Monday, February 19, 2024

अघोरा (रहस्य ओर रोमांच की अदभुद कहानी

अघोरा 
रहस्य रोमांच और परा विज्ञान की अनोखी कथा
12 दिसंबर 2023
आज फिर से एक बार मन हुआ कि अपने जीवन की उन पुरानी कहानियों को फिर से शुरू करें,जिसे लिखने में कई बार हमने आनाकानी की और सोचा कि इस अध्याय को लिखो न तो ज्यादा अच्छा है, क्योंकि कुछ चीज जीवन में ऐसी भी होती हैं जो आम व्यक्ति की सोच से परे होती हैं जिन्हें  पचाना उनके लिए आसान नहीं होता,क्या करें मन के किसी कोने में सत्य को उजागर करना भी निश्चित किया गया है यह जो मैं लिख रहा हूं यह सत्य कथा कहे या इसे कुछ और अब  ये आप पर हैं, मन आये तो सच मानना या कहानी मानकर आनन्द लेना,अब ये आप पर छोड़ता हुं,
आज से ठीक 2003 में इसे अन कही घटना को लिखाना आरंभ किया था मैंने, इस कथा के लगभग 50 पन्ने लिखने के बाद में इस कथा को रोक दिया, आज ठीक 2023 में फिर से इस अध्याय को शुरू करते हैं कहानी कहे या इतिहास हमेशा दोहराया जाता है दुनिया में कुछ भी ऐसा नहीं जिसे आप छुपा सके आप अपने भीतर के सत्य को उजागर किए बिना ना तो जी पाएंगे और ना मर पाएंगे, इस संसार में जिस कर्म को लेकर आप इस धरती पर जन्मे हैं निश्चित है कि आपको उसे आपको ही पूरा करना होगा और जो भी काम आपको दिया गया है यदि आप उसे अधूरा छोड़ते हैं तो सांसारिक कर्म की तरह आवागमन करना होगा क्योंकि कोई भी अपने कार्य को पूरा किए बिना परमेश्वर तक नहीं जा सकते है  मेरी इच्छा थी इस कथा को वा हीं विराम दे दिया जाए और इसे कभी लिखा ना जाए, लेकिन 2023 बहुत कुछ लेकर चला गया,...
 फिर कुछ लोग ऐसे मिले जो लोग जीवन के सत्य को जानने के साथ-साथ इस ब्रह्मांड के रहस्य को भी जानना चाहते हैं पूर्व  जन्म की योगिनी रमिका के आग्रह पर ये कथा आरम्भ होती हैं ये कथा आप के भीतरी चक्षु खोल सकती हैं तो चलिए एक बार फिर से ना चाहते हुए इस कथा को वहीं से शुरू करते हैं जहां इसे विराम दिया गया या रोक दिया गया
 यह बात 1986 की है वहीं से शुरू करते हैं जहां से यह कहानी शुरू हुई है आज के समय में जीवन जीना कोई सरल काम नहीं है पर मुझे लगता है कि आगे आने वाला समय मनुष्य  के लिए ओर कठिन होगा भगवान ही मालिक है इस दुनिया का, 
करोड़ो वर्ष इस दुनिया पर डायनासोर की प्रजाति ने राज किया पर मनुष्य के मात्र 100 वर्ष के विकास ने मनुष्य को अंत की ओर बढ़ा दिया है जोकि यह वह जीव हैं जिसे आयै मात्र डेढ़ लाख वर्ष ही हुए हैं भविष्य दर्शन आयेगा आगे फिर बात करेंगे नही कथा आनंद मिट जायेगा,
आज का मनुष्य क्या सोचता है क्या करता हैं ऐसे ही हजारों प्रकार के सवालों की तरह आज भी मैं विचार करता हुआ अपने विचारों में खोया था पहले तो मैं आपको बता दूं कि मैं बचपन से ही एक सामाजिक चिंतक रहा हूं अपने आसपास कुछ भी अगर मैं दुखद होता हुआ देखता हूं तो मैं तुरंत परेशान जाता, 
प्राय दूसरों के दुख दर्द को लेकर चिंतित हो जाना मेरा स्वभाव बनता जा रहा था बता दूंगा कि मैं हमेशा ऐसा नहीं था क्योंकि बचपन में मेरा स्वभाव अलग ही था हंसते रहना दूसरों का हंसना कभी अपना मजाक बन जाना तो कभी दूसरों का मजाक बनाना विदूषक की तरह, बड़ा आनंद आ रहा था बचपन की बात ही अलग है किंतु कहते हैं कि जीवन के पड़ाव में कई बार कुछ परिवर्तन निश्चित है शारीरिक रूप से और मानसिक रूप से दोनो ही जरूरी भी है
1986 के चार-पांच माह पहले ही मुझमे शायद अपने आपमें कुछ अलग परिवर्तन महसूस होने लगे, जाने क्यों ना तो मैं किसी से मजाक करता था और ना किसी से मिलना पसंद करता हूं हमेशा अपने में सोचते रहना यह मेरा स्वभाव बनता जा रहा था प्रश्न तो थे पर उनके उतर की तलाश थी,इससे पहले की मेरे मित्र और मेरे परिवार वाले कुछ चिंतित होने लगे, मैं छोटी-छोटी बातों पर खींजने लगा था, यह कहे कि मैं अलग रहना पसंद करता था कभी अकेले पार्क में बैठे रहना, घंटा घंटा कभी सड़क के किनारे पर बैठकर आने जाने वाले वाहनों को देखकर समय को बिताना,
मुझे अच्छा लगता था अकेलापन आते-जाते हुए लोग, वे सब कहा जा रहे है क्यों जा रहे कब जाओगे, बस ऐसे करोड़ प्रश्न कहा से आ रहे है वे प्रश्न क्या सब को आतै है या मैं ही हु कोन हू मैं
वहां से मेरे जीवन का सबसे बड़ा परिवर्तन हुआ सन 1987 आतै आतै जिसने मेरे जीवन को ही बदल कर रख दिया
