले रहे थे जो कोशिश करता है वह पानी में फंस जाता बिहारी कॉलोनी का तमाशा देखने वालों की भीड़ थी अशोक और मैं भी मूकदर्शक होकर ऐसे ही तमाशा देख रहे थे हल्की हल्की बारिश थोडा कम भी हो रही थी और हम भीग भी रहे थे मैंने अशोक से कहा कि आज फिर पिटवाओगे क्या 
अभी कपड़े बदल कर आया हूं 
दोबारा फिर भीग जाऊंगा
अशोक ने कहा दादा कोई बात नहीं 
बरसात कोन सा र्रोज रोज हो रही है
धीरे-धीरे पानी का लेवल बढ़ाना शुरू हो गया था और देखते ही देखते अंधेरा भी होने लगा 2 घंटे हो गए किंतु अभी भी ऐसा लगता था की बरसात नहीं रुकेगी चारों ओर वाहनों की रोशनी ही रोशनी दिखाई दे रही थी पुलिस और जनता मुक्तक होकर तमाशा देख रही थी 
प्रकृति के आगे किसी की क्या चल सकती है मैंने घर लौट जाने का इशारा किया किंतु अशोक का कोई अता पता नहीं है वह दूर निकल चुका था 
भीड़ के साथ-साथ लोगों की मदद कर रहा था 
अशोक मेरे सामने की ओर था  जो वहां छोटे थे वाहन थे वह  इधर-उधर से धक्के मार कर दूसरी साइड से निकाल देते थे लेकिन अचानक मैंने देखा तो मेरे आस-पास नहीं था मैं किसी वाहन वाले को दूसरी ओर से निकलने का रास्ता बता रहा था और मैं जैसे पीछे मुडा वह किसी और से बातों में लग गया लेकिन जैसा होंनी चाहती है 
अशोक मुझे नजर नहीं आया एक सुंदर जवान महिला और उसकी गोद में आठ वर्ष का बच्चा था उसने मुझे रास्ता पूछा और अशोक ने मौके की तलाश में था वह तुरंत मेरे पास आया और उसने दूसरी और उन्हें ले जाने के लिए रास्ता बता दिया लेकिन तभी मेरी निगाह रेलवे पुल की ओर बड़ी रेलवे लाइन पर वहां एक पागल सा दिखने वाला व्यक्ति बार-बार अपनी लाल लाल आंखों से मुझे देख रहा था 
मैंने उसकी तरफ से ध्यान हटाकर फिर भीड़ को देखना शुरू कर दिया
  आप ना चाहते हुए भी उसी और ध्यान दे देते हैं यह होता है मुझे बार-बार लगा कि वह मुझै दैख रहा है
फिर मैं उसकी तरफ में देखना बंद कर देता 
 फटे हुए कपड़े दूर से दिखाई दे रहे थे लंबी दाढ़ी बड़ी-बड़ी आंखें वह मुझे देख रहा था
 मैंने उसे फिर एक बार अनदेखा कर दिया फिर मैं अपने चारों ओर देखा परंतु मुझे कोई ऐसा व्यक्ति नहीं दिखाई दिया 
जो पागल उसे देख रहा था 
वह रेलवे लाइन से नीचे की ओर उतरा
 काले रंग के फटे कपड़े पहना था पैरों में चप्पल नहीं मुख पर और सर पर काले बाल वह भी मिट्टी से भरे हुए पूरा शरीर पानी से भीगा हुआ वह लगभग मुझे देखे जा रहा था उसने जमीन पर पाव पटका  
वह यह बार बार कर रहा था और फिर एक बार नीचे उतर आता 
मुझे लगा शायद पागल ही है 
मैंने उसे देखना बंद कर दिया 
पर क्या करते मुझे लगा कि शायद वो भूखा होगा 
और कुछ खाने की अभिलाषा रखता होगा ना चाहते एक बार फिर मेरी निगाह उस पर पहुंच गई
 वह अपनी हरकतों से बार-बार मुझे आकर्षित कर रहा था जब भी किसी वाहन को दूर से आता हुआ मैं देखता तो उसकी रोशनी सीधा रेलवे लाइन पर पड़ती है जिससे उसकी आंखें चमक जाती 
 अपनी आंखों के नीचे करके घूरने लगता है  वह गुस्से से पागल सा हो जाता है पता नही उसके मन मे क्या चल रहा था अचानक वह पुल से नीचे की ओर तेजी से उतरने लगा
