Wednesday, May 8, 2024

वेदस्य निर्मलं चक्षु ज्योतिषशास्त्रमकल्मषम् विनैतदखिलं श्रीतमा कर्म न सिद्ध्यति।

 ●ज्योतिष में धर्म प्रतिष्ठित है। धर्म में ज्योतिष समाहित है। धार्मिक ज्योतिषी होता है। ज्योतिषी धार्मिक होता है। जहाँ ज्योतिष नहीं, वहाँ धर्म नहीं। जहाँ धर्म नहीं, वहाँ ज्योतिष नहीं। ज्योतिष सिद्धान्त मात्र नहीं है। अपितु वह फलीभूत है। फलित बिना सिद्धान्त व्यर्थ है। जैसे वृक्ष फल के बिना। आम्रादि वृक्षों में यदि मधुर स्वादिष्ट फल न लगे तो इन का इतना महत्व ही न रहे। जिस सिद्धान्त/ ज्ञान से मनुष्य का कल्याण न हो, वह महत्वहीन है। ऐसे ही सिद्धान्त ज्योतिष के साथ फलितशास्त्र अभिन्न रूप से है। सिद्धान्त है तो फलित है। फलित है तो सिद्धान्त है। इन में से जो एक को स्वीकार करे, दूसरे को नहीं तो वह बालक है, विज्ञ नहीं। नारद जी कहते हैं ...

"वेदस्य निर्मलं चक्षु ज्योतिषशास्त्रमकल्मषम्
विनैतदखिलं श्रीतमा कर्म न सिद्ध्यति।
तस्माज्जगद्धितायेदं ब्रह्मणा रचितं पुरा,
अतएव द्विजैः एतद् अध्येतव्यं प्रयत्नतः इति ।।"
√●[ अकल्मष है, यह ज्योतिषशास्त्र यह ज्ञान का निर्मल नेत्र है। बिना इसके सम्पूर्ण श्रौत स्मार्त कम की सिद्धि नहीं होती है। इसलिये विश्वकल्याण हेतु ब्रह्मा जी ने सर्वप्रथम इस को रचा। अतः ब्राहाणों को प्रयत्नपूर्वक इसका अध्ययन करना चाहिये । ]
√●इस ज्योतिषशास्त्र की गहराइयों में में बार-बार गोते लगाता रहा हूँ। इसके अतल तल से कभी-कभी रत्न प्राप्त होते हैं। उन रत्नों को मैं अपने पास रखना उचित नहीं समझता। श्री पं. जी के चरणों में मस्तक झुका कर मैं इन्हें वैष्णव जनों को अर्पित करता हूँ। श्री पं. जी अनुग्रहपूर्वक इसे स्वीकार करते हैं। इससे मैं कृतार्थ हूँ।
√●श्री राम नाम के प्रताप से मुझे एक मणि मिली है। इसमें ८४ फलक हैं। इस मणि में २५२ कोनें हैं। यह अद्भुत मणि है। सर्व कार्मार्थ, यह प्रयोज्य है। मुझे अपने घर में दो ग्रन्थों के दर्शन हुए। प्रथम ग्रंथ है-८४ वैष्णवों की वार्ता द्वितीय ग्रंथ है- २५२ वैष्णवों की वार्ता । इन ग्रन्थों को मैं पढ़ा नहीं हूँ। मेरे मन में ८४ एवं २५२ की संख्याएँ तब से मँडरा रही हैं। इन संख्याओं की सिद्धि मुझे अब हुई है। यह महती भगवत्कृपा है नाम संकीर्तन एवं श्रवण से जब बुद्धि के ऊपर पड़ी मैल छिल गई, तभी इसका बोध हुआ।
"नाम शुभं वृद्धिकरं प्रशस्तं
मांगल्यमेवाथ तथा यशस्यम् ।
जयावहं धर्मभरावहं च
दुःस्वप्नाशं परिकीर्त्यमानम् ।
करोति पापं च तथा विहन्ति
श्रृण्वन् सदा नाम सहस्ररत्नम् ।
पुण्यं च पुष्ट्यभ्युदयावहं
नारायस्येष्ट मुरारकीर्तेः ॥"
( व्यास जी)
√●शरीर आत्मा का वाहन है, घर है। आदि ब्रह्मा ने ८४ लाख योनियों को रचा। इन ८४ लाख योनियों में भटकता जीव भगत्कृपा से ही मनुष्य योनि पाता है। तुलसीदास कहते हैं...
"कबहुँ करि करुना वर देही।
देत ईस बिनु हेतु सनेही ।"
(रा. च. मा. उत्तरकाण्ड ।)
√● [ बिना हेतु, स्नेहवश परमात्मा इस जीव को करुणा कर के मनुष्य का शरीर प्रदान करता है ।]
व्यास जी कहते हैं...
"दुर्लभो मानुषो देहो देहिनां क्षणभंगुरः।"
(भागवत ११ । २ । २९ ।)
√● यह मनुष्य तन भाग्यवश मिलता है। सभी एक स्वर से कहते हैं कि यह देवदुर्लभ है। मानस की चौपाई है...
"बड़े भाग मानुष तन पावा ।
सुर दुर्लभ सब ग्रन्थन गावा ।।"
( उत्तर काण्ड । )
√●ऐसे मनुष्य शरीर को पा कर जो आत्मोद्वार में प्रवृत्त नहीं होता, वह निन्द्य है। यह केवल विषय भोग के लिये नहीं है। संत तुलसी दास कहते हैं ...
"इहि तन कर फल विषय न भाई ।
भजिय राम सब काम बिहाई ॥"
(रा.च.मा. )
√●हम लोग इस संसार में हजारों माता-पिताओं एवं सैकड़ों श्री पुत्रों का संयोग-वियोग पा चुके है, पा रहे हैं तथा पाते रहेंगे।
"मातापितृसहस्राणि पुत्रदारशतानि च।
संसारेष्वनुभूतानि यान्ति यास्यन्ति चापरे ।"
(महाभारत स्वर्गारोहण पर्व ५।६०)
√●इसलिये, इन सबके चक्कर में न पड़ कर हमें श्रेय मार्ग का ही अवलम्बन करना चाहिये। सरल श्रेय मार्ग को छोड़ कर कठिन श्रेय मार्ग का अनुसरण करना बुद्धिमानी नहीं है, विशेष कर कलियुग में। ज्ञान सब से बड़ा धन है। यह धन नाम जप से सरलतापूर्वक प्राप्त होता है। गोस्वामी जी कहते हैं...