 शाम का समय था लगभग 4:00 बजे होंगे सावन को लगे अभी थोडे दिन ही हुए थे आकाश में चारों तरफ बादल दिखाई देने लगे शाम के 4 बजे का समय और बिजली कड़कने लगी अभी तक तो समय अंधेरे का नहीं हुआ था तेज चमक बिजली के कड़कने आकाश में काले बादलों ने शहर को घरना शुरू कर दिया कालै अंधेरे का अनुभव होने लगा, जो अभी तक हल्की हल्की मंद मंद हवा चल रही थी जो अभी तक मौसम खुश गवार था उसने शीघ्र ही आंधी का रूप ले लिया देखते-देखते तेज हवाएं अपने साथ उत्तर की ओर से काले घने बादलों को लेकर आती नजर आने लगी और धीरे-धीरे काले बादलों ने सारे इलाके को घेर लिया जो बादल अभी तक गरज रहे थे अब बरसने की तैयारी में थे मैं खड़ा अपने घर के पास रेलवे लाइन के पहले  पुलिस बूथ जो आज भी है पर पहले न था,पर आते हुए वाहनों को देख रहा था तभी बूंदाबांदी होने लगी और साथ में तेज हवाएं बरसात तेज होने वाली है मन ने कहा,वहीं दूसरी और मन कहने लगा नहीं बसंत का आनंद लिया जाए बरसात में भीगा जाए सावन का महीना अपनी पहली बरसात को लेकर आया था कहते हैं ना कि सावन में बरसात में नहाने से पर पहली बारिश में नहाने से चरमरोग समाप्त हो जाते हैं शरीर का कायाकल्प हो जाता है ऐसे मेरे पिताजी का करते थे मेरे खड़े खड़े ही मानो मन की मुराद पूरी हो गई और मनद बारिश तेज होने लगी और धीरे-धीरे सारे इलाके को बारिश ने घेर लिया बरसात का आनंद ले रहा था भीगने से मुझे हल्के हल्के ठंड भी लगने लगी थी किंतु मुझे इसकी परवाह नहीं थी आप जानते होंगे कि दिल्ली के यमुनापार के इलाकों को उसे उस समय भी पिछड़ा कहा जाता था और अभी भी,
 बहुत सारे इलाके पिछड़े ही माने जाते हैं कभी जमुनापार की दो चीज बहुत मशहूर थी एक शाहदरा का पागलखाना और दूसरा कोड़ी बस्ती
 और पिताजी कहा करतैं थे कि जमुनापार में इसके अलावा कोई आना भी पसंद नहीं करता था आज के विकास ने यमुनापार को दिल्ली का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बना दिया है विशेषकर कोई विशेष सम्मान यमुना पार को आज भी नहीं है आज भी कोई ऑटो वाला और टैक्सी वाला आसानी से यमुनापार जाना नहीं चाहता, क्योंकि यहा ऐसा कुछ है नही जिस के लिए कोई आये,बात शुरू करते हैं अपनी आगे कहानी की, आज मैं आनंद ले रहा था धीरे-धीरे बरसात कभी तेज होने लग जाती कभी कम, जो आनंद की सीमा थी वह अब पानी भरने में जाने वाली थी, यमुनापार आपको मालूम ही है की छोटी सी बारिश हुई नहीं कि चारों ओर पानी भरने लग जाता है हल्की बारिश से ही जमुनापार की पोल खुल जाती है और देखते ही देखते पूरा क्षेत्र बाढ़ जैसी स्थिति में दिखाई देने लग गया, नालियों का पानी सडक पर स्थिति यह थी,कि धीरे-धीरे आम लोगों के घरों तक अंदर पानी जाने लग गया था जिनके घर नीचे थे मैंने अपने घर की ओर रुख करने की तैयारी कर ली मैंने सोचा क्यों ना कि अब बारिश में बहुत भीग चुके हैं ठंड से लगने लगी है अब कपड़ों को बदल लिया जाए, तभी मैंने घर की और कदम बढ़ाया घर आकर मैंने तुरंत अपने कपड़े बदले,
 तभी मम्मी की आवाज आई 
चाय पिएगा
 मैंने हल्के से सर हिलाया 
बोला हां
मम्मी ने चाय लाकर मुझे दी 
अभी मैं चाय पीता 
 तभी बाहर से आवाज आई
 दादा,दादा,दादा
 मैंने बाहर जाकर देखा बाहर अशोक मौर्य मेरा इंतजार कर रहा था इस कहानी में इसका बहुत बड़ा योगदान है खासतौर पर, वह मेरे पड़ोस में ही रहता है आज भी वही है अशोक को पढ़ने लिखने का बहुत शौक है उसका अधिक समय पढ़ने लिखने मे व्यतीत होता है वह उम्र मे मुझसै छोटा हैं अशोक एक सभ्य और समझदार और बेहतरीन लड़का है उसका अचानक आना मेरी समझ में नहीं आया
 क्या बात है 
अशोक मैंने कहा 
आज बरसात में कैसे आया
 दादा पुल के नीचे पानी भर गया चलो देखने चलते हैं 
अशोक ने हंसते हुए कहा
 मैं मुस्कुराकर अशोक के साथ बाहर रेलवे पुल के नीचे पहुंचने लगा यह कांति नगर और बिहारी कॉलोनी के पास वाला रेलवे पुल है जिसके पार श्यामलाल कालेज हैं तब तक यहां ना कोई मेट्रो थी ना कुछ और 
