Sunday, May 15, 2016

स्वामी हरीहर - दिव्यम् तेजोमय व्यक्तिगतव....


स्वामी हरीहर - दिव्यम् तेजोमय व्यक्तिगतव....
धर्म-आध्यात्म,योग ध्यान की दुनियां मे स्वामी हरीहर चैतन्य् परमहँस जी ने जिन ऊचाइयों, शक्तियो एंव उपलब्धियो को छुआ हैं शायद ही किसी ने इतनी कम आयु मे छुआ हो। आपका युवाओं पर अत्यन्त प्रभाव पड़ा हैं। युवा शक्ति आप जी को अपना सच्चा मार्ग दर्शक मानती हैं अपनी आध्यात्मिक शक्ति व अपनी ख़ोज(अंहद योग) के चलते आज स्वामी हरीहर जी पूरे विश्व के लोगों के साथ जुड़े हैं । और उन्हें अपनी साधना अंहद योग एंव योग से जीवन मुक्ति, जीवन युक्ति की कला सिखा रहे हैं।
आप जितने वैदिक व सुसंस्कृत हैं उतने ही व्याहारिक एंवम आधुनिक भी हैं आप आज की टैक्नोलॉजी से भी भली भाँति परिचित हैं। आप हर बात का मात्र धार्मिक पक्ष ही नही वैज्ञानिक पक्ष भी प्रकट करना हैं। कर्मकाण्ड और मनो विज्ञान का पूरा पूरा तालमेल हैं । आप एक अंहद योगी महर्षि आद्यात्म गुरु होने के साथ साथ शिक्षा मे पत्रकार तथा ऍम.ए. समाज शास्त्र भी हैं आपकी वाणी मे एक अलग ही ओज हैं आपकी वाणी आपके ज्ञान से मिलकर सुनने वाले के लिये औषधि की तरह बन जाती हैं आप पर वीणावदनि की असीम कृपा हैं अतः आपकी वाणी सुनने वाले को आरोग्यता प्रदान करती हैं यही कारण हैं की आज आप टी.वी(न्यूज चैनल) तथा इंटरनैट के जरिये फेसबुक, यु-टयुब, गूगल सर्च,मूषक, प्रैस वर्ड, आदि मे सबसे अधिक देखें जाने वाले आध्यात्मिक गुरु के रूप मे उभरकर सामने आए हैं विश्व के150 देशो मे लाखो लोग आपके विड़ियो सन्देश व सन्देश देखते हैं
आप विश्व की सामाजिक समस्याओं के प्रति भी जन जागरण का प्रयास करते हैं जिसमें पर्यवरण,जल, नदियो के प्रदूषण, भूख, महिला, बाल शोषण, आदि

Tuesday, April 26, 2016

अनहद का अर्थ है:-

अनहद का अर्थ है:- जिसका कोई हद न हो। अर्थात् जिसकी कोई सीमा न हो। यही कारण है कि अनहद शब्द का प्रयोग ब्रह्म या ईश्वर के लिए एक विशेषण के रूप में अनेक स्थानों पर किया जाता है।पर मेरी नज़र में अनहद की सीमा है और केवल योगी योग के माध्यम से अनहद को समझ सकता है वो ब्रहमांड जिसकी कोई हद नही..पर येागी उस ब्रहमांड को सिमित दायरे मे. ला सकते है यु तो वेद पुराण साक्षी है कि ब्रहमांड देह में ही बसता है यही नही देह मे करोडो ब्रहमांड बसते है तो योगी योग के माध्य in से ब्रहमांड को चैतन कर सकता है चैतन ब्रहमांड ही ब्रह्म का ईश्वर साकार रूप है अनहद. अनहद का अर्थ है वह जो हमारे हद में है पर उसका रास्ता बाहर से नही अंदर से है वहा अंहद है वही सहज है वही चैतन जगत है वही ईशवर का रास्ता है बिना किसी आघात के दिव्य प्रकृति के अन्तराल से जो ध्वनियाँ उत्पन्न होती हैं, उन्हें 'अनाहत' या 'अनहद' कहते हैं।
अंहद क्या हैं :-
अनन्त + हद :-वह अनहदयोग एक आसान पद्धति है जिसकी कोई हद नही सच ही तो हैं जो अनन्त हैं तो हद कैसी ...? अनन्त वह जो दिख रहा हैं अनुभव हो रहा आरंभ हैं पर अंत नही, मध्य का पता नही , वह अनन्त, जो आयु, समय से परै हैं बस हैं तो हर पल परिवर्तन ही परिवर्तन, हलचल बस अनन्त जिसमे कुछ न कुछ घटित होता रहता हैं जहाँ हर पल निर्माण- निर्वाण हैं वह अनन्त जिसे न नापा गया न नापा जा सकता हैं केवल अनुभव किया गया हैं वह अनन्त जो स्वयं भ्रम का जाल बुनता हैं वही अनन्त ब्रह्म बनता हैं कोटी-कोटि दुरी तक फैला, अपना आकर बडता तो कभी स्वयं सुकड़नै लगता हैं अनन्त का अंत नही , कोई हद नही ....