"राम विमुख सठ चहसि संपदा ?"
(लंकाकाण्ड । )
"राम विमुख संपति प्रभुताई ।
जाइ रही, पाई बिनु पाई ||"
( सुन्दर काण्ड । )
√●राम से अविमुख रहते हुए जो ज्ञान पाता हूँ, वही लुटाता हूँ-पं. जी के श्री चरणों में रखता हूँ ।
√●●राशि चक्र एक है। इसके तीन विभाग हैं। इन विभागों को त्र्यम्बक, त्रिनेत्र, त्रिनयन कहते हैं। इस चक्र के एक विभाग से सर्जन क्रिया होती है, दूसरे से पालन कर्म होता है तथा तीसरे से संहार का कार्य होता है।
√★१. मेष, वृष, मिथुन, कर्कये चार राशियाँ सृष्टिसंज्ञक है।
√★२. सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक- ये चार राशियाँ स्थिति संज्ञक हैं।
√★३. धनु, मकर, कुंभ, मीन- ये चार राशियाँ विनाश संज्ञक हैं।
√★ ये राशियाँ जब पृथ्वी के पूर्वी क्षितिज पर लगी होती हैं तो इन्हें लग्न कहते हैं। लग्न राशि का संक्षिप्त नाम है-लग्न लग्नें भी राशियों के समान संख्या में १२ हैं।
√★ चक्रीयमाण राशियाँ जब स्थिर होती हैं, तो इन्हें भाव कहते हैं। जितनी राशियाँ हैं, उतने भाव हैं। किन्तु भावों के नाम राशियों से भिन्न हैं। तन, धन, बल, सुख, सुत, रिपु, काम, आयु, धर्म, कर्म, आय, व्यय ।
√★१२ अरों वाला यह चक्र आकाश में है, इस शरीर में है, सर्वत्र है। यह सब में है, सब से परे है। यह अदृश्य होकर भी देखने में अद्भुत और सुन्दर है। इसलिये इसे सुदर्शन चक्र कहते हैं। इसका प्रत्येक अर सृष्टि संहार और पालन का कार्य करता है। जिस अर में जन्म होता है, वह जन्म लग्न है। अतः मैं जन्म लग्न पर विचार करता हूँ।
√★जन्म लग्न का निर्धारण करने के लिये जन्म समय का ठीक-ठीक ज्ञान होना आवश्यक है। जन्म का समय क्या माना जाय ? इस पर विवाद है।
√★१. बच्चा जब गर्भ से बाहर आता है तो वह रोता है। रोने से उसकी श्वासनली खुलती है। उसी समय वह साँस लेता है। माता के गर्भ से बाहर आने पर प्रथम श्वाँस के लेने का समय ही उसका जन्म समय है।
√★२. बच्चा शल्य चिकित्सा / क्रिया द्वारा गर्भ से निकाला जाता है। ऐसी परिस्थिति में वह रोता नहीं है। तो उसका जन्म समय क्या माना जाय ? इसका निर्धारण सहज नहीं है। अतः नाल काटने के समय को जन्म काल माना जाय। जब तक नाल नहीं कटती तब तक बच्चा माता का अंग होता है। नाल कटने के साथ ही वह माता से अलग होता है और अपना स्वतन्त्र अस्तित्व रखता है।
√★ ३. समय के अतिरिक्त जन्म लग्न के निर्धारण में दूसरा महत्वपूर्ण घटक स्थान का है। पृथ्वी तल पर जो बच्चा पैदा होता है, उस का अक्षांश रेखांश जाना जाता है। किन्तु जो बच्चा आकाश में वायुयान में यात्रा कर रही महिला के पेट से बाहर निकलता है, उसके अक्षांश रेखांश के निर्धारण में कठिनाई आती है। ऐसी परिस्थिति में शुद्ध लग्नायन हो नहीं पाता।
√★४. घड़ी का वास्तविक राष्ट्रीय समय से आगे या पीछे होना तथा प्रसूतिगृहों की परिचारिकाओं / चिकित्सकों द्वारा समयांकन में सतर्कता न रखना भी शुद्ध लग्नायन में बाधक होता है। देखा गया है, कभी-कभी समयांकन में आधे घंटे तक का अन्तर होता है।
√★लग्न का ठीक-ठीक ज्ञान ज्योतिषी को कुशलता पर निर्भर करता है। कुशाम बुद्धि, व्यावहारि प्रौढ़ता तथा सत्यान्वेषण की क्षमता द्वारा लग्न ज्ञात कर ली जाती है। घड़ी के अभाव में समय का अनुमान किया जाता है। ऐसी परिस्थिति में ज्योतिषी का उत्तरदायित्व बढ़ जाता है।
√★पाराशरीय विंशोत्तरी दशा पद्धति को आधार मान कर लग्नायन की एक सूक्ष्म विधि है। स्पष्टता के साथ मैं इसका उल्लेख कर रहा हूँ। विशोली दशा पद्धति में मनुष्य की आयु १२० वर्ष मानी गई है। अर्थात् १ नक्षत्र = १२० वर्ष किसी भी नक्षत्र में जन्म लेने वाला जातक दीर्घायु योग प्राप्त होने पर १२० वर्ष की आयु का भोग करता है। यही इसका आधार है।
√★विंशोत्तरी दशा पद्धति में महों के लिये नियत वर्ष संख्या इस प्रकार है ...