 बरसात के कारण नीचे कीचड़ हो चुकी थीं
 वह किसी सर्कस के खिलाड़ी की तरह दिखाई दे रहा था उसमें बड़ी फुर्ती थे वह तेजी से नीचे उतरता हुआ आया उम्र कुछ अधिक जान नहीं पड़ रही थी 
लगभग उस समय भी उसकी उम्र 45 के आसपास रही होगी पर शरीर उसका 25 का लग रहा था ऐसा लगता था कि उस 45 साल के व्यक्ति में योवन और शक्ति 25 साल की हो
 और मै लगभग में 17 साल का उसके सामने अपने आप को हल्का महसूस कर रहा था 
वह नीचे उतर आया और और वहीं खड़े-खड़े वह मुस्कुराने लगा 
और मुझे देखने लग गया
 उसमे आकर्षित और डरावनी छवि दोनों मिली हुई थी 
फिर वह एक बार से ऊपर की ओर चलने लगा मन कहता था शायद पागल है वह बार-बार उतार रहा है 
गिर जाएगा मैंने मन में कहा
अब तक उसका ध्यान मुझ पर था 
आम पब्लिक का ध्यान भी उसकी ओर होने लग गया 
अब रोड ओर भीड़ को छोड़कर उसको फिसलता भागता हुआ देख रहा था
वह अब नीचे आ गया अब तक भीड़ उसे डर कर पीछे हटने लग थी वह पानी में आया और थोड़ा सा अपने आप को डुबकी लगाने का प्रयास करने लग गया अपने आप को नहलाने के बाद वह तेजी से मेरे पास आकर खड़ा हो गया
कोई मुर्दा अभी अभी कब्र से निकाल कर आया हो उसके शरीर से मुंह से शराब की बदबू आ रही थी
वह मेरे पास खड़ा हो गया जैसे कोई भूखा अपने शिकार को देखा है वह मेरा जायजा ले रहा था अब तक अशोक भी रोड के दूसरी बार बिहारी कॉलोनी पर पहुंच चुका था अब जोर-जोर से सांस भी ले रहा था
डरा डरा भी लग रहा था मैं अपने आपको बड़ा दिलेर मानता था मैरा काफी नाम था किस मामले में आप समझ ही गए होंगे 
वैसे तो लड़ाई के मामले में, मैं भी उस समय 5,7 के लिए भारी पड़ जाता था मैंने कहा ना कि मैं अपने आप को अब बदला बदला महसूस कर रहा था शायद इसी वजह से मैं उसे देखकर अंदर से धीरे-धीरे डरने लगा और डरता भी क्यों ना, वो  6फुट से ऊपर ओर मैं 5 फुट 5 इंच पर उसने मेरे साथ कोई भी ऐसी हरकत नहीं की थी जिसको लेकर मुझे थोड़ा सा आज असावधानी लगे अगर वो मुझे लड़ता तो शायद मैं एक बार फिर से अपने पुरानी अवस्था में आ जाता है वहीं दूसरी और मन के किसी कोने में डर है की वजह से मेरी सिटीपिटी भी गुम हो रही थी मानो जैसे किसी प्राणी ने मुझे अंदर ही अंदर झकड़ लिया हो अभी भी मैं बरसात से भिगता जा रहा था हल्के सी ठंड और कंपन भी मुझे लग रही थी और ठंड की सिहर अब मुझे महसूस हो रही थी और दूसरी और साक्षात ऐसा लगता था काल मेरे सामने खड़ा हो इतनी हल्की-हल्की सर्दी में भी मुझे गर्मी से लगने लगी मैंने अपने अगल-बगल एक बार फिर से अशोक को ढूंढने का प्रयास किया लेकिन किसी से संपर्क ना हो सका किंतु वहां कोई नहीं था मै अकेले था आखिर अशोक दूर था रोड के दूसरे और,
 अब  भी रोड पर लगभग बिहारी कॉलोनी और कांति नगर के मध्य में पानी भरने लग गया अचानक बारिश भी तेज हो चुकी थी फिर क्या था ऐसे  मैं वो प्रेत सा अचानक एकदम मेरे सामने,
 और वो सीधा मेरे सामने आकर अकड़ कर खड़ा हो गया उसे अचानक ही सामने देख 