आज मेट्रो का पुल भी है अक्सर पुल के नीचे पानी भर जाता है पुरानी दिल्ली की ओर लोहे के पुल की ओर जाने वाला यह मार्ग बड़ा ही महत्वपूर्ण है प्राय इसी रास्ते से रेल पुरानी दिल्ली की ओर वाया शाहदरा होकर गुजरती है या फिर गाजियाबाद की ओर जाती है इस पुल के नीचे से शाहदरा सीलमपुर श्यामलाल कॉलेज को पार किया जाता है इस पुल के एक तरफ अगर हम काति नगर एक्सटेंशन देखे तो दूसरी और बिहारी कॉलोनी है स्कूल के नीचे अक्सर पंप खराब होने के कारण बरसाती पानी की निकासी नहीं हो पाती अक्सर होता है और इतना पानी जाम हो जाता है कि उस मे मारुति कर आसानी से इसमें डूब जाती थी और डी टी सी की बसे भी आधे आधे पानी में डूब जाती थी जो ज्यादा  जल्दबाजी करके निकलना चाहता था वह फस जाता था और उस दिन भी ऐसा ही हुआ एक डीटीसी की बस और एक कार पानी में डूबी हुई थी बस आधी डूबी थी और दोनों किनारो पर पब्लिक का हजूम भरा था सभी लोग आनंद ले रहे थे जो कोशिश करता है वह पानी में फंस जाता बिहारी कॉलोनी का तमाशा देखने वालों की भीड़ थी अशोक और मैं भी मूकदर्शक होकर ऐसे ही तमाशा देख रहे थे हल्की हल्की बारिश थोडा कम भी हो रही थी और हम भीग भी रहे थे मैंने अशोक से कहा कि आज फिर पिटवाओगे क्या 
अभी कपड़े बदल कर आया हूं 
दोबारा फिर भीग जाऊंगा
अशोक ने कहा दादा कोई बात नहीं 
बरसात कोन सा र्रोज रोज हो रही है
धीरे-धीरे पानी का लेवल बढ़ाना शुरू हो गया था और देखते ही देखते अंधेरा भी होने लगा 2 घंटे हो गए किंतु अभी भी ऐसा लगता था की बरसात नहीं रुकेगी चारों ओर वाहनों की रोशनी ही रोशनी दिखाई दे रही थी पुलिस और जनता मुक्तक होकर तमाशा देख रही थी 
प्रकृति के आगे किसी की क्या चल सकती है मैंने घर लौट जाने का इशारा किया किंतु अशोक का कोई अता पता नहीं है वह दूर निकल चुका था 
भीड़ के साथ-साथ लोगों की मदद कर रहा था 
अशोक मेरे सामने की ओर था  जो वहां छोटे थे वाहन थे वह  इधर-उधर से धक्के मार कर दूसरी साइड से निकाल देते थे लेकिन अचानक मैंने देखा तो मेरे आस-पास नहीं था मैं किसी वाहन वाले को दूसरी ओर से निकलने का रास्ता बता रहा था और मैं जैसे पीछे मुडा वह किसी और से बातों में लग गया लेकिन जैसा होंनी चाहती है 
अशोक मुझे नजर नहीं आया एक सुंदर जवान महिला और उसकी गोद में आठ वर्ष का बच्चा था उसने मुझे रास्ता पूछा और अशोक ने मौके की तलाश में था वह तुरंत मेरे पास आया और उसने दूसरी और उन्हें ले जाने के लिए रास्ता बता दिया लेकिन तभी मेरी निगाह रेलवे पुल की ओर बड़ी रेलवे लाइन पर वहां एक पागल सा दिखने वाला व्यक्ति बार-बार अपनी लाल लाल आंखों से मुझे देख रहा था 
मैंने उसकी तरफ से ध्यान हटाकर फिर भीड़ को देखना शुरू कर दिया
  आप ना चाहते हुए भी उसी और ध्यान दे देते हैं यह होता है मुझे बार-बार लगा कि वह मुझै दैख रहा है
फिर मैं उसकी तरफ में देखना बंद कर देता 
 फटे हुए कपड़े दूर से दिखाई दे रहे थे लंबी दाढ़ी बड़ी-बड़ी आंखें वह मुझे देख रहा था
 मैंने उसे फिर एक बार अनदेखा कर दिया फिर मैं अपने चारों ओर देखा परंतु मुझे कोई ऐसा व्यक्ति नहीं दिखाई दिया 
जो पागल उसे देख रहा था 
वह रेलवे लाइन से नीचे की ओर उतरा
 काले रंग के फटे कपड़े पहना था पैरों में चप्पल नहीं मुख पर और सर पर काले बाल वह भी मिट्टी से भरे हुए पूरा शरीर पानी से भीगा हुआ वह लगभग मुझे देखे जा रहा था उसने जमीन पर पाव पटका  
वह यह बार बार कर रहा था और फिर एक बार नीचे उतर आता 
मुझे लगा शायद पागल ही है 
मैंने उसे देखना बंद कर दिया 
पर क्या करते मुझे लगा कि शायद वो भूखा होगा 
और कुछ खाने की अभिलाषा रखता होगा ना चाहते एक बार फिर मेरी निगाह उस पर पहुंच गई
 वह अपनी हरकतों से बार-बार मुझे आकर्षित कर रहा था जब भी किसी वाहन को दूर से आता हुआ मैं देखता तो उसकी रोशनी सीधा रेलवे लाइन पर पड़ती है जिससे उसकी आंखें चमक जाती 
 अपनी आंखों के नीचे करके घूरने लगता है  वह गुस्से से पागल सा हो जाता है पता नही उसके मन मे क्या चल रहा था अचानक वह पुल से नीचे की ओर तेजी से उतरने लगा
 बरसात के कारण नीचे कीचड़ हो चुकी थीं
 वह किसी सर्कस के खिलाड़ी की तरह दिखाई दे रहा था उसमें बड़ी फुर्ती थे वह तेजी से नीचे उतरता हुआ आया उम्र कुछ अधिक जान नहीं पड़ रही थी 
लगभग उस समय भी उसकी उम्र 45 के आसपास रही होगी पर शरीर उसका 25 का लग रहा था ऐसा लगता था कि उस 45 साल के व्यक्ति में योवन और शक्ति 25 साल की हो
 और मै लगभग में 17 साल का उसके सामने अपने आप को हल्का महसूस कर रहा था 