★केतु = ७ वर्ष ।
★शुक्र = २० वर्ष ।
★सूर्य = ६ वर्ष ।
★चन्द्र = १० वर्ष।
★गुरु = १६ वर्ष ।
★मंगल = ७ वर्ष।
★राहु १८ वर्ष ।
★शानि = १९ वर्ष
★ बुध = १७ वर्ष ।
√★१ चक्र = २७ नक्षत्र ३६० अंश।
√★अतः १ नक्षत्र= ३६० ÷ २७ =१३° अंश २०' कला।
√★ जातक किसी भी नक्षत्र में जन्मे, उसकी दीर्घायु सीमा १२० वर्ष है।
★१ नक्षत्र = १२० वर्ष।
★तथा, १ नक्षत्र = १३° २०' = ८००'
★१२० वर्ष = ८०० कला।
★अथवा, १ वर्ष =८००/१२० =२०/३ कला।
★ अतः, सूर्य का भाग = ६ x २०/३ = १२०/३=४० कला।
★२०० =१ अंश ६ कला ४० निकला।
★ चन्द्र का भाग = १० x २०/३=२००/३=१°अंश ६'कला४०''विकला।
★ मंगल का भाग = ७ X २०/३=१४०/३=४६'कला४०विकला।
★राहु का भाग =१८ x २०/३ = ३६०/३ = १२०' कला = २° अंश ।
★गुरु का भाग = १६ X२०/३=३२०/३= १° अंश ४६' कला ४०'' विकला।
★शनि का भाग = १९× २०/३=३८०/३ = २° अंश ६' कला ४०'' विकला।
★बुध का भाग = १७×२०/३=३४०/३=१°अंश ५२'कला२०''विकला।
★केतु का भाग =७×२०/३=१४०/३=४६'कला४०''विकला।
★शुक्र का भाग = २०×२०/३=४००/३=२°अंश१३'कला२०''विकला।
√★इस गणितीय क्रिया में ग्रहों की नियत वर्ष संख्या को अंश कला विकला में परिवर्तित किया गया है। 【चित्र देखें ग्रहोंकी की वर्ष-अंशकला सारणी नीचें संलग्न है】
√★अब तक ज्योतिष शास्त्र में सूक्ष्म फल कहते के लिये प्रत्येक राशि को ९ भागों में विभाजित कर कुल राशियों अर्थात् १२ × ९ = १०८ की संख्या को महत्व दिया जाता रहा है। किन्तु अब यहाँ इससे भी अधिक सूक्ष्म फल को पाने के लिये राशियों के स्थान पर नक्षत्रों को ९ भागों में विभाजित करके फल कहने की परम्परा का श्री गणेश मैं भगवान् की कृपा से करने जा रहा हूँ।
【चित्र देखें मेष लग्न सारणी नीचें संलग्न है १२राशियों की सारणी के साथ】
√★इस सारणी को देखने पर स्पष्ट होता है कि २७ x ९ = ३४३ नक्षत्र भाग होने के स्थान पर २५२ नक्षत्र भाग हुए हैं। ऐसा क्यों ?
√★१. मेष, सिंह, धनु, राशियों का अन्त क्रमशः कृत्तिका, उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ़ नक्षत्रों में सूर्य के भाग से होता है।
√★२. वृष, कन्या, मकर राशियों का प्रारंभ क्रमशः कृत्तिका, उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ़ नक्षत्रों में सूर्य के भाग से होता है।
√★३. वृष, कन्या, मकर राशियों का अन्त क्रमशः मृगशिरा, चित्रा, धनिष्ठा नक्षत्रों में राहु के भाग से होता है।
√★ ४. मिथुन, तुला, कुम्भ राशियों का प्रारंभ क्रमशः मृगशिरा, चित्रा, धनिष्ठा नक्षत्रों में राहु के भाग से होता है।
√★ ५. मिथुन, तुला, कुम्भ राशियों का प्रारंभ क्रमशः मृगशिरा, चित्रा, धनिष्ठा नक्षत्रों में राहु के भाग से होता है।
√★६. मिथुन, तुला, कुम्भ राशियों का अन्त क्रमशः पुनर्वसु, विशाखा, पू.भा. नक्षत्रों में शनि के भाग से होता है।
√★७. कर्क, वृश्चिक, मीन राशियों का प्रारंभ क्रमशः पुनर्वसु विशाखा, पू.भा. नक्षत्रों में शनि के भाग से होता है।
√★इस प्रकार सूर्य, राहु और शनि में से प्रत्येक ग्रह का नक्षत्र भाग ३ x ३ = ९ बार अधिक आया है। अतः २४३ + ९ = २५२ भाग प्राप्त हुए हैं।
√★पूरा भचक्र २५२ की संख्या में बँटा हुआ है। प्रत्येक राशि का अन्त एक निश्चित संख्या के नक्षत्र भाग से हो, इस कारण से ९ विभाग बढ़ गये हैं। यदि वेद वर्णित २८ नक्षत्रों को लिया जाय और उसके विभाग किये जायें तो २८ x ९ = २५२ की संख्या प्राप्त होती है। यह २५२ की संख्या पूर्णत: वेद सम्मत भी है ।
√★१ से लेकर २१ तक की संख्याएँ तक मेष लग्न के अन्तर्गत हैं।
√★२२ से लेकर ४३ तक की संख्याएँ वृष राशि के अन्तर्गत आती हैं।
√★४४ से ६४ तक की संख्याएँ मिथुन लग्न के अन्तर्गत हैं।
√★६५ से ८४ तक की संख्याएँ कर्क लग्नान्तर्गत हैं।
√★८५ से १०५ तक की संख्याएँ सिंह लग्न के अन्तर्गत हैं।
√★१०६ से १२७ तक की संख्याएँ कंन्यालग्न की द्योतक हैं।
√★१२८ से १४८ तक की संख्याएँ तुलान्तर्गत हैं।
√★ १४९ से १६८ तक की संख्याएँ वृश्चिकलग्न में हैं।
√★१६९ से १८९ तक की संख्याएँ धनुलग्न गत हैं।
√★१९० से २११ तक की संख्याएँ मकर लग्न की प्रतीक हैं।
√★२१२ से २३२ तक की संख्याएँ कुम्भ गत हैं।
√★२३३ से २५२ तक की संख्याएँ मीनाद्यन्त की द्योतक हैं ।
√◆अतिगण्ड संख्याएँ कुल ६ हैं।
√◆८४ विशिष्ट गण्ड संख्या है।
√● कर्कान्त ८४ ।
√● सिंहारंभ ८५ ।
√●वृश्चिकान्त १६८ ।
√●धन्वारंभ १६९ ।
√●मीनान्त २५२ ।
√●मेषारंभ १ ।
√●८४ x १ = ८४ से कर्कलग्न का अन्त होता है।