बरसात से पहले ही भीगा हुआ था अब मेरी जुबान भी हल्की-हल्की सी अटक रही थी उसे देखकर डर के मारे मेरी सांस ऊपर नीचे होने लगी डर के मारे मैंने अपने थूक को भी निगल लिया वहां तो मेरे आस-पास कोई नहीं था किंतु फिर भी मैं अपने आपको अकेला महसूस ना करूं ऐसा मैं प्रयास किया वह भी उसे दिखाने के लिए कि मैं उसे डरता नहीं हूं जो मेरे आस-पास लोग खड़े भी थे वह भी इधर-उधर खिसक गए कहते हैं कि लोग उसके बाद तमाशा बिन है मैं अकेला और वह मेरे सामने उसने भी इधर-उधर देखा फिर अचानक उसने मेरा हाथ पकड़ लिया और हंसने लगा उसके नाखून इतने लंबे थे मुझे ऐसा लगा कि वह मेरे ऊपरी चमड़ी को फाड़ देंगे वह उनको उनमें गाड़ने लगा 
अपने नाखूनों को मेरे बाजू में टाइट करता मैं दर्द से कराह उठा 
अब तो वह और भी भयानक लगने लग गया था उसने मेरे दिमाग की सारी नसों को हिला दिया मैंने उस पागल को अलग करने का प्रयास किया परंतु उसकी पकड़ कितनी मजबूत थी कि मैं अपनी जगह से तो हिल गया लेकिन वह अपनी जगह से ट्स से मस नहीं हो रहा था ऐसा लगता था जैसे जमीन में कोई मजबूत लोहे का खंबा खड़ा हो वह बार-बार कभी हंसी कभी गुस्सा करता पर मेरा हाथ छोड़कर वह राजी नहीं था अब उसे पागल कहूं क्या कहूं मेरी समझ नही आ रहा था मैंने उसे फिर से एक बार धक्का मारने का प्रयास किया दूसरे हाथ से पर जैसे मैं उसकी छाती पर हाथ रखता तो मुझे यूं लगता जैसे कि लोहे का कल खंबा उसमें तीखी दुर्गंध आ रही थी जैसे कच्चै मांस की हो, या कोई पखाने में नहा कर आया हो  कोई उसके पास इसीलिए नहीं खड़ा हो रहा था जब मैंने उसे गौर से देखा तो उसके गले में एक हड्डीयो की माला थी उनकी माला बनाकर धारण किये हुआ था मैंने उसे ऊपर से नीचे तक आकलन करना शुरू कर दिया एक काले रंग का कपड़ा मात्र दो गांठ की तरह गले में बंधा हुआ
 नंगे पांव कीचड़ से सन्ना हुआ शरीर पर कुछ और नहीं था केवल एक वस्त्र के अलावा और गले में कुछ हड्डियां जिसकी इसमें माला बना रखे थी उसके शरीर पर कई दिनों का सूखा मल लगा हो 
बाल चिपके,पर नाक लंबी आंखें बाहर निकली हुई जैसे सही मायने में कोई मुर्दा हो उसकी दो लंबी जटा थी जो लोगों को आकर्षित कर रही थी 
वो जोर से झटका तब तक मैं भी अपने होश में आ चुका था वह मुझे देख कर फिर से मुस्कुराया मैं तो वैसे ही डर हुआ था इधर-उधर निगाहों से अशोक को ढूंढ रहा था कभी आकाश की तरफ देखा और कभी अशोक की तरफ किंतु मुझे अशोक कहीं दूर तक नजर नहीं आया उसने मेरी तरफ देखा वह अब तक मुझे भाप चुका था भारी आवाज में उसने मुझसे कहा मैं 
कोई पागल नहीं हूं
 मैं तुझे पागल लगता हूं 
मैंने कहा नहीं
 मैंने ऐसा नहीं कहा
मुझे मालूम सब मालूम वो बोला
 तुम्हारे मे से तो बदबू आ रही है मैंने उसे धीरे से कहा,
 नहाते क्यों नहीं हो
 उसने मुझे गुस्से से देखा था
 अभी नहा तो था
 मैंने कहा तो फिर यह बदबू क्यों नहीं जाती 
यह मेरा श्रृंगार है वह मुस्कराया
 मैकप मैकप मुस्कराया वो
 उसने कहा
 इसके बिना मैं अधूरा हू
इस दुनिया में ऐसा कुछ भी नहीं जो व्यर्थ हो 
सब भोग के लिए और सभी उपयोग के लिए 
मैंने कहा मुझसे क्या चाहते हो
 भूख लगी है
 क्या खाना खाओगे 