वह नीचे उतर आया और और वहीं खड़े-खड़े वह मुस्कुराने लगा 
और मुझे देखने लग गया
 उसमे आकर्षित और डरावनी छवि दोनों मिली हुई थी 
फिर वह एक बार से ऊपर की ओर चलने लगा मन कहता था शायद पागल है वह बार-बार उतार रहा है 
गिर जाएगा मैंने मन में कहा
अब तक उसका ध्यान मुझ पर था 
आम पब्लिक का ध्यान भी उसकी ओर होने लग गया 
अब रोड ओर भीड़ को छोड़कर उसको फिसलता भागता हुआ देख रहा था
वह अब नीचे आ गया अब तक भीड़ उसे डर कर पीछे हटने लग थी वह पानी में आया और थोड़ा सा अपने आप को डुबकी लगाने का प्रयास करने लग गया अपने आप को नहलाने के बाद वह तेजी से मेरे पास आकर खड़ा हो गया
कोई मुर्दा अभी अभी कब्र से निकाल कर आया हो उसके शरीर से मुंह से शराब की बदबू आ रही थी
वह मेरे पास खड़ा हो गया जैसे कोई भूखा अपने शिकार को देखा है वह मेरा जायजा ले रहा था अब तक अशोक भी रोड के दूसरी बार बिहारी कॉलोनी पर पहुंच चुका था अब जोर-जोर से सांस भी ले रहा था
डरा डरा भी लग रहा था मैं अपने आपको बड़ा दिलेर मानता था मैरा काफी नाम था किस मामले में आप समझ ही गए होंगे 
वैसे तो लड़ाई के मामले में, मैं भी उस समय 5,7 के लिए भारी पड़ जाता था मैंने कहा ना कि मैं अपने आप को अब बदला बदला महसूस कर रहा था शायद इसी वजह से मैं उसे देखकर अंदर से धीरे-धीरे डरने लगा और डरता भी क्यों ना, वो  6फुट से ऊपर ओर मैं 5 फुट 5 इंच पर उसने मेरे साथ कोई भी ऐसी हरकत नहीं की थी जिसको लेकर मुझे थोड़ा सा आज असावधानी लगे अगर वो मुझे लड़ता तो शायद मैं एक बार फिर से अपने पुरानी अवस्था में आ जाता है वहीं दूसरी और मन के किसी कोने में डर है की वजह से मेरी सिटीपिटी भी गुम हो रही थी मानो जैसे किसी प्राणी ने मुझे अंदर ही अंदर झकड़ लिया हो अभी भी मैं बरसात से भिगता जा रहा था हल्के सी ठंड और कंपन भी मुझे लग रही थी और ठंड की सिहर अब मुझे महसूस हो रही थी और दूसरी और साक्षात ऐसा लगता था काल मेरे सामने खड़ा हो इतनी हल्की-हल्की सर्दी में भी मुझे गर्मी से लगने लगी मैंने अपने अगल-बगल एक बार फिर से अशोक को ढूंढने का प्रयास किया लेकिन किसी से संपर्क ना हो सका किंतु वहां कोई नहीं था मै अकेले था आखिर अशोक दूर था रोड के दूसरे और,
 अब  भी रोड पर लगभग बिहारी कॉलोनी और कांति नगर के मध्य में पानी भरने लग गया अचानक बारिश भी तेज हो चुकी थी फिर क्या था ऐसे  मैं वो प्रेत सा अचानक एकदम मेरे सामने,
 और वो सीधा मेरे सामने आकर अकड़ कर खड़ा हो गया उसे अचानक ही सामने देख 
बरसात से पहले ही भीगा हुआ था अब मेरी जुबान भी हल्की-हल्की सी अटक रही थी उसे देखकर डर के मारे मेरी सांस ऊपर नीचे होने लगी डर के मारे मैंने अपने थूक को भी निगल लिया वहां तो मेरे आस-पास कोई नहीं था किंतु फिर भी मैं अपने आपको अकेला महसूस ना करूं ऐसा मैं प्रयास किया वह भी उसे दिखाने के लिए कि मैं उसे डरता नहीं हूं जो मेरे आस-पास लोग खड़े भी थे वह भी इधर-उधर खिसक गए कहते हैं कि लोग उसके बाद तमाशा बिन है मैं अकेला और वह मेरे सामने उसने भी इधर-उधर देखा फिर अचानक उसने मेरा हाथ पकड़ लिया और हंसने लगा उसके नाखून इतने लंबे थे मुझे ऐसा लगा कि वह मेरे ऊपरी चमड़ी को फाड़ देंगे वह उनको उनमें गाड़ने लगा 
अपने नाखूनों को मेरे बाजू में टाइट करता मैं दर्द से कराह उठा 
अब तो वह और भी भयानक लगने लग गया था उसने मेरे दिमाग की सारी नसों को हिला दिया मैंने उस पागल को अलग करने का प्रयास किया परंतु उसकी पकड़ कितनी मजबूत थी कि मैं अपनी जगह से तो हिल गया लेकिन वह अपनी जगह से ट्स से मस नहीं हो रहा था ऐसा लगता था जैसे जमीन में कोई मजबूत लोहे का खंबा खड़ा हो वह बार-बार कभी हंसी कभी गुस्सा करता पर मेरा हाथ छोड़कर वह राजी नहीं था अब उसे पागल कहूं क्या कहूं मेरी समझ नही आ रहा था मैंने उसे फिर से एक बार धक्का मारने का प्रयास किया दूसरे हाथ से पर जैसे मैं उसकी छाती पर हाथ रखता तो मुझे यूं लगता जैसे कि लोहे का कल खंबा उसमें तीखी दुर्गंध आ रही थी जैसे कच्चै मांस की हो, या कोई पखाने में नहा कर आया हो  कोई उसके पास इसीलिए नहीं खड़ा हो रहा था जब मैंने उसे गौर से देखा तो उसके गले में एक हड्डीयो की माला थी उनकी माला बनाकर धारण किये हुआ था मैंने उसे ऊपर से नीचे तक आकलन करना शुरू कर दिया एक काले रंग का कपड़ा मात्र दो गांठ की तरह गले में बंधा हुआ