√●८४ x २ = १६८ से वृश्चिक लग्न का अन्त होता है।
√●८४ x ३ = २५२ से मीन लग्न का अन्त होता है।
√● (८४ × १) + १ = ८५ से सिंह लग्न का आरंभ होता है।
√●(८४ X २) + १ = १६९ से धनुलग्न का आरंभ होता है।
√●(८४ x ३ + १ = २५३÷२५२ = १ से मेष लग्न का आरंभ होता है।
√●८४,८५ । १६८, १६९ । २५२,१ । ये ६ संख्याएँ अतिगण्ड इस लिये हैं कि इनसे नक्षत्र के साथ-साथ राशि का आरंभ वा अन्त होता है।
√●●सभी लग्नों के साथ बराबर संख्याएँ नियत नहीं हैं।
√●१. मेष, सिंह, धनु लग्नों में बराबर संख्याएँ हैं। इन की कुल संख्या २१ है ।
√●२. वृष, कन्या मकर लग्नों में बराबर संख्याएँ हैं। इन की कुल संख्या २२ है।
√●३. मिथुन, तुला, लग्नों में बराबर-बराबर संख्याएं हैं। इनकी संख्या २१ है ।
√●४. कर्क, वृश्चिक, मीन लग्नों में बराबर-बराबर संख्याएँ हैं। इनकी संख्या २० है ।
√●इस प्रकार, मेष सिंह धनु की कुल संख्याएँ = २१ x ३ = ६३ ।
√●वृष कन्या मकर की कुल संख्याएँ =२२×३=६६।
√●मिथुन तुला कुंभ की कुल संख्याएँ = २१ x ३ = ६३ ।
√●कर्क वृश्चिक मीन की कुल संख्याएँ = २० x ३ = ६० ।
√●● इन द्वादश राशियों का कुल योग = २५२।
√●राशि/लग्न/ आदित्य १२ है १२ की संख्या पूर्ण है। इसमें १ दहाई है तथा २ इकाई है। यदि अंकों का स्थान बदल दिया जाय तो नई संख्या २१ हो जाती है। इन उल्टा सुल्दा संख्याओं का गुणनफल २१ x १२ = २५२ होता है। ८४ भूलोक की प्रतीक है। भुवः और स्वः दो और लोक होने से ८४ की ३ आवृत्ति = ८४ x ३ = २५२ हुई। आदित्य में सप्त रश्मियाँ हैं। द्वादश आदित्य हैं। अतएव ७ X १२= ८४ रश्मियाँ हुई। ये रश्मियाँ केवल भूलोक में ही नहीं, अपितु भुवः और सुत्रः लोक में भी व्याप्त । इसलिये ८४ x ३ = २५२ रश्मियाँ लोक लोकान्तरों तक फैली हैं।
√●कुल ३६ व्यञ्जन वर्ण है।
√●५ कवर्ग + ५ चवर्ग + ५ टवर्ग + ५ तवर्ण + ५ पवर्ग + ४ यवर्ग + ३ शवर्ग + १ वर्ग + ३ संयुक्ताक्षर (क्ष,त्र,ज्ञ ) ।
√●कुल १२ स्वर वर्ण हैं।
अ ,आ, इ, ई ,उ ,ऊ , ऋ, ॠ , ए, ऐ ,ओ, औ ।
√●इन ३६ व्यञ्जनों तथा १२ स्वरों के मेल से ३६ x १२ = २५२ मात्रिक वर्ण बनते हैं।
√●सम्पूर्ण वाड्मय इन्हीं से है। सभी वेद, ब्राह्मण ग्रन्थ, आरण्यक उपनिषद्, सभी शास्त्र, सभी पुराण सभी स्मृतियाँ इन्हीं से ओतप्रोत हैं। यह २५२ की संख्या वाक ब्रह्म की प्रतीक है। जो इस २५२ को जान लेता है, उसके लिये वेद (ज्ञान) हस्तामलकवत है। कहा गया है।...
"जुवती साख नृपति बस नाहीं।।"
( रा.च.मा. अरण्य काण्ड )
√●इस २५२ के रहस्य को जो जान लेता है, उसके वश मे युवती शास्त्र और राजा तीनों हो जायेंगे। क्योंकि इसको जानने वाला भगवान् का भक्त होता है। भक्त के वश में भगवान् होते हैं। औरों की बात क्या की जाय ?
√● एक को अनेक टुकड़ों में बाँट देना भक्ति है। भज्धातु भ्वादि उभयगणी भजति ते हिस्से करना अर्थ में प्रयुक्त होती है। भज् + क्त= भक्त जो विभाजित है, वह भक्त है। इस प्रक्रिया को भक्ति कहते हैं। तत्व एक है। एक के दो भाग करना-ईश्वर एवं जीव के रूप में, अथवा एक के बहुत समान / असमान भाग करना चराचर विश्व के रूप में, भक्ति का प्रतिफल है। ऐसा करने वाला भी भक्त है। जो एक के अनेक भाग करता है, वह भक्त है। जो अनेक को परस्पर मिलाते हुए एक कर देता है, वह ज्ञानी है, अभक्त है। विश्लेषणपरक प्रक्रिया भक्ति है। संश्लेषण परक कर्म ज्ञान है। विश्लेषक को भक्त कहते हैं। संश्लेषक को ज्ञानी कहते हैं। जो संश्लेषण कर सकता है, वह विश्लेषण भी करता है। जो विश्लेषण करता है, वह संश्लेषण करने में भी सक्षम होता है। इस तरह जो ज्ञानी है, वह भक्त है तथा जो भक्त है, वह ज्ञानी भी है। भक्त और ज्ञानी एक ही हैं। ज्ञान और भक्ति में कोई अन्तर नहीं है। मूर्ख लोग इसमें अन्तर करते हैं।
"ज्ञानिहि भक्तिहि नहि कछु भेदा।
उभय हरहि भव संभव खेदा ।।"
(रा. च. मा. उत्तरकाण्ड ।)
√● मैंने १ को २५२ भागों में बाँटा है। अतः मैं भक्त हूँ। जो लोग इसे स्वीकार करते हैं, वे सब भक्त हैं। भक्ति से सारा व्यवहार है। यदि मैं २५२ को पुनः १ कर दूं तो ज्ञानी कहलाऊंगा। किन्तु तब व्यवहार समाप्त हो जायेगा। मौनावास्था का नाम १ है अभी मैं मौन वा ज्ञानी नहीं हूँ। अज्ञानी रहना ही ठीक है। किचित् मुखर हूँ।
√● जो नहीं होने वाला है, वह नहीं होता। जो होने वाला है, वही होता है। इसके विपरीत कुछ नहीं होता।
"यद्भावि न तद् भावि,
भावि चेन्न तदन्यथा ।"
(-व्यास ।)
√●कहा गया है ...