उसको जान पड़ गया था कि मैं डरा हूं उसने कहा डरने की जरूरत नहीं मैं कोई पागल नहीं हूं
अब वह शांत था
 हम समय तेरा ही है 
जब समय आता है 
तभी हम किसी से मिलते हैं बिना शिव की इच्छा के कुछ नहीं होता
 मैं उसके शब्दों को सुनकर चौंक गया इसे कैसे मालूम हवा 
कि मैं इसे पागल समझ रहा हूं
 नहीं नहीं मैंने आपको पागल नहीं कहा,मैं बोला
 मैं तो आपको जानता भी नहीं
 फिर मैं आपको कुछ क्यों कहूंगा 
वह हा हा हा करके जोर से हंस
 फिर बोला मैं जानता हूं 
मैं सब जानता हूं
 मैं तुझे भी जानता हूं
 पर तू मुझे नहीं जानता भले तूने कुछ नहीं कहा पर मैं समझता बहुत कुछ हूं क्या नाम है एकाएक वह बोला
  कुछ देर रुक कर मैं बोला
 मैंने धीरे से वि  वि विनय
 मैंने अटक अटककर बोला
  पर तेरा नाम तो हरविंदर है 
 और पिता का नाम देवराज
 तू देवराज का लड़का है ना
 वह गुस्से से बोला
 मानो कोई मेरा पुराना मिलने वाला हो बहुत ही ज्यादा नजदीकी
 उसकी बात सुनकर मैं हैरान था 
 इसे कैसे सब मालूम 
जबकि मैं इसे कभी मिला नही
 मैं जानता ही नहीं मैंने कभी देखा ही नहीं 
 सब मेरे बारे में कैसा जानता यह बहुत दूर था जब मैं कभी अध्यात्म में या फिर सही मायने में धर्म को भी नहीं जानता था अभी तो हम योग क्षेत्र में केवल योग अभ्यास पर ही पड़े थे प्रातः 4:00 बजे उठकर मैं अशोक नीरज कश्मीर सभी लोग पार्क जाकर योग किया करते थे बस इतना ही हमारा परिचय था पर अध्यात्म क्या होता है या फिर ईश्वरी मार्ग क्या है हमें इसकी एबीसी नहीं मालूम हैरान हो गया कि मैं मेरे स्कूल का नाम भी जानता है वह भी जानता है कि घर में लोग मुझे आसपास लोग देने के नाम से बुलाते हैं कोई भी नहीं कोई बिना जिसका जैसी भावना वैसे नाम से बुला लेता है मेरी स्थिति देखकर मैं जोर से हंस मानो ऐसा लगा जैसे आकाश में बिजली पुणे उसने इधर-उधर देखा और मेरा हाथ पकड़ कर प्लेन की ओर ले जाने लगा वह मुझे धकेलता हुआ ले जाना था मैं कोशिश कर रहा था की छूट जाऊं पर मैं किसी चीज को समझ नहीं पा रहा था वह मुझे अपने साथ खींचता हुआ लेंगे किसी का भी ध्यान ही शोर नहीं हुआ वह मुझे खेलता हुआ ले गया मैं भी धीरे-धीरे स्पेशल बड़ी पगडंडी पर उसके साथ चलना आरंभ कर देता मैंने मां से भी उसका विरोध नहीं किया जाने क्यों ऐसा हुआ मैं नहीं जानता मैं खुद हैरान था कि ऐसा क्यों हो रहा है कि मैं धीरे-धीरे उसकी ओर खींचना जा रहा हूं उसने मेरा हाथ और टाइट पड़ा ताकि मैं फिसल ना जाऊं बोल संभाल कर आना फिसल सकते हो मैं बड़े आराम के साथ उसके साथ चले जा रहा था शायद उसने मुझे अपने संबंध में ले लिया था अब तक पर मेरा हाथ भी छोड़ चुका था मैं उसके पीछे पीछे चलना आरंभ कर चुका था वह स्थिति भाग चुका था मैंने उसका किसी भी प्रकार से विरोध नहीं किया मैं किसी अच्छे शिकारी की तरह मुझको अपने जाल में फंसा कर साथ में लेट जा रहा था वह मुझे रेलवे लाइन पर ले आया और रेलवे लाइन के ठीक पीछे एक सुनसान जंगल से पड़ता है कभी यहां पर खेत हुआ करते थे और खेत और रेलवे लाइन के मध्य में यह सुनसान जगह जहां कोई नहीं आता जाता हां कुछ लोग रेलवे