 नंगे पांव कीचड़ से सन्ना हुआ शरीर पर कुछ और नहीं था केवल एक वस्त्र के अलावा और गले में कुछ हड्डियां जिसकी इसमें माला बना रखे थी उसके शरीर पर कई दिनों का सूखा मल लगा हो 
बाल चिपके,पर नाक लंबी आंखें बाहर निकली हुई जैसे सही मायने में कोई मुर्दा हो उसकी दो लंबी जटा थी जो लोगों को आकर्षित कर रही थी 
वो जोर से झटका तब तक मैं भी अपने होश में आ चुका था वह मुझे देख कर फिर से मुस्कुराया मैं तो वैसे ही डर हुआ था इधर-उधर निगाहों से अशोक को ढूंढ रहा था कभी आकाश की तरफ देखा और कभी अशोक की तरफ किंतु मुझे अशोक कहीं दूर तक नजर नहीं आया उसने मेरी तरफ देखा वह अब तक मुझे भाप चुका था भारी आवाज में उसने मुझसे कहा मैं 
कोई पागल नहीं हूं
 मैं तुझे पागल लगता हूं 
मैंने कहा नहीं
 मैंने ऐसा नहीं कहा
मुझे मालूम सब मालूम वो बोला
 तुम्हारे मे से तो बदबू आ रही है मैंने उसे धीरे से कहा,
 नहाते क्यों नहीं हो
 उसने मुझे गुस्से से देखा था
 अभी नहा तो था
 मैंने कहा तो फिर यह बदबू क्यों नहीं जाती 
यह मेरा श्रृंगार है वह मुस्कराया
 मैकप मैकप मुस्कराया वो
 उसने कहा
 इसके बिना मैं अधूरा हू
इस दुनिया में ऐसा कुछ भी नहीं जो व्यर्थ हो 
सब भोग के लिए और सभी उपयोग के लिए 
मैंने कहा मुझसे क्या चाहते हो
 भूख लगी है
 क्या खाना खाओगे 
उसको जान पड़ गया था कि मैं डरा हूं उसने कहा डरने की जरूरत नहीं मैं कोई पागल नहीं हूं
अब वह शांत था
 हम समय तेरा ही है 
जब समय आता है 
तभी हम किसी से मिलते हैं बिना शिव की इच्छा के कुछ नहीं होता
 मैं उसके शब्दों को सुनकर चौंक गया इसे कैसे मालूम हवा 
कि मैं इसे पागल समझ रहा हूं
 नहीं नहीं मैंने आपको पागल नहीं कहा,मैं बोला
 मैं तो आपको जानता भी नहीं
 फिर मैं आपको कुछ क्यों कहूंगा 
वह हा हा हा करके जोर से हंस
 फिर बोला मैं जानता हूं 
मैं सब जानता हूं
 मैं तुझे भी जानता हूं
 पर तू मुझे नहीं जानता भले तूने कुछ नहीं कहा पर मैं समझता बहुत कुछ हूं क्या नाम है एकाएक वह बोला
  कुछ देर रुक कर मैं बोला
 मैंने धीरे से वि  वि विनय
 मैंने अटक अटककर बोला
  पर तेरा नाम तो हरविंदर है 
 और पिता का नाम देवराज
 तू देवराज का लड़का है ना
 वह गुस्से से बोला
 मानो कोई मेरा पुराना मिलने वाला हो बहुत ही ज्यादा नजदीकी
 उसकी बात सुनकर मैं हैरान था 
 इसे कैसे सब मालूम 
जबकि मैं इसे कभी मिला नही
 मैं जानता ही नहीं मैंने कभी देखा ही नहीं 
 सब मेरे बारे में कैसा जानता यह बहुत दूर था जब मैं कभी अध्यात्म में या फिर सही मायने में धर्म को भी नहीं जानता था अभी तो हम योग क्षेत्र में केवल योग अभ्यास पर ही पड़े थे प्रातः 4:00 बजे उठकर मैं अशोक नीरज कश्मीर सभी लोग पार्क जाकर योग किया करते थे बस इतना ही हमारा परिचय था पर अध्यात्म क्या होता है या फिर ईश्वरी मार्ग क्या है हमें इसकी एबीसी नहीं मालूम हैरान हो गया कि मैं मेरे स्कूल का नाम भी जानता है वह भी जानता है कि घर में लोग मुझे आसपास लोग देने के नाम से बुलाते हैं कोई भी नहीं कोई बिना जिसका जैसी भावना वैसे नाम से बुला लेता है मेरी स्थिति देखकर मैं जोर से हंस मानो ऐसा लगा जैसे आकाश में बिजली पुणे उसने इधर-उधर देखा और मेरा हाथ पकड़ कर प्लेन की ओर ले जाने लगा वह मुझे धकेलता हुआ ले जाना था मैं कोशिश कर रहा था की छूट जाऊं पर मैं किसी चीज को समझ नहीं पा रहा था वह मुझे अपने साथ खींचता हुआ लेंगे किसी का भी ध्यान ही शोर नहीं हुआ वह मुझे खेलता हुआ ले गया मैं भी धीरे-धीरे स्पेशल बड़ी पगडंडी पर उसके साथ चलना आरंभ कर देता मैंने मां से भी उसका विरोध नहीं किया जाने क्यों ऐसा हुआ मैं नहीं जानता मैं खुद हैरान था कि ऐसा क्यों हो रहा है कि मैं धीरे-धीरे उसकी ओर खींचना जा रहा हूं उसने मेरा हाथ और टाइट पड़ा ताकि मैं फिसल ना जाऊं बोल संभाल कर आना फिसल सकते हो मैं बड़े आराम के साथ उसके साथ चले जा रहा था शायद उसने मुझे अपने संबंध में ले लिया था अब तक पर मेरा हाथ भी छोड़ चुका था मैं उसके पीछे पीछे चलना आरंभ कर चुका था वह स्थिति भाग चुका था मैंने उसका किसी भी प्रकार से विरोध नहीं किया