"सा सा सम्पद्यते बुद्धिः सा मतिः सा च भावना ।
सहायास्तादृशा एव यादृशी भवितव्यता ।।"
√● [वैसी वैसी बुद्धि उत्पन्न होती है, उसी प्रकार के विचार होते हैं, सहायक मिलते हैं। जैसी भवितव्यता होती है।]
√●वैसी भावना जागृत होती है, वैसे इसी बात को संत तुलसीदास इस प्रकार कहते हैं।...
"तुलसी जस भवितव्यता तैसी मिली सहाय आपुन आवै ताहि पर, ताहि तहाँ लै जाय ।।"
(बालकाण्ड)
√●इस भवितव्यता को जानने की जिज्ञासा सब में होती है। ज्ञानी तपी पण्डित मूर्ख, धनी-निर्धनी, राजा प्रजा, श्री-पुरुष, स्वामी सेवक सभी अपनी-अपनी भवितव्यता को जानने के लिये उत्सुक होते हैं। प्रश्न के माध्यम जे प्रश्न कुण्डली बनाकर तथा जन्म समय के द्वारा जन्म चक्र बना कर उनकी इस उत्सुकता का प्रशमन किया जाता है। यह २५२ संख्याओं वाली वैष्णव सारणी इस कार्य में अत्यधिक सहायक है। इस की महत्ता अक्षुण्ण है।
√● इस सारणों के प्रयोग का एक सूत्र है और वह है- 'विश्वम्'। जो आदि में है, वही अन्त में है, रही मध्य में है। विष्णु सहस्रनाम का पहला पद है-'विश्वम्'। इस विश्वं में सभी अन्य ९९९ नाम हैं। स विश्व को समझ लेना ही सभी नामों को जानना है। 'सत्यभाष्य' से सब कुछ स्पष्ट हो जाता है। बस ही इसका मूल सूत्र है। हर संख्या व्यापक है। कोई भी संख्या लें चाहे वह २५२ के भीतर हो वा बाहर, इस संख्या से संबंधित लग्नांश कलाविकला इस सारणी से ज्ञात हो जाने पर तात्कालिक ग्रहों की सहायता रे फल कथन अचूक होता है। यदि संख्या २५२ से अधिक है तो उसमें २५२ का भाग देने पर जो शेष आवे, उससे लग्नांश कला विकला जाना जाता है। संख्या का स्फुरण स्वयं के मन में हो अथवा प्रश्न कर्ता के मन में, फलित अचूक होगा। कोई भी व्यक्ति अपनी काल्पनिक अथवा वास्तविक पंजीयन संख्या, परीक्षा अनुक्रमांक संख्या, वाहन संख्या, गृह संख्या, दूरभाष संख्या, बीमा पालिसी संख्या, बैंक खाता लेखा संख्या, नगर पिन कोड संख्या आदि दे कर किसी भी प्रश्न का उत्तर जान सकता है। फल के शुभाशुभ का परिज्ञान नक्षत्र भाग पति से होता है।
√●इस सारणी का प्रयोग जन्म कुण्डली देखने में धड़ल्ले से किया जा सकता है। ग्रहस्पष्ट एवं आर्य भावस्पष्ट के द्वारा उनके नक्षत्र तथा नक्षत्रभागाधिपतियों की शुभाशुभता को ज्ञात कर फल कहना सरल हो जात
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कुण्डलिनी जागरण की प्रक्रिया

सहस्रार चक्र सिर के शिखर पर स्थित है। इसे "हजार पंखुडिय़ों वाले कमल”, ईश्वर का द्वार या "लक्ष किरणों का केन्द्र” भी कहा जाता है, क्योंकि यह सूर्य की भांति प्रकाश का विकिरण करता है। अन्य कोई प्रकाश सूर्य की चमक के निकट नहीं पहुंच सकता।
कुण्डलिनी के सहस्रार में प्रवेश करने में एकादश रुद्र सबसे बडी समस्या है यह समस्या भवसागर से आती है, इस प्रकार यह तालू क्षेत्र में भी प्रवेश करती है। हजार दलों वालें महापद्म पर, जिसे साधना ही महासाधना है ;वही सत्यलोक है। अमरत्व, मुक्ति,निर्वाण सब कुछ वहीं पहुचने पर है।
सारी तैयारी उसी की साधना की है। शरीर के कपाल के उर्ध्व भाग में स्थित सहस्रार चक्र के बारे में शास्त्र कहते हैं कि “विद्युतधारा की तरह इन छह चक्रों से होती हुई, ऊपर सहस्रार कमल में तुम जा विराजती हो । सूर्य, चन्द्र और अग्नि (इड़ा, पिंगला, और सुषुम्ना) तुम्हारी कला पर आश्रित हैं |
मायातीत जो परात्पर महापुरुष हैं, तुम्हारी ही आनंदलहरी में स्नान करते हैं” सहस्रार पर पहुंचने पर साधक निवर्विचार हो जाता है। ह्दय में शुद्ध स्पंदनहोता है-लप-टप-लप- टप । सारे स्वर एकत्रित होकर इस समन्वय से उत्पन्न होने वाला स्वर ॐ…होता है।
सूर्य के सातों रंग अंततः सफेद किरणें बन जाती हैं या स्वर्णिम रंग की किरणें ह्दय सात चक्रों के सात परिमलों से घिरा हुआ है और इसके अन्दर आत्मा निवास करती है । आपके सिर के शिखर पर सर्व शक्तिमान सदाशिव निवास करते हैं।
कुण्डलिनी जब इस विन्दु को छूती है तो आत्मा प्रसारित होने लगती है,और आपके मध्य नाडी तन्त्र पर कार्य करने लगती है क्योंकि स्वतःचैतन्य सपंदन आपके मस्तिष्क में प्रवाहित होने लगती है। और आपकी नाडियों को ज्योतिर्मय करती है।