लाइन पर आज भी मल विसर्जन के लिए आते हैं लेकिन इधर कोई नहीं आता आज के टाइम पर स्थान पर बड़ा सुंदर सा मेट्रो स्टेशन वेलकम मेट्रो स्टेशन बन चुका है बात कर रहा हूं थोड़ी दूरी पर यहां मछली पालन केंद्र भी हुआ करता था और उन दोनों के मध्य में यह पूरा हल्का सा जंगली पेड़ पौधे गाने पौधे और कच्ची भूमि के कारण ही निश्चित की चढ़े की चढ़ रहे थे परंतु ऐसे जा रहा था जैसे मानो अंधेरे में उसकी आंखें किसी टोर्च की बातें हो वह कीचड़ और अंधेरे का फर्क अच्छी तरह से जानता था वह ऐसे चल रहा था मानव जैसे रात का कोई हिरण हो एक जगह ऊंची निगाह देखकर वह रुक गया वहां पीछे उसने एक छोटा सा स्थान पर एक तंबू सा लगा रखा था जो खाली पन्ने से बना हुआ था शायद वह नहीं रह रहा था एक तो वह खुद कल उसके कपड़े कल ऊपर से उसका घर भी कर यानी कि टेंट भी कला उसने एक बार फिर से मेरी कलाई को तेजी से पकड़ा और मजबूती से लेकर उसे टेंट के अंदर बैठने के लिए घुस गया उसे स्टैंड के अंदर इतनी जगह थी कि चार लोग आसानी से बैठ सके आराम से बैठ सके अंधेरे को दूर करने के लिए उसने एक हल्का सा दिया और जला दिया टेंट में रोशनी चार और फैल गई अब तक बरसात भी अपने प्रकोप को दिखाकर शांत हो चुकी थी कुछ देर रुक कर कुछ खाएगा नहीं मैंने कुछ नहीं खाऊंगा मैं कर खिला दिया मैंने आंखें उठाकर उसे देखा और वह मुझे देखकर मुस्कुराने लगा अब तक मैं जान चुका था कि व्यक्ति कोई साधारण इंसान नहीं है इसलिए इसकी मैं सब बात सुन रहा था शायद कोई और होता तो अब तक दोनों टांगों में हाथ देकर जमीन पर पटक भी दे चुका होता मैं आप उसकी बातों को हल्का नहीं ले रहा था और ना ही मैं उसकी बातों से आप चौकाने वाला था इस संसार में कुछ भी संभव नहीं ऐसा मेरे मन में हमेशा से रहा है किंतु मां के किसी को नहीं का डर जो इंसानी डर होता है वह हमेशा मंडलाकार सोच रहा था छोड़ घर की ओर चल तुझे यहां नहीं ठहरता है पर मां का दूसरा कोना भी अपनी बात को सोते अपने सामने रख रहा था तुरंत उसने झूले में एक हाथ डाला और कुछ खाने के लिए निकला वह लाल रंग के दो सब थे एक को खाते-खाते बोला तो भी खाली शर्म मत कर तंदूरी मुर्गा खाएगा क्या मैंने कहा नहीं मैं खाना खाकर आया हूं मैं नॉनवेज नहीं खाता मैं जोर से हंस खाएगा खाएगा एक मुर्गा सा निकला और अपने थोड़ी देर में चले जाना अब तक सब खाने के बाद में उसने मेरे सर पर बड़े प्यार से हाथ तेरा और बोला चिंता ना कर तो आगे सब कुछ खा लेगा आदमी को भी खा जाएगा उसे समय की फिल्मों का असर भी मुझ पर जाना पड़ता था क्योंकि फिल्मों में अक्सर ऐसी चीज हमेशा दिखाई पड़ती हैं मैं कोई हीरो नहीं पर लेकिन गलत भी नहीं मैं जोर से हंसने लग गया तुझे कोई जाने ना जाने एक दिन दुनिया जाने की उसने तुरंत अपनी दोनों आंखें बंद कर ली और मेरे सर पर हाथ फेरना लग गया क्या अपने आप को जानने की इच्छा होती है क्या बोला क्या मेरे बाद में जाना चाहता है क्योंकि तेरा मन बार-बार यही सवाल कर रहा है कि मैं कौन हूं इतने में बात जोर से बिजली कड़की मानो ऐसा लगा कि हमारे टेंट पर