Saturday, March 26, 2016

अँहद मार्ग:- अँहद की यात्रा हैं अभ् से नभ् की यात्रा


अँहद मार्ग:- अँहद की यात्रा हैं अभ् से नभ् की यात्रा
अभ् यानि ईडला से पिंगला (सुष्प्ति )से सहस्त्र की मह यात्रा का मार्ग हैं अँहद योग ये वह मार्ग जिस पर साधक को अकेले ही बढ़ना हैं इस मार्ग मे कोई साथ नही चलता , केवल एकांत मार्ग मे साधक अकेला ही आगे बढ़ता हैं 
यहाँ दर्शन शास्त्र मे अँहद की महा यात्रा पर अलग अलग मार्गो का वर्णन मिलता हैं 
परन्तु आवश्यकता मात्र विलय की हैं वह विलय ही आनन्द का प्रतिक हैं या कहै की आनन्द की प्राप्ति ही ईश्वर का सच्चा सुख 
हैं अँहद मार्ग अनुभव का विज्ञान हैं जहाँ भीतर और भीतर उतरने पर कुछ नया और बहतर अनुभव होगा 
सबसे बड़ी बात हैं हर पल अनुभव एक सा नही होगा हर बार अलग ही होगा इस मार्ग पर चलने पर आपकी शरीरिक मानसिक अवस्था मे बड़ा परिवर्तन होता हैं चेहरे पर दैवीय ओज, तेज प्रकट होता हैं देह रोग मुक्त, मन हल्का जान पड़ता हैं मन की शांति क्रोध रहित वातावरण बनती हैं दुसरो का क्रोध साधक हस कर भूल जाता हैं 

अँहद मे हैं प्रकृति :-
आइये अब ब्रह्म को जाने वाले मह मार्ग को जाने जिसे वेदों मे ब्रह्म कह कर सम्बोधित किया हैं वही दुनिया के अन्य धर्म भी किसी न किसी रूप मे उस अनन्त शक्ति को मानते ही नही अपितु अनुभव भी करते हैं या यूँ कहै की धर्म से ऊपर वह शक्ति हैं जो सब का निर्वाह, निर्माण, निर्वाण करतीहैं 
अन्य जीवो की अपेक्षा मनुष्य अधिक बुद्धि जीवी, व संवेदनशील हैं ऐसा आज का विज्ञान मानता हैं परन्तु यह सत्य नही ..?
कई जीव और पेड मनुष्य से विज्ञान मे हजारो वर्ष आगे हैं 
आप हैरत मे पड़े आने वाले समय मे विज्ञान बता देगा 
आपके भीतर ऐसे ही सैंकड़ों प्रश्न उठते होंगे
ऐसे ही हजारों प्रश्न हैं जिसका उत्तर मनुष्य सभ्यता के आरम्भ से ढूंढ रहा हैं आज भी सैकड़ों प्रश्न हैं जिसका उत्तर विज्ञान के पास नही हैं प्रकृति अपने मे अनभिज्ञ रहस्यों की खान हैं या यु कहै की हम अभी प्रक्रति को समझने मे छोटे बच्चे के समान हैं जो चाँद को भी मेरा हैं मेरा हैं कहता हैं मानव जन्म के लाखो वर्ष के पश्चात भी हम आरम्भ मे हैं हॉ कुछ महा मानव भी हुऐ जो प्रक्रति को समझ पाये आदि काल। मे वह ही हमें यहाँ तक लाये उन्होंने ही वेदों की रचना की या ये कहना उचित हो गा की वह ही आज के विज्ञान के जनक हैं
कौन हैं मानव सभ्यता का निर्माता, कौन हैं जो हमें निर्वाण डाइट हैं क्या हैं पुनर्जन्म का रहस्य, क्या सच्च हैं पुनर्जन्म, क्या राज हैं आत्मा नाम तत्व का , हम खा से आये हैं और कहा जाना हैं कौन हैं जो प्रकृति मे नाड को जन्म देता हैं क्यूँ जरूरी हैं शब्द जब भविष्य मे बोलने की आवश्यकता ही नही होगी मानवीय तरगै विचारों का आदान प्रदान करेँगी 
कौन हैं जो फ़ूलो मे रंग भरता हैं कोई तो होगा जो हर गणित का कर्ता हैं क्यूँ धरती पर 71% जल राशि हैं क्यूँ शरीर मे 71%जल राशि हैं क्यूँ मानव सभ्यता के आरम्भ से ही हम किसी अनन्त शक्ति की और खींचे जाते हैं 
अभी मानव अपने शरीर और धरती को नही समझ पाया और बात करता हैं अंतरिक्ष, ब्रह्माण्ड, अनन्त, और अँहद की,
वेदों को आज का विज्ञान भी मान्यता प्रदान करता हैं क्या हैं वैद क्या सच मे वैद देव वाणी हैं...?
चलो मान लेते है वैद कुछ नही हैं तो वेदों मे व्यू रचना क्यों हैं ब्रह्माण्ड और ग्रहो की सटीक जान कारी कैसै हैं वो भी आज से 5000 साल पहले..? अनन्त की चर्चा कैसै ? जब की अभी विज्ञान ब्रह्मांड मे खोज पर उलझा हैं
यहाँ अँहद जो समझने के लिये मात्र आपको सिद्ध करने के लिये वेदों की बात कर रहा हूँ बाकी ये अनुभव का विज्ञान हैं वैद ब्रह्म वाक्यम् हैं और सदियों से वैद हमारा मार्ग दर्शन कर रहे हैं
को सन्धिअँहद विच्छेद कर समझे
 