परन्तु अभी भी ह्दय में पहचान नहीं आई लेकिन आप चेतन्य स्पंदन महसूस करने लगते हैं। आप उस स्थिति में दूसरो लोगों को रोग मुक्त कर सकते हैं । परन्तु अभी भी यह पहचान नहीं है क्योंकि पहचान आपके ह्दय की मानसिक गतिविधि है ।
आपको याद रखना होगा ,ह्दय पूरी तरह से मस्तिष्क से जुडा हुआ है। ह्दय जब रुक जाता है तो मस्तिष्क भी रुक जाता ,सारा शरीर बेकार हो जाता है। कोई खतरा दिखने लगता है कि ह्दय धडकने लगता है। आपके ह्दय में जब दिव्यत्व और आध्यात्मिकता का अनुभव विकसित होने लगता है ।
तब आप जान पाते हैं कि आप दिव्य व्यक्ति हैं । और जब तक आप पूर्ण रूपेण विश्वस्त नहीं होते कि आप दिव्य व्यक्ति हैं तो चाहे जितनी श्रद्धा आपमें हो यह पहचान अधूरी है। हम जब भी और जहॉ भी विद्युत चुम्बकीय शक्ति को कार्य करते हुये देखते हैं ।
तो यह हनुमान जी के आशीर्वाद से होता है। वे ही विद्युत चुम्बकीय शक्तियों का सृजन करते हैं । गणेश मूलाधार चक्र पर विराजमान हैं ।श्री गणेश जी के अन्दर चुम्बकीय शक्तियॉ हैं ; पदार्थ की अवस्था में वे मस्तिष्क तक जाते हैं मस्तिष्क के विभिन्न पक्षों में सहसम्बंधों का सृजन करते हैं ।
गणेश जी हमें बुद्धि प्रदान करते हैं तो श्री हनुमान हमें सद्विवेक प्रदान करते ।क्योंकि कुण्डलिनी गौरी शक्ति है और गणेश जी हर क्षण उनकी रक्षा करने के लिए वहॉ होते हैं, शिव आत्मा का प्रतिनिधित्व करते हैं और आत्मा का निवास आपके ह्दय में है।
वास्तव में,सदा शिव का स्थान आपके सिर के शिखर पर है परन्तु वे आपके ह्दय में प्रतिविम्बित होते हैं। आपका मस्तिष्क विठ्ठल है अथार्त हरिहर। पूरी साधना हरिहर को समझने की ही है। हरि माया का प्रतिनिधित्व करते हैं और हर आत्मा का।
जब तक दोनों ... मस्तिष्क और आत्मा में यह सपंदन नहीं पहुंचता । हमारी साधना का लक्ष्य भी पूरा नहीं होता। आत्मा को आपके मस्तिष्क में लाने का अर्थ आपके मस्तिष्क का ज्योतिर्मय होना परमात्मा का साक्षात्कार करने की आपके मस्तिष्क की सीमित क्षमता का असीमित बनना है।
जब आत्मा मस्तिष्क में आती है तो आप जीवन्त चीजों का सृजन करते हैं..मृत भी जीवित की तरह से व्यवहार करने लगता है। सहस्रार चक्र में ‘अ’ से ‘क्ष’ तक की सभी स्वर और वर्ण ध्वनि उत्पन्न होती है। पिट्यूटी और पीनियल ग्रंथि का आंशिक भाग इसमें संबंधित है।
यह मस्तिष्क का ऊपरी हिस्सा और दाईं आंख को नियंत्रित करता है तथा आत्मज्ञान, आत्म दर्शन, एकीकरण, स्वर्गीय अनुभूति के विकास का मनोवैज्ञानिक केंद्र है। सहस्रार को कैलास पर्वत के रूप में इंगित करने भगवान शंकर के तप रत होने की स्थिति को भी कहते हैं।
सहस्रार चक्र दोनों कनपटियों से दो-दो इंच अंदर और भौहों से भी लगभग तीन-तीन इंच अंदर हैं। मस्तिष्क मध्य में महावीर नामक महारुद्र के ऊपर छोटे से पोले भाग में ज्योतिपुंज के रूप में अवस्थित है। तत्व दर्शीयों के अनुसार यह छोटे उलटे कटोरे के समान दिखाई देता है।
सहस्रार को जागृत कर लेने वाला व्यक्ति संपूर्ण भौतिक विज्ञान की सिद्धियां हस्तगत कर लेता है। यही वह शक्ति केंद्र है जहां से मस्तिष्क शरीर का नियंत्रण करता है।और विश्व में जो कुछ भी मानव-हित के लिए विलक्षण विज्ञान दिखाई देता है -उसका संपादन करता है।
इसे ही दिव्य दृष्टि का स्थान कहते है। मूलाधार से लेकर आज्ञा चक्र तक सभी चक्रों के जागरण की कुंजी सहस्रार चक्र के पास ही है । शरीर शास्त्र के अनुसार मोटे विभाजन की दृष्टि से मस्तिष्क को पाँच भागों में विभक्त किया गया है।
(1) बृहद् मस्तिष्क-सेरिव्रम (2) लघु मस्तिष्क- सेरिवेलम (3) मध्य मस्तिष्क-मिड ब्रेन (4) मस्तिष्क सेतु-पाँन्स (5) सुषुम्ना शीर्य -मेडुला आँवलाँगेटा। इनमें से अन्तिम तीन को संयुक्त रूप से मस्तिष्क स्तम्भ ब्रेन स्टीम भी कहते है।