जाकर गिरेंगे उसने आसमान की ओर हाथ उठाया और गुस्से से चिल्लाया चल कहीं और जा मेरी ओर देखा बोल चिंता ना करी यहां कोई नहीं आ सकता तभी तक अशोक मुझे रेलवे लाइन पर जाता हुआ देख चुका था और वह मेरे पीछे-पीछे जाकर जोर से चिल्लाने लगा तो मैं उसे कहां दिख रहा था क्योंकि मैं नीचे खाद में बैठा हुआ था मुझे छोटे बेकार नहीं गया तब तक वह महात्मा बोला अब तक मैं समझ चुका था तब तक मैं यह भी नहीं जानता था कि नाथ क्या होते हैं अघोरी क्या होते हैं संन्यासी के आते हैं साधु किसको कहते हैं यह सब मेरे ऊपर की बातें थी मैं तो केवल इतना ही जानता था कि यह हिंदू है या मुसलमान है यह बनिया है यह फैलाना है उसे बातों को अलग करते हैं मुझे ढूंढने की चिंता कर रहा था तब तक वह पागल बोला चिंता मत कर तुझे कोई नहीं ढूंढा और ना ही तुझे कोई ढूंढने वाला है तेरे घर वाले भी ना ढूंढेंगे तुझे अब तक मुझे यूं लग चुका था कि आठ बज चुके हैं मैंने उससे कहा आप मुझे घर जाना होगा एक बार फिर से बोलो चिंता मत कर ऐसा कोई नहीं जो तुझे ढूंढेगा तुझे इसमें को ढूंढना है किसी को तेरी चिंता नहीं है अब तक उसकी आवाज में बदलाव आ चुका था एक फोन और एक कड़कपन उसकी आवाज को स्पष्ट कंपन दे रहा था अब तक महसूस होने लगा वह मुझे ऊपर से नीचे तक घूमने लगा साधारण सा तो लगता है कौन है तू क्यों मुझे तेरे लिए भेजा गया है यह मैं भी नहीं समझ पाया खैर प्रकृति ने जो काम दिया वह हमें करना होगा उसकी बात को सुनकर मैं चोका मेरे लिए, प्रकृति क्या करें कोई नहीं जानता मानो अब वह किसी बच्चे की तरह मुझे मेरी ओर देख रहा था अब उसकी भाषा शैली भी बदलने लगे थे हां अबे तू से आप पर आ गया था आपके लिए भेजा गया है मुझे मेरा हाथ में हाथ पकड़ कर मैं बच्चों की तरह रोने लग गया बोला आप चाहो आपको जाना चाहिए जो चाहिए ले जाओ पद याद रखना कुछ दिनों के लिए मैं आपके लिए जमुना के किनारे हिंदी काम बहुत घाट शमशान घाट के पास में अपना डेरा डालूंगा मन करे तो आ जाना मन में मैंने उसे नमन किया हाथ जोड़ और टेंट से बाहर निकल गया मैं वह मेरे जाने से एट बार-बार आंखें बंद करके आकाश की और कुछ भूत बन रहा था और वह मुझे जाता हुआ देख रहा था अब तक बरसात पूरे बंद हो चुके थे रेलवे लाइन के दूसरी और अशोक खड़ा मेरा इंतजार कर रहा था धीरे-धीरे हम अपने घर की ओर चल पड़े तभी अशोक ने पीछे से आवाज लगाई दादा दादा मैं पीछे मुड़कर क्यों दिखा मैं मुझे भूल रहा था जैसे कुछ तलाश रहा मैं धीरे से मुस्कुरा दिया और मुख नीचे करके घर की ओर चलने लगा घर नहीं चलोगे दादा बहुत देर हो गई ऐसा नहीं था कि रेलवे लाइन पर हम पहली बार आए हैं यही हमारा एक अखाड करता था क्या बात है कुछ परेशान लग रहे हो कुछ परेशान लग रहे हो मैंने सरल दिया नहीं कोई बात नहीं बस मन हल्का सा उदास है हम धीरे-धीरे अपने घर की ओर चल दिए ऐसा नहीं था की रेलवे लाइन पर हम पहली बार आए हैं यही पास में गली नंबर 5 है जहां हम लोगों ने मिलकर एक व्यायाम करने के लिए अखाड़ा बनाया हुआ है सुबह शाम जहां हमारी पंचायत लगती है यानी कि सभी मिलकर