पर कौन कहता अनन्त को समझा नही जा सकता हैं कौन कहता हैं अनन्त को नही जाना जा सकता मेरी सोच मे निगाहों से देखने पर अनन्त की हद नही पर अनन्त को अपनी हद मे लाया जा सकता हैं वही तो अंहद योग हैं बस प्रयास की आवश्यकता हैं मेरा अनुभव कहता हैं जो हद मे लाया जा सकता हैं वह साकार रूप हैं और जिसे हद मे नही लाया जा सकता वह निराकार रूप ब्रह्म हैं दोनों को योग द्वारा प्रयोग मे लेने का सूत्र ही अंहद योग हैं आज के विज्ञान मे मे अनन्त को समझने मे आयु, और समय सबसे बड़ी बाधा हैं न मनुष्य के पास बड़ी आयु हैं न समय तो अनन्त को जानने का एक ही मार्ग बचत हैं एक ही सूत्र बचता हैं वह हैं अध्यात्म मार्ग जो अनन्त ब्रह्माण्ड को हद मे ला सकता हैं खोज का सूत्र प्रयासों पर टिकता हैं
अँहद को प्रकार भी जाने:-
1. अगोचर् निर्ंजन हिरण्यगर्भम् च दिव्यता
एतदै सयुक्त रूपेण अह्ड़्योगम
अ-अगोचर् ........अज्ञात, या जिसे न जाना गया हो
न- निर्ंजन..........शुद्ध , झूठ से मुक्त
ह-हिरण्यगर्भम्.....ब्रह्मरूप आदित्य
द- दिव्यता.......परमात्मा का
वह जो अज्ञात हैं जिसे कोइ न जान पाया , जो शुद्ध सोने से भी खरा हैं जो झूठ से मुक्त हैं झूठ(पाप) जिसके पास भी नही आ सकता जो ब्रह्म रूप आदित्य (ज्योति रूप) परमात्मा का स्थान हैं वही अँहद हैं
2.  इसे इस प्रकार भी जाने
अ- अतत्वार्यवत...... वास्तविकता का ज्ञान (ब्रह्म)
न- नाभियान........... ध्यान केन्द्रित
ह- हित्वा...….…........होने वाला
द- दिव्यणा.............. आकाशीय
वह( ब्रह्म)वास्तविकता का ज्ञान जो ध्यान केंद्रित मे होने वाला आकाशीय रूप मे हैं वही अँहद हैं
अंहदयोग:-एक आध्यात्मिक प्रकिया को कहते हैं जिसमें शरीर, मन और आत्मा को एक साथ लाने (योग) का काम होता है
इसे इस प्रकार भी जाने

अनहदयोग एक आसान पद्धति है:-अनहदयोग एक आसान पद्धति है जिसे सीख कर हर इन्सान हर जगह हर कार्य अपने जीवन में इससे अपने आप को अच्छा कर सकता है दूसरो की बुराइओ को दूर कर सकता हैं वह समाज को पतन की तरफ जाते हुए उसे ऊपर उठा सकता है यह बहुत आसान प्रक्रिया हैं जिसे प्रयोग में लाकर स्वास्थ्य अच्छा रख सकते है बच्चो की स्मरण शक्ति को बढ़ा सकते हैं तथा बच्चो को बचपन में चश्मे चढ़े हुए को उतार सकते है बुजुर्गो को परेशानियो से बचा सकते है स्त्रियो को अपमान से बचा सकते है
 अनहदयोग  आत्मज्ञान को प्राप्त करने की अत्यंत सरल सुलभ ध्यान पद्धति है। यह परमात्मा की सर्वव्यापक शक्ति से जु़ड़ने का सरल एवं सिद्ध मार्ग है। अनहदयोग आत्म साक्षात्कार कर परमात्मा को जानने की विधा सीखी।