इस तरह मस्तिष्क के गहन अनुसंधान में ऐसी कितनी ही सूक्ष्म परतें आती है जो सोचने-विचारने सहायता देने भर का नहीं, वरन् समूचे व्यक्तित्व के निर्माण में भारी योगदान करती है। वैज्ञानिक इस तरह की विशिष्ट क्षमताओं का केन्द्र ‘फ्रन्टललोब ‘ को मानते है ।
जिसके द्वारा मनुष्य के व्यक्तित्व, आकांक्षायें, व्यवहार प्रक्रिया, अनुभूतियाँ संवेदनाएँ आदि अनेक महत्वपूर्ण प्रवृत्तियों का निर्माण और निर्धारण होता हैं। इस केन्द्र को प्रभावित कर सकना किसी औषधि उपचार या शल्य क्रिया से सम्भव नहीं हो सकता।
इसके लिए योग साधना की ध्यान धारण जैसी उच्चस्तरीय प्रक्रियायें ही उपयुक्त हो सकती है, जिन्हें कुण्डलिनी जागरण के नाम से जाना जाता है। अध्यात्म शास्त्र के अनुसार मस्तिष्क रूपी स्वर्ग लोक में यों तो तैंतीस कोटि देवता रहते, पर उनमें से पाँच मुख्य हैं।
इन्हीं का समस्त देव स्थान पर नियंत्रण है। उक्त मस्तिष्कीय पाँच क्षेत्रों को पाँच देव परिधि कह सकते है। इन्हीं के द्वारा पाँच कोशों की पाँच शक्तियों का संचार-संचालन होता है। मस्तिष्क के विभाजन तथा सहस्रार चक्र के सम्बन्ध में इसी प्रकार एक ही तथ्य के भिन्न-भिन्न विवेचन मिलते है।
शास्त्रों में इसी को अमृत कलश ‘ कहा गया है। उसमें से सोमरस स्रवित होने की चर्चा है। देवता इसी अमृत कलश से सुधा पान करते अजर अमर बनते है। वर्तमान वैज्ञानिक की मान्यतानुसार मस्तिष्क में एक विशेष द्रव भरा रहता है जिसे ‘सेरिब्रोस्पाइनल फ्ल्यूड’ कहते है ।
यही मस्तिष्क के विभिन्न केन्द्रों को पोषण,संरक्षण देता रहता है। मस्तिष्कीय झिल्लियों से यह झरता रहता है और विभिन्न केन्द्रों तथा सुषुम्ना में सोखा जाता हैं। अमृत कलश में सोलह पटल गिनाये गये हैं। इसी प्रकार कहीं- कहीं सहस्रार की सोलह पंखुड़ियों का वर्णन है।
यह मस्तिष्क के ही सोलह महत्वपूर्ण विभाग-विभाजन है। शिव संहिता में भी सहस्रार की कलाओं का वर्णन करते हुए कहा है- ‘कपाल के मध्य प्रकाशमान सोलह कलायुक्त सहस्रार की यह सोलह कलायें मस्तिष्क के सेरिब्रोस्पाइनल फ्ल्यूड से सम्बन्धित मस्तिष्क के सोलह भाग है।
इन सभी विभागों में शरीर को संचालित करने वाले एवं अतीन्द्रिय क्षमताओं से युक्त अनेक केन्द्र है। सहस्रार अमृत कलश को जागृत कर योगीजन उन्हें अधिक सक्रिय बनाकर असाधारण लाभ प्राप्त करते है। योग शास्त्रों में इन्हीं ही ऋद्धि-सिद्धियाँ कहते है ।
इस सहस्रार कमल की साधना से योगी का चित्त स्थिर होकर आत्म-भाव में लीन हो जाता है। तब वह समग्र शक्तियों से सम्पन्न हो जाता हैं और भव बंधन से छूट जाता है। सहस्रार से बाहर आया हुए अमृत पर भी विजय प्राप्त कर लेता है।
सहस्रार मनुष्य का अपना उत्पादन नहीं, वरन् दैवी अनुदान हैं ; जिसका सम्बन्ध ब्रह्मरंध्र से होता है। ब्रह्मरंध्र को दशम द्वार कहा गया है। नौ द्वार है- दोनों नथुने, दो आँखें, दो कान, एक मुख, दो मल-मूत्र के छिद्र। दसवाँ ब्रह्मरंध्र है।
इसी के माध्यम से दिव्य शक्तियों तथा दिव्य अनुभूतियों का आदान-प्रदान होता है। योगी जन इसी से होकर प्राण त्यागते हैं। मरणोपरान्त कपाल क्रिया करने का उद्देश्य यही है कि प्राण का कोई अंश शेष रह गया हो तो वह उसी में होकर निकले और ऊर्ध्वगामी प्राप्त करे।
सहस्रार और ब्रह्मरंध्र मिलकर एक संयुक्त इकाई यूनिट के रूप में काम करते है। अतः योग साधना में इन्हें संयुक्त रूप में प्रभावित करने का विधान है। मानव काया की धुरी उत्तरी ध्रुव सहस्रार और ब्रह्मरंध्र ब्रह्माण्डीय चेतना के साथ सम्पर्क बनाकर आदान-प्रदान का पथ प्रशस्त करता है।
भौतिक ऋद्धियाँ और आत्मिक सिद्धियाँ जागृत सहस्रार के सहारे निखिल ब्रह्माण्ड से आकर्षित की जा सकती है।चेतन और अचेतन मस्तिष्कों द्वारा जो इन्द्रियगम्य और अतीन्द्रिय ज्ञान उपलब्ध होता है, उसका केन्द्र यही है। ध्यान से लेकर समाधि तक और आत्मिक चिन्तन से लेकर भक्ति योग तक की समस्त साधनायें यहीं से फलित होती और विकसित होती है।सुषुम्ना नाड़ी के भीतर भी तीन अत्यन्त सूक्ष्म धाराएँ प्रवाहित हैं। जिन्हें वज्रा, चित्रणी और ब्रह्म नाड़ी कहते हैं। ब्रह्म नाड़ी सब नाड़ियों का मर्मस्थल केन्द्र एवं शक्ति स्रोत है। ब्रह्म नाड़ी ही मस्तिष्क के केन्द्र में ब्रह्मरन्ध्र में पहुँचकर हजारों भागों में चारों ओर फैल जाती है।