योग पहलवानी और अपने-अपने एक्सेस करते हैं कल शाम कल शाम तुम्हारे घर आऊंगा वही बात करेंगे मैं अशोक से कहा अशोक ने धीरे से सर हिला दिया वहीं मैं घर आकर अपनी उदासी और अपनी सोच में लग गया अभी आवाज आई खाना खा ले यह मेरी मां थी मैंने धीरे से सर हिलाया और चुपचाप उनके पीछे चल दिया फिर मैं किसी से बात नहीं की खाना खाकर मैं छत पर आकर बैठ गया मैं ज्यादा अधिकतर जब समय मिलता था तो छत पर अकेला ही सोना पसंद करता हूं सर्दी के आरंभ में दिवाली से लगभग कुछ पहले तक जब हल्की-हल्की सोंधी-सुंधी हवाएं सर्दी का रूप लेती थी उसके बाद ही हम लोग अपने कमरे में सोना पसंद करते थे नहीं तो अक्सर बाहर सोने से मुझे ज्यादा आनंद आता था घर के अंदर सोते हुए मुझे महसूस होता था कि दम घुस रहा है मुझे खुली हवाओं का बहुत शौक था इसलिए कोशिश यह करता था कि ज्यादा से ज्यादा मैं हवाओं का आनंद लूं मुझे नहीं मालूम था कि एक दिन यह मुझे घुमक्कड़ साधु बना देंगे ऐसी ही ठंडी ठंडी सौंदी सौंदी हवा में अचानक मेरी आंख लग गई कुदरत की हवा में अपना ही एक अलग आनंद एक नशा है प्रातः के पांच बज चुके थे और मैं कुछ लोगों के साथ एक कुटिया में बैठा हुआ हूं मेरी आयु लगभग  28 वर्ष की रही हो गई
मेरे समुख पक्का पक्का धुंआ बना हुआ था जो किसी संन्यासी का जान पड़ता था जिसके एक किनारे पर पीतल का चमकता हुआ त्रिशूल लगा था धोने में अग्नि धीरे-धीरे जल रही थी मैं तन पर मात्र एक पीला कपड़ा बांध रखा था जिससे मेरे तन का कुछ हिस्सा ही ढाका था मैं उन लोगों की बातें सुन रहा था वह गांव के लोग आपस में किसी बात पर उलझे हुए थे तो मैं उनकी बात पर गौर नहीं कर रहा था मैं जान किसी और ही उलझन में था इसमें मुझे भी मालूम न था किंतु इन सब के बाद भी मैं धोने में कुछ हमें हवन सामग्री डालना नहीं भूलता था इस बार भी मैं हवन सामग्री को धोने की ओर अग्नि में डाल दिया हम उसे सकरी में गूगल की मात्रा अधिक थी सामग्री के अग्नि में जाते ही तेज धुआ और गूगल की गंध चारों ओर तेजी से फैलने लगी कहते हैं कि जब कभी भी कोई साधारण इंसान या कोई नास्तिक व्यक्ति भी किसी साधु की कुटिया में जाता है तो धोने की पवित्रता और वहां की गढ़ कुछ समय के लिए उसके मन को भी बदल देती है या यूं कहें कि शमशान में चिता को जलते देखा अच्छे से अच्छा और बुरे से बड़ा व्यक्ति भी कुछ समय के लिए अपने मुख से हरि नाम का ही उठता है या फिर उदासीन हो ही जाता है इस दुनिया में शास्त्र कहते हैं सब बेकार है कुछ साथ नहीं जाता सब झूठी मोह माया और उसके अलावा कुछ नहीं फिर शेरों की अपेक्षा गांव में आज भी लोग धार्मिक सदाचारी नेक और परोपकारी है साधु का संघ करना उन्हें बहुत प्रिय है साधु संतों की सेवा करना यह अपना धर्म मानते हैं ऐसी बातों में ही वह सभी आपस में लगे थे यहां मैं कुछ छह माह से रह रहा था और यहां के लोगों का आपस में बड़ा लगाव था यहां कुछ छह माह से रहते रहते लोगों से मुझे बहुत प्रेम मिल रहा था प्राय में प्रातः और साइन जब भी किसी समय लगता उन लोगों को अपने पास बुला लेता या वह लोग