मैं किसी अच्छे शिकारी की तरह मुझको अपने जाल में फंसा कर साथ में लेट जा रहा था वह मुझे रेलवे लाइन पर ले आया और रेलवे लाइन के ठीक पीछे एक सुनसान जंगल से पड़ता है कभी यहां पर खेत हुआ करते थे और खेत और रेलवे लाइन के मध्य में यह सुनसान जगह जहां कोई नहीं आता जाता हां कुछ लोग रेलवे लाइन पर आज भी मल विसर्जन के लिए आते हैं लेकिन इधर कोई नहीं आता आज के टाइम पर स्थान पर बड़ा सुंदर सा मेट्रो स्टेशन वेलकम मेट्रो स्टेशन बन चुका है बात कर रहा हूं थोड़ी दूरी पर यहां मछली पालन केंद्र भी हुआ करता था और उन दोनों के मध्य में यह पूरा हल्का सा जंगली पेड़ पौधे गाने पौधे और कच्ची भूमि के कारण ही निश्चित की चढ़े की चढ़ रहे थे परंतु ऐसे जा रहा था जैसे मानो अंधेरे में उसकी आंखें किसी टोर्च की बातें हो वह कीचड़ और अंधेरे का फर्क अच्छी तरह से जानता था वह ऐसे चल रहा था मानव जैसे रात का कोई हिरण हो एक जगह ऊंची निगाह देखकर वह रुक गया वहां पीछे उसने एक छोटा सा स्थान पर एक तंबू सा लगा रखा था जो खाली पन्ने से बना हुआ था शायद वह नहीं रह रहा था एक तो वह खुद कल उसके कपड़े कल ऊपर से उसका घर भी कर यानी कि टेंट भी कला उसने एक बार फिर से मेरी कलाई को तेजी से पकड़ा और मजबूती से लेकर उसे टेंट के अंदर बैठने के लिए घुस गया उसे स्टैंड के अंदर इतनी जगह थी कि चार लोग आसानी से बैठ सके आराम से बैठ सके अंधेरे को दूर करने के लिए उसने एक हल्का सा दिया और जला दिया टेंट में रोशनी चार और फैल गई अब तक बरसात भी अपने प्रकोप को दिखाकर शांत हो चुकी थी कुछ देर रुक कर कुछ खाएगा नहीं मैंने कुछ नहीं खाऊंगा मैं कर खिला दिया मैंने आंखें उठाकर उसे देखा और वह मुझे देखकर मुस्कुराने लगा अब तक मैं जान चुका था कि व्यक्ति कोई साधारण इंसान नहीं है इसलिए इसकी मैं सब बात सुन रहा था शायद कोई और होता तो अब तक दोनों टांगों में हाथ देकर जमीन पर पटक भी दे चुका होता मैं आप उसकी बातों को हल्का नहीं ले रहा था और ना ही मैं उसकी बातों से आप चौकाने वाला था इस संसार में कुछ भी संभव नहीं ऐसा मेरे मन में हमेशा से रहा है किंतु मां के किसी को नहीं का डर जो इंसानी डर होता है वह हमेशा मंडलाकार सोच रहा था छोड़ घर की ओर चल तुझे यहां नहीं ठहरता है पर मां का दूसरा कोना भी अपनी बात को सोते अपने सामने रख रहा था तुरंत उसने झूले में एक हाथ डाला और कुछ खाने के लिए निकला वह लाल रंग के दो सब थे एक को खाते-खाते बोला तो भी खाली शर्म मत कर तंदूरी मुर्गा खाएगा क्या मैंने कहा नहीं मैं खाना खाकर आया हूं मैं नॉनवेज नहीं खाता मैं जोर से हंस खाएगा खाएगा एक मुर्गा सा निकला और अपने थोड़ी देर में चले जाना अब तक सब खाने के बाद में उसने मेरे सर पर बड़े प्यार से हाथ तेरा और बोला चिंता ना कर तो आगे सब कुछ खा लेगा आदमी को भी खा जाएगा उसे समय की फिल्मों का असर भी मुझ पर जाना पड़ता था क्योंकि फिल्मों में अक्सर ऐसी चीज हमेशा दिखाई पड़ती हैं मैं कोई हीरो नहीं पर लेकिन गलत भी नहीं मैं जोर से हंसने लग गया तुझे कोई जाने ना जाने एक दिन दुनिया जाने की उसने तुरंत अपनी दोनों आंखें बंद कर ली और मेरे सर पर हाथ फेरना लग गया क्या अपने आप को जानने की इच्छा होती है क्या बोला क्या मेरे बाद में जाना चाहता है क्योंकि तेरा मन बार-बार यही सवाल कर रहा है कि मैं कौन हूं इतने में बात जोर से बिजली कड़की मानो ऐसा लगा कि हमारे टेंट पर जाकर गिरेंगे उसने आसमान की ओर हाथ उठाया और गुस्से से चिल्लाया चल कहीं और जा मेरी ओर देखा बोल चिंता ना करी यहां कोई नहीं आ सकता तभी तक अशोक मुझे रेलवे लाइन पर जाता हुआ देख चुका था और वह मेरे पीछे-पीछे जाकर जोर से चिल्लाने लगा तो मैं उसे कहां दिख रहा था क्योंकि मैं नीचे खाद में बैठा हुआ था मुझे छोटे बेकार नहीं गया तब तक वह महात्मा बोला अब तक मैं समझ चुका था तब तक मैं यह भी नहीं जानता था कि नाथ क्या होते हैं अघोरी क्या होते हैं संन्यासी के आते हैं साधु किसको कहते हैं यह सब मेरे ऊपर की बातें थी मैं तो केवल इतना ही जानता था कि यह हिंदू है या मुसलमान है यह बनिया है यह फैलाना है उसे बातों को अलग करते हैं मुझे ढूंढने की चिंता कर रहा था तब तक वह पागल बोला चिंता मत कर तुझे कोई नहीं ढूंढा और ना