इसी कारण उस स्थान को सहस्र दल कमल कहते हैं। सहस्र दल सूक्ष्म लोकों- विश्व व्यापी शक्तियों से सम्बन्धित है। जिसके द्वारा परमात्मा की अनन्त शक्तियों को सूक्ष्म लोक से पकड़ा जाता , मेरुदण्ड के नीचे अन्तिम भाग में सुषुम्ना के भीतर रहने वाली ब्रह्म नाड़ी एक काले वर्ण के षट्कोण वाले परमाणु से लिपटकर बंध जाती है।
षट्कोण परमाणु को यौगिक ग्रन्थों में अलंकारिक भाषा में कूर्म कहा गया है। उसकी आकृति कछुए जैसी होती है। पृथ्वी कूर्म भगवान पर टिकी है। शेषनाग के फन पर अवलम्बित है। इस उक्ति का आधार ब्रह्मनाड़ी की वह आकृति है जिसमें वह इस कूर्म में लिपटकर बैठी हुई है ।
और जीवन को धारण किए हुए है। यदि वह अपना आधार त्याग दे तो जीवन भूमि के चूर-चूर हो जाने में थोड़ी भी देरी न लगे। कूर्म से ब्रह्म नाड़ी के गुन्थन स्थल को आध्यात्मिक भाषा में कुण्डलिनी कहते हैं। कुण्डलाकार होने के कारण ही उसका नाम कुण्डलिनी पड़ा।
कुण्डलिनी की महिमा, शक्ति एवं उपयोगिता इतनी अधिक है जितनी कि बुद्धि कल्पना भी नहीं कर सकती। भौतिक विज्ञान के अन्वेषकों के लिए परमाणु एक चमत्कार बना हुआ है। उसके तोड़ने की विधि प्राप्त हो जाने पर प्रचण्ड ऊर्जा का स्रोत वैज्ञानिकों के हाथ लग गया है।
अभी तो उसकी ऊर्जा के एक अंश का विध्वंसात्मक स्वरूप देखा गया है। रचनात्मक एवं शक्ति का एक बड़ा पक्ष अछूता है।यह तो जड़ जगत के एक नगण्य से परमाणु की शक्ति की बात हुई जिसे देखकर आश्चर्यचकित हो जाना पड़ता तो चैतन्य जगत का एक स्फुल्लिंग जो जड़ परमाणु की तुलना में अनन्त गुना शक्तिशाली है।
विज्ञान की शक्ति एवं उपलब्धियों से सभी परिचित हैं। योग की उपलब्धियाँ हैं ऋद्धियाँ और सिद्धियाँ। जिस प्रकार परमाणु की शोध में अनेकों वैज्ञानिक जुटे हैं। उसी प्रकार पूर्वकाल के आध्यात्मिक विज्ञान वेत्ताओं, तत्वदर्शी ऋषियों ने मानव शरीर के अंतर्गत एक बीज परमाणु की अत्यधिक शोध की थी ओर उसकी असीम शक्ति से लाभ उठाया।
दो परमाणुओं को तोड़ने, मिलाने या स्थानान्तरित करने का सर्वोत्तम स्थान कुण्डलिनी केन्द्र में होता है क्योंकि अन्य सभी स्थानों के चैतन्य परमाणु गोल और चिकने होते हैं पर कुण्डलिनी में यह मिथुन के रूप में लिपटा हुआ है।
जिस प्रकार युरेनियम एवं प्लूटोनियम धातु के परमाणुओं का गुन्थन ऐसे टेढ़े-तिरछे ढंग से हुआ है कि उनका तोड़ा जाना अन्य पदार्थों के परमाणुओं की अपेक्षा अधिक सरल है । उसी प्रकार कुण्डलिनी स्फुल्लिंग परमाणुओं की गतिविधि का इच्छानुकूल संचालन अधिक सुगम है।
अत एव पूर्वकाल के ऋषियों ने बड़ी तत्परता से कुण्डलिनी जागरण पर शोध की। शोध के परीक्षण एवं प्रयोग के उपरांत उन्होंने इतनी सामर्थ्य प्राप्त कर ली जिसे चमत्कार समझा जाता है।कुण्डलिनी को गुप्त शक्तियों का भण्डार-तिजोरी कहा गया है।
बहुमूल्य रत्नों को तिजोरी में रखकर किसी गुप्त स्थान में रख दिया जाता है। उसमें मजबूत ताले लगा दिये जाते हैं जिससे कोई अनाधिकारी बाहरी व्यक्ति न प्राप्त कर सके।परमात्मा ने भी मनुष्य की अनन्त शक्तियों के भण्डार दिए हैं पर उन पर छह ताले लगा दिए हैं।
इन्हें ही षट्चक्र कहते ,चक्रों के रूप में यह ताले इसलिए लगाये गये हैं कि कोई उन्हें कुपात्र न प्राप्त करले। कुण्डलिनी शक्ति पर लगे छह तालों- छह चक्रों को बेधना- खोलना पड़ता है। सामान्यतया कुण्डलिनी अस्त-व्यस्त स्थिति में मूलाधार में नीचे की ओर मुँह किए बैठी रहती है।
उसे जगाने के लिए सविता की प्राण शक्ति का आश्रय लेना होता है। ध्यान योग की उच्चस्तरीय साधना द्वारा मूर्छित पड़ी कुण्डलिनी महाशक्ति का जागरण किया जाता है। योग में प्राण साधना इसी लक्ष्य की आपूर्ति करती है।
कुण्डलिनी जागरण की प्रक्रिया के साथ साधक को आत्मपरिष्कार आत्मसुधार का अवलम्बन लेना पड़ता है। दोहरे मोर्चे पर किया गया साधना पुरुषार्थ साधक के अन्तरंग को शक्ति सामर्थ्य से परिपूर्ण बनाता है।