परमात्मा का वास मनुष्य के भीतर है लेकिन बहुत कम लोगों ने इसका अनुभव किया है। परमात्मा की सर्वव्यापकता शक्ति का प्रतिबिम्ब कुंडलिनी के रूप में हर व्यक्ति की रीढ़ की हड्डी के निचले छोर पर स्थित पवित्र त्रिकोणकार अस्थि में सुप्तावस्था में विद्यमान है।
इस ईश्वरीय शक्ति के जागृत होने पर मानव के सृजनात्मक व्यक्तित्व उत्तम स्वास्थ्य का विकास होने लगता है और उसकी अंतर्जात प्रतिभा खिल उठती है। उस पर परमात्मा की कृपा बरसने लगती है। मनुष्य तनाव रहित जीवन निःस्वार्थ प्रेम एवं आनंद की स्थिति में स्थापित होने लगता है।
अनहदयोग में लाभ  के नियमित अभ्यास से कैंसर ब्लड प्रेशर हाइपर टेंशन और हृदय के रोगियों को भी लाभ हुआ है। अनहदयोग भारत की एक अत्यंत पुरातन साधनाओं में से एक ध्यानविधि है। अनहदयोग लगभग २५०० वर्ष पूर्व भारत में यह पद्धति एक सार्वजनीन रोग के सार्वजनीन इलाज, अर्थात्  के रूप में सिखाया गया। 
अनहदयोग का महत्व अनहदयोग करने से केवल बीमारियों को दूर रखा जा सकता है बल्कि मानसिक तनाव से भी मुक्ति मिल सकती है। खासकर विद्यार्थियों के लिए तो अनहदयोग अमृत के समान है। जो विद्यार्थी अनहदयोग को अपने जीवन में नियमित रूप से शामिल करते हैं वे केवल पढ़ाई में अव्वल आते रहते हैं साथ ही अन्य गतिविधियों में भी उनका कोई मुकाबला नहीं रहता। इस सार्वजनीन साधना-विधि का उद्देश्य विकारों का संपूर्ण निर्मूलन एवं परमविमुक्ति की अवस्था को प्राप्त करना है। इस साधना का उद्देश्य केवल शारीरिक रोगों को नहीं बल्कि मानव मात्र के सभी दुखों को दूर करना है।
 गुण और दोष प्रत्येक व्यक्ति में होते हैं,
अंहदयोग से जुडने के बाद दोषों का शमन हो जाता है और गुणों में बढोतरी होने लगती है।
आत्मा में परमात्मा का वास है, उसे देखने के लिए भीतर के चक्षु चाहिए। बाहरी चक्षुओं से सूरज का उजाला मिलता है, परन्तु भीतर के चक्षुओं से आत्मा का उजाला मिलता है।
 अंहदयोग का लक्ष्य:-
अनहदयोग का लक्ष्य स्वास्थ्य में सुधार से लाकर मोक्ष प्राप्त करने तक है अंहदयोग का लक्ष्य मोक्श का रूप लेता है, जो सभी सांसारिक कष्ट एवं जन्म और मृत्यु के चक्र (संसार) से मुक्ति प्राप्त करना है, उस क्षण में परम ब्रह्मण के साथ समरूपता का एक एहसास है।
महाभारत में, अंहदयोग का लक्ष्य ब्रह्मा के दुनिया में प्रवेश के रूप में वर्णित किया गया है, ब्रह्म के रूप में, अथवा आत्मन को अनुभव करते हुए जो सभी वस्तुएँ मे व्याप्त है भक्ति संप्रदाय के वैष्णव धर्म में अंहदयोग का अंतिम लक्ष्य स्वयं भगवन का सेवा करना या उनके प्रति भक्ति होना है, जहां लक्ष्य यह है की महाविष्णु के साथ एक शाश्वत रिश्ते का आनंद लेना.