ही तुझे कोई ढूंढने वाला है तेरे घर वाले भी ना ढूंढेंगे तुझे अब तक मुझे यूं लग चुका था कि आठ बज चुके हैं मैंने उससे कहा आप मुझे घर जाना होगा एक बार फिर से बोलो चिंता मत कर ऐसा कोई नहीं जो तुझे ढूंढेगा तुझे इसमें को ढूंढना है किसी को तेरी चिंता नहीं है अब तक उसकी आवाज में बदलाव आ चुका था एक फोन और एक कड़कपन उसकी आवाज को स्पष्ट कंपन दे रहा था अब तक महसूस होने लगा वह मुझे ऊपर से नीचे तक घूमने लगा साधारण सा तो लगता है कौन है तू क्यों मुझे तेरे लिए भेजा गया है यह मैं भी नहीं समझ पाया खैर प्रकृति ने जो काम दिया वह हमें करना होगा उसकी बात को सुनकर मैं चोका मेरे लिए, प्रकृति क्या करें कोई नहीं जानता मानो अब वह किसी बच्चे की तरह मुझे मेरी ओर देख रहा था अब उसकी भाषा शैली भी बदलने लगे थे हां अबे तू से आप पर आ गया था आपके लिए भेजा गया है मुझे मेरा हाथ में हाथ पकड़ कर मैं बच्चों की तरह रोने लग गया बोला आप चाहो आपको जाना चाहिए जो चाहिए ले जाओ पद याद रखना कुछ दिनों के लिए मैं आपके लिए जमुना के किनारे हिंदी काम बहुत घाट शमशान घाट के पास में अपना डेरा डालूंगा मन करे तो आ जाना मन में मैंने उसे नमन किया हाथ जोड़ और टेंट से बाहर निकल गया मैं वह मेरे जाने से एट बार-बार आंखें बंद करके आकाश की और कुछ भूत बन रहा था और वह मुझे जाता हुआ देख रहा था अब तक बरसात पूरे बंद हो चुके थे रेलवे लाइन के दूसरी और अशोक खड़ा मेरा इंतजार कर रहा था धीरे-धीरे हम अपने घर की ओर चल पड़े तभी अशोक ने पीछे से आवाज लगाई दादा दादा मैं पीछे मुड़कर क्यों दिखा मैं मुझे भूल रहा था जैसे कुछ तलाश रहा मैं धीरे से मुस्कुरा दिया और मुख नीचे करके घर की ओर चलने लगा घर नहीं चलोगे दादा बहुत देर हो गई ऐसा नहीं था कि रेलवे लाइन पर हम पहली बार आए हैं यही हमारा एक अखाड करता था क्या बात है कुछ परेशान लग रहे हो कुछ परेशान लग रहे हो मैंने सरल दिया नहीं कोई बात नहीं बस मन हल्का सा उदास है हम धीरे-धीरे अपने घर की ओर चल दिए ऐसा नहीं था की रेलवे लाइन पर हम पहली बार आए हैं यही पास में गली नंबर 5 है जहां हम लोगों ने मिलकर एक व्यायाम करने के लिए अखाड़ा बनाया हुआ है सुबह शाम जहां हमारी पंचायत लगती है यानी कि सभी मिलकर योग पहलवानी और अपने-अपने एक्सेस करते हैं कल शाम कल शाम तुम्हारे घर आऊंगा वही बात करेंगे मैं अशोक से कहा अशोक ने धीरे से सर हिला दिया वहीं मैं घर आकर अपनी उदासी और अपनी सोच में लग गया अभी आवाज आई खाना खा ले यह मेरी मां थी मैंने धीरे से सर हिलाया और चुपचाप उनके पीछे चल दिया फिर मैं किसी से बात नहीं की खाना खाकर मैं छत पर आकर बैठ गया मैं ज्यादा अधिकतर जब समय मिलता था तो छत पर अकेला ही सोना पसंद करता हूं सर्दी के आरंभ में दिवाली से लगभग कुछ पहले तक जब हल्की-हल्की सोंधी-सुंधी हवाएं सर्दी का रूप लेती थी उसके बाद ही हम लोग अपने कमरे में सोना पसंद करते थे नहीं तो अक्सर बाहर सोने से मुझे ज्यादा आनंद आता था घर के अंदर सोते हुए मुझे महसूस होता था कि दम घुस रहा है मुझे खुली हवाओं का बहुत शौक था इसलिए कोशिश यह करता था कि ज्यादा से ज्यादा मैं हवाओं का आनंद लूं मुझे नहीं मालूम था कि एक दिन यह मुझे घुमक्कड़ साधु बना देंगे ऐसी ही ठंडी ठंडी सौंदी सौंदी हवा में अचानक मेरी आंख लग गई कुदरत की हवा में अपना ही एक अलग आनंद एक नशा है प्रातः के पांच बज चुके थे और मैं कुछ लोगों के साथ एक कुटिया में बैठा हुआ हूं मेरी आयु लगभग  28 वर्ष की रही हो गई
मेरे समुख पक्का पक्का धुंआ बना हुआ था जो किसी संन्यासी का जान पड़ता था जिसके एक किनारे पर पीतल का चमकता हुआ त्रिशूल लगा था धोने में अग्नि धीरे-धीरे जल रही थी मैं तन पर मात्र एक पीला कपड़ा बांध रखा था जिससे मेरे तन का कुछ हिस्सा ही ढाका था मैं उन लोगों की बातें सुन रहा था वह गांव के लोग आपस में किसी बात पर उलझे हुए थे तो मैं उनकी बात पर गौर नहीं कर रहा था मैं जान किसी और ही उलझन में था इसमें मुझे भी मालूम न था किंतु इन सब के बाद भी मैं धोने में कुछ हमें हवन सामग्री डालना नहीं भूलता था इस बार भी मैं हवन सामग्री को धोने की ओर अग्नि में डाल दिया हम उसे सकरी में गूगल की मात्रा अधिक थी सामग्री के अग्नि में जाते ही तेज