अगोचर् :- यूँ हम चाहे तो शब्दों का प्रयोग अपनी इच्छा के अनुसार भी कर सकते हैं किन्तु शब्द स्वयं ही अपना अर्थ कहते हैं शब्द से छैड़ छाड़ घातक हो सकते हैं शब्द परमाणु शक्ति की तरह हैं शब्द का जन्म नाड से हुआ हैं नाड से निकलने वाली ध्वनि को शब्द का रूप देते हुए ध्यान की परम् आवश्यकता पड़ती हैं
अगोचर् वैदिक भाषा संस्कृत से निकल हैं सामान्य हिंदी मे इस का अर्थ अज्ञात हैं जिसे न जाना गया हो जिसे न जाना जा स्का जाये जो अज्ञात हो सदियो से जिसकी खोज जारी हो संस्कृत के अगोचर् का भले मूल अर्थ यही हो परन्तु अगोचर् सच मे विशाल हैं सहज नही हैं अगर योग की भाषा का प्रयोग करे तो अगोचर् को यूँ भी ख सकते हैं जिसे इन्द्रियों के द्वारा न जाना जा सके वही अगोचर् हैं कहि अगोचर् को इन्द्रियतित भी कहा गया हैं और कहि कहि ब्रह्म की संज्ञा भी दी गई हैं जो इंद्रियों मे हो कर भी इंद्रियों से परे हैं जिसे इन्द्रियों के द्वारा नही जाना जा सकता जो हैं जो अस्तित्व मे पर भी देखा, सुना या समझा न जा सके केवल अनुभव किया जाये इस अदृश्य न मालूम पड़ने वाला भी समझना चाहिये जो अँहद मे गोचर होगा जिसे कोई नाम नही दे सकता हर कोई अपने अनुसार बेम की संज्ञा देकर भजता हैं जो कण कण मे हैं जो स्वयं का अनुभव डाइट हैं परन्तु फिर एक पल मे भर्मित कर माया मे ओझल हो जाता हैं व्ही हैं अगोचर् जिसे कोई नही चराचर मे समजग सका

प्रथम पाँच यौगिक क्रियाये



 
प्रथम पाँच यौगिक क्रियाये 
पहले अपने आस-पास के वातावरण को शांत कर ले
हो सके तो भूमि पर आसन लगाये तथा कोई हल्का संगीत लगाये
यौगिक क्रिया करने से पहले बाये हाथ को धरती पर रखै दायिनै हाथ को अपने सर पर रखै और देखें की आपका ब्रह्मरन्ध्र (सर) क्या गर्म हैं
यदि हाँ तो प्रार्थना करें
हे प्रभु मेरे मस्तिक की उलझनों को को मिटाओ मुझे तनाव मुक्त करो , मेरे जीवन की बाधाओ को हरो मुझे रोग मुक्त करो
मुझे शारीरिक ,मानसिक शांति प्रदान करो

साँस कर्म :-अपनी दोनों आँखों को धीरे-धीरे बन्द करे , पांच बार अंदर बाहर धीरे धीरे लम्बी लम्बी साँस ले सांसो पर ध्यान लगाये
आँखै खोले पुनः बाये हाथ को धरती पर तथा दाये हाथ को सर पर रखै
प्रार्थना करे हे माँ धरती दैवी मेरे शरीर से निकलने वाली तामसिक ऊर्जा को शांत करे हमें सात्विक ऊर्जा प्रदान करे
1.प्राणवायु सूत्र :-दोनों हाथो की कनिष्ठा तथा अनामिका अंगुलियो के अग्रभाग को अंगूठे के अग्रभाग से मिलाये
साँस कर्म पहले की तरह हो ,
अब इसी मुद्रा द्वारा नाभिं से दो अंगुल नीचे धीरे धीरे दवाब दे तथा उसे ऊपर की और धकेले यह कार्य हल्के हल्के झटके से करे
ऐनिमेशन न.1
2.आपन वायु सूत्र:- दोनों हाथो की मध्यमा तथा अनामिका अंगुलियो को अंगूठे के अग्रभाग से लगा दे साँस कर्म पूर्व की तरह ही हो इस बार दाये हाथ के अंगूठे को मुद्रा सहित नाभी पर रखै बाये हाथ की मुद्रा सहित कनिष्ठ का व तर्जनी अंगुली को अपनी दोनों आँखों पर रखै अपने भीतर सांसो के साथ भीतर उतरने का प्रयास करे
3.समानवायु सूत्र:-दोनों हाथो की कनिष्ठा अंगुली को अंगूठे से लगा कर मिलाये साँस कर्म पूर्व की तरह हो इसी मुद्रा को करते हुए दाये हाथ को ह्रदय पर रखै तथा बाये हाथ से नाभि पर दाब दे पांच बार अंदर बाहर धीरे धीरे लम्बी साँस ले अपनी आँखों को बन्द ही रखै अपने भीतर उतरने का का प्रयास जारी रहे तथा अपनी सांसो को सुनने का प्रयत्न करे
4.व्यान वायु सूत्र:-दोनों हाथो के अंगूठे को तर्जनी अंगुली के सिरे पर लगा दे शेष तीनो अंगुलियो को सीधी रहेगी अब दाये हाथ से मुद्रा को मिला कर अपनी दोनों आँखों के मध्य (त्रिनेत्र पर रखै) सांसो की क्रिया बैसे ही हो मुद्रा से त्रिनेत्र पर पञ्च बार बाये और फिर दाये घुमाये और देखै आपको कौन सा रंग अनुभव हो रहा हैं दूसरे हाथ की मुद्रा आकाश की तरफ हो