शरीर के अंदर मौजूद एक ऊर्जा शक्ति है, जिसे दिव्य शक्ति भी कहा जाता है।  समस्त ब्रह्मांड में परिव्याप्त सार्वभौमिक शक्ति है,  शक्ति प्रत्येक जड़-चेतन सभी में अपने-अपने रूप व गुणानुरूप अधिक या कम मात्रा में विद्यमान रहती है। शरीर में मौजूद यह  शक्ति (ऊर्जा शक्ति) सुप्तावस्था (सोई हुई अवस्था) में अनंतकाल से विद्यमान रहती है। प्रकृति की यह महान ऊर्जा विद्युत शक्ति से कई गुना अधिक शक्तिमान है। यह शक्ति बिना किसी भेदभाव के संसार के सभी मनुष्य में जन्मजात पायी जाती है। मनुष्य में यह सब प्राणियों की अपेक्षा अधिक जाग्रत होती है। मनुष्य में यह पूर्ण रूप से जागती है तो उसका परमात्मा से एकाकार हो जाता है। ऐसे में उसका मन और अहंकार शेष नहीं रहता है, सबकुछ ईश्वर के प्रकाश से ज्योतिर्मय हो जाता है और अनेक प्रकार की सिद्धियां प्राप्त हो जाती हैं।
अंहद की यात्रा कोई भी कर सकता हैं बस प्रयास करो तो परिवर्तन देख़ो  अंहदयोग आत्म-निरीक्षण द्वारा आत्मशुद्धि की साधना है। अपने ही शरीर और चित्तधारा पर पल-पल होनेवाली परिवर्तनशील घटनाओं को तटस्थभाव से निरीक्षण करते हुए चित्तविशोधन का अभ्यास हमें सुखशांति का जीवन जीने में मदद करता है। हम अपने भीतर शांति और सामंजस्य का अनुभव कर सकते हैं।
हमारे विचार, विकार, भावनाएं, संवेदनाएं जिन वैज्ञानिक नियमों के अनुसार चलते हैं, वे स्पष्ट होते हैं। अपने प्रत्यक्ष अनुभव से हम जानते हैं कि कैसे विकार बनते हैं, कैसे बंधन बंधते हैं और कैसे इनसे छुटकारा पाया जा सकता है। हम सजग, सचेत, संयमित एवं शांतिपूर्ण बनते हैं
निरंतर अभ्यास से ही अच्छे परिणाम आते हैं। सारी समस्याओं का समाधान दस दिन में ही हो जायेगा ऐसी उम्मीद नहीं करनी चाहिए। दस दिन में साधना की रूपरेखा समझ में आती है जिससे की निरंतर अभ्यास से ही अच्छे परिणाम आते हैं। सारी समस्याओं का समाधान दस दिन में ही हो जायेगा ऐसी उम्मीद नहीं करनी चाहिए। दस दिन में साधना की रूपरेखा समझ में आती है जिससे की  जीवन में उतारने का काम शुरू हो सके। जितना जितना अभ्यास बढ़ेगा, उतना उतना दुखों से छुटकारा मिलता चला जाएगा और उतना उतना साधक परममुक्ति के अंतिम लक्ष्य के करीब चलता जायेगा। दस दिन में ही ऐसे अच्छे परिणाम जरूर आयेंगे जिससे जीवन में प्रत्यक्ष लाभ मिलना शुरू हो जायेगा। जीवन में उतारने का काम शुरू हो सके। जितना जितना अभ्यास बढ़ेगा, उतना उतना दुखों से छुटकारा मिलता चला जाएगा और उतना उतना साधक परममुक्ति के अंतिम लक्ष्य के करीब चलता जायेगा। दस दिन में ही ऐसे अच्छे परिणाम जरूर आयेंगे जिससे जीवन में प्रत्यक्ष लाभ मिलना शुरू हो जायेगा। यह साधना मन का व्यायाम है। जैसे शारीरिक व्यायाम से शरीर को स्वस्थ बनाया जाता है वैसे ही से मन को स्वस्थ बनाया जा सकता है। अगर ज्ञान प्राप्त करना है तो एकमात्र उपाय है एकाग्रशक्ति का प्रयोग करना। एक वैज्ञानिक प्रयोगशाला में जाकर अपने मन की समस्त शक्तियों को केन्द्रित कर, वस्तुओं का विश्लेषण करता है,उनपर प्रयोग करता, और फिर उनका रहस्य जान लेता है। खगोल- शास्त्री अपने मन की समस्त शक्तियों को एकत्र कर दूरवीन के भीतर से आकाश में प्रयोग करता है,और फिर सूर्य व तारों के रहस्यों का पता लगता है। हम किसी वस्तु मे  मन का जितना निवेश करते हैं उतना ही हम उस विशय में अधिक जान सकते हैं । यदि प्कृति के द्वार को खटखटाने और उसपर आघात करने का ज्ञान प्राप्त हो जाय तो प्रकृति अपना रहस्य स्वतः खोल देती है। उस आघात की शक्ति और तीव्रता, एकाग्रता से ही आती है। मानव मन