धुआ और गूगल की गंध चारों ओर तेजी से फैलने लगी कहते हैं कि जब कभी भी कोई साधारण इंसान या कोई नास्तिक व्यक्ति भी किसी साधु की कुटिया में जाता है तो धोने की पवित्रता और वहां की गढ़ कुछ समय के लिए उसके मन को भी बदल देती है या यूं कहें कि शमशान में चिता को जलते देखा अच्छे से अच्छा और बुरे से बड़ा व्यक्ति भी कुछ समय के लिए अपने मुख से हरि नाम का ही उठता है या फिर उदासीन हो ही जाता है इस दुनिया में शास्त्र कहते हैं सब बेकार है कुछ साथ नहीं जाता सब झूठी मोह माया और उसके अलावा कुछ नहीं फिर शेरों की अपेक्षा गांव में आज भी लोग धार्मिक सदाचारी नेक और परोपकारी है साधु का संघ करना उन्हें बहुत प्रिय है साधु संतों की सेवा करना यह अपना धर्म मानते हैं ऐसी बातों में ही वह सभी आपस में लगे थे यहां मैं कुछ छह माह से रह रहा था और यहां के लोगों का आपस में बड़ा लगाव था यहां कुछ छह माह से रहते रहते लोगों से मुझे बहुत प्रेम मिल रहा था प्राय में प्रातः और साइन जब भी किसी समय लगता उन लोगों को अपने पास बुला लेता या वह लोग अपने खेतों से जब भी फ्री होते खाली होते मुझे ए मिलते यह उनका लगाव था महिलाएं भी अपना घर का काम छोड़कर या पूरा करके मुझे ज्ञान की बात सुनने के लिए आ ही जाती थी अमीर गरीब स्त्री पुरुष बालक सभी घरों का काम कई बार मेरे समझ आकर भी करते रहते थे अमीरी गरीबी गांव में शहीद ही होती हो सभी एक समान थे जो मेरा किसी के साथ कोई भेदभाव नहीं था मैं भी इन्हें अपना ही मानता था किंतु मेरे पास हमेशा दूसरों के कल्याण की भावना रहती थी अगर कोई आपस में ऊंचा बोलते भी तो मैं उन्हें शांत कर एक कर देता मां के किसी कोने में यही भाव था कि संत और दरिया हमेशा बहता रहे तो अच्छा रहता है यदि रुक जाए तो दोनों में विकार उत्पन्न होता है मुझे यहां 6 माह का समय हो गया था अब जान पड़ता था और यहां से निकलना ही पड़ेगा यहां मैं अभी तक सबसे अधिक समय तक रहा था जाने क्यों,अपने गुरुदेव की आज्ञा से मैं यहां था यहां से अधिक समय क्यों लगा यह वही जानते हैं मेरा मेरा तन और मां अच्छी तरह से जानता है अधिक समय एक स्थान पर रुकना मोह को पैदा करता है जो कि संन्यासी के लिए संत के लिए दुखदाई होता है जाने क्यों मुझे कुछ दिनों से अधिक व्याकुलता हो रही थी जैसे कुछ अलग ही घटना वाला हो मां के किसी कोने में डर भाई पैदा हो रहा था मेरे गुरुदेव एक महान सिद्ध हस्त महायोगी है और वह जो भी करते हैं निश्चित है वह मेरे हित और समाज के हित के लिए ही होगा पर मन तो मन है कहां किसी की सुनता है शास्त्र कहते हैं जब आप किसी कार्य में लगते हैं या अध्यात्म में लगते हैं तो इसलिए तालमेल होने वाली घटनाओं को पहले से आपके मध्य में उतरना आरंभ कर देते हैं वही भाई मेरे मन में बार-बार पैदा हो रहा था तंत्र और संत समाज में उनका नाम सभी लोग बड़ी श्रद्धा से लेते थे मुझे गर्व है कि मैं ऐसे ही महायोगी का शिष्य हूं और उनकी मुझ पर कुछ विशेष ही कृपा दृष्टि भी है मंत्र 8 वर्ष की कठिन तपस्या से ही उन्होंने मुझे तंत्र के हर अध्याय का सिद्ध हस्त योग बना दिया था आज जी सिद्धि को सिद्ध हस्त करने के लिए बड़े से बड़े योगी और तांत्रिक को 40 दिन लगते थे वही कार्य में मात्र 14 दिन में सिद्ध हस्त कर लेता था ऐसा मेरे गुरुदेव कहते हैं उनका मानना है कि यह मेरे पूर्व जन्म के संस्कार हैंमुझे लगता है कि यह भले बातें हो लेकिन मेरा गुरु के प्रति विश्वास कहता है यह उनका आशीर्वाद है उनका समय उनकी प्रेम की एक दृष्टि मात्र से मेरा रोम रोम जागृत हुआ है जो कुछ है उन्हें का है इसीलिए मैं बार-बार कहता हूं कि गुरु का देना भी क्षारीय सुन री और इंसान गुरु ही जीवन सार है गुरु परम की खान आज उनकी कृपा से मैं 64 योगिनी यो समस्त क्रियो और 10 महाविद्याओं का सिद्ध हठ योगी हूं या यूं कहें कि गुरुदेव की कृपा से ही मेरे इष्ट शिव के आशीर्वाद से आज मैं सही मायने में इंसानी डे के लिए जितनी कलाएं जरूरी है उससे अधिक में पूर्ण कर चुका हूं आवश्यकता है तो बस अब 16 कलाओं को पूर्ण करने की ऐसा मेरे गुरुदेव कहते हैं आज एक बार पुणे मेरा मन इस शान से कुछ चार्ट होने लगा था और मै
 

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