अपने खेतों से जब भी फ्री होते खाली होते मुझे ए मिलते यह उनका लगाव था महिलाएं भी अपना घर का काम छोड़कर या पूरा करके मुझे ज्ञान की बात सुनने के लिए आ ही जाती थी अमीर गरीब स्त्री पुरुष बालक सभी घरों का काम कई बार मेरे समझ आकर भी करते रहते थे अमीरी गरीबी गांव में शहीद ही होती हो सभी एक समान थे जो मेरा किसी के साथ कोई भेदभाव नहीं था मैं भी इन्हें अपना ही मानता था किंतु मेरे पास हमेशा दूसरों के कल्याण की भावना रहती थी अगर कोई आपस में ऊंचा बोलते भी तो मैं उन्हें शांत कर एक कर देता मां के किसी कोने में यही भाव था कि संत और दरिया हमेशा बहता रहे तो अच्छा रहता है यदि रुक जाए तो दोनों में विकार उत्पन्न होता है मुझे यहां 6 माह का समय हो गया था अब जान पड़ता था और यहां से निकलना ही पड़ेगा यहां मैं अभी तक सबसे अधिक समय तक रहा था जाने क्यों,अपने गुरुदेव की आज्ञा से मैं यहां था यहां से अधिक समय क्यों लगा यह वही जानते हैं मेरा मेरा तन और मां अच्छी तरह से जानता है अधिक समय एक स्थान पर रुकना मोह को पैदा करता है जो कि संन्यासी के लिए संत के लिए दुखदाई होता है जाने क्यों मुझे कुछ दिनों से अधिक व्याकुलता हो रही थी जैसे कुछ अलग ही घटना वाला हो मां के किसी कोने में डर भाई पैदा हो रहा था मेरे गुरुदेव एक महान सिद्ध हस्त महायोगी है और वह जो भी करते हैं निश्चित है वह मेरे हित और समाज के हित के लिए ही होगा पर मन तो मन है कहां किसी की सुनता है शास्त्र कहते हैं जब आप किसी कार्य में लगते हैं या अध्यात्म में लगते हैं तो इसलिए तालमेल होने वाली घटनाओं को पहले से आपके मध्य में उतरना आरंभ कर देते हैं वही भाई मेरे मन में बार-बार पैदा हो रहा था तंत्र और संत समाज में उनका नाम सभी लोग बड़ी श्रद्धा से लेते थे मुझे गर्व है कि मैं ऐसे ही महायोगी का शिष्य हूं और उनकी मुझ पर कुछ विशेष ही कृपा दृष्टि भी है मंत्र 8 वर्ष की कठिन तपस्या से ही उन्होंने मुझे तंत्र के हर अध्याय का सिद्ध हस्त योग बना दिया था आज जी सिद्धि को सिद्ध हस्त करने के लिए बड़े से बड़े योगी और तांत्रिक को 40 दिन लगते थे वही कार्य में मात्र 14 दिन में सिद्ध हस्त कर लेता था ऐसा मेरे गुरुदेव कहते हैं उनका मानना है कि यह मेरे पूर्व जन्म के संस्कार हैंमुझे लगता है कि यह भले बातें हो लेकिन मेरा गुरु के प्रति विश्वास कहता है यह उनका आशीर्वाद है उनका समय उनकी प्रेम की एक दृष्टि मात्र से मेरा रोम रोम जागृत हुआ है जो कुछ है उन्हें का है इसीलिए मैं बार-बार कहता हूं कि गुरु का देना भी क्षारीय सुन री और इंसान गुरु ही जीवन सार है गुरु परम की खान आज उनकी कृपा से मैं 64 योगिनी यो समस्त क्रियो और 10 महाविद्याओं का सिद्ध हठ योगी हूं या यूं कहें कि गुरुदेव की कृपा से ही मेरे इष्ट शिव के आशीर्वाद से आज मैं सही मायने में इंसानी डे के लिए जितनी कलाएं जरूरी है उससे अधिक में पूर्ण कर चुका हूं आवश्यकता है तो बस अब 16 कलाओं को पूर्ण करने की ऐसा मेरे गुरुदेव कहते हैं आज एक बार पुणे मेरा मन इस शान से कुछ चार्ट होने लगा था और मै