की शक्ति की कोई सीमा नहीं है,वह जितना एकाग्र होता है, उतनी ही उसकी शक्ति एक लक्ष्य पर केन्द्रित होती है, यही एक रहस्य है ।
हर व्यक्ति के मन में परमात्मा के दर्शन की लालसा होती है,उसकी जिन्दगी में ऐसा क्षण आता है कि वह अपने अहं और संस्कारों को भुलाकर अपनी खोज का विश्लेषण करता है,और फिर दोबारा सत्य की खोज में निकलता है, इसी सत्य का साक्षात्कार तथा अपनी आत्मा की उपस्थिति की अनुभूति ही अंहदयोग का संदेश है ।आत्मा प्रेरित करती है और सरस्वती की कृपा से शव्द जुडते जाते हैं ।जिन्होंने swami harihar इस युग में सत्य को पाने की एक सरल युक्ति अंहदयोग का वरदान मानव जाति को दिया है। परमात्मा द्वारा हमारे शरीर में जिस आत्मा को जन्म दिया है उसका अनुभव करने की शक्ति हमें जन्म से ही प्राप्त है,लेकिन इसके प्रकटीकरण करने के लिए हमारे भीतर तीव्र इच्छा तथा सही मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है, जब हमारे अन्दर इस शक्ति को जानने तथा पाने की तीव्र इच्छा होती है,तब श्री swami harihar जी स्वयं मार्ग दर्शन करते हैं और हमें स्वयं ही अपनी आत्मा का अनुभव होने लगता है्, और  स्थिति में उस आत्मा का परमात्मा से योग हो जाता है। वैसे इच्छाओ की तृप्ति में मनुष्य कभी सन्तुष्ट नहीं होता मगर जब उसे उस परमात्मा का प्रेम और परम चैतन्य की अनुभूति होती है तो,वह तृप्त हो जाता है।जिसमें सत्य के साथ रहने तथा सत्य के लिए अपने आप से प्रश्न करने
की हिम्मत हो, परमात्मा की कृपा से उसकी इच्छाऐं पूर्ण होती हैं
जिसमें हमारी आन्तरिक शक्ति अर्थात कुण्डलिनी जागृत होती है, कुण्डलिनी तथा सात ऊर्जा केन्द्र जिन्हैं चक्र कहते हैं,जो कि हमारे अन्दर जन्म से ही विद्यमान हैं। ये चक्र हमार शारीरिक,मानसिक, भावनात्मक तथा आध्यात्मक पक्ष को नियन्त्रित करते हैं इन सभी
चक्रों में अपनी-अपनी विशेषता होती है,सबके कार्य बंटे हुये हैं ।कुण्डलिनी के जागृत होने पर सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में फैली हुई ईश्वरीय शक्ति के साथ एकाकारिता को जिसमें हमारी आन्तरिक शक्ति अर्थात कुण्डलिनी जागृत होती है, कुण्डलिनी तथा सात ऊर्जा केन्द्र जिन्हैं चक्र कहते हैं,जो कि हमारे अन्दर जन्म से ही विद्यमान हैं। ये चक्र हमार शारीरिक,मानसिक, भावनात्मक तथा आध्यात्मक पक्ष को नियन्त्रित करते हैं इन सभी
चक्रों में अपनी-अपनी विशेषता होती है,सबके कार्य बंटे हुये हैं ।कुण्डलिनी के जागृत होने पर सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में फैली हुई ईश्वरीय शक्ति के साथ एकाकारिता को  जिसमें हमारी आन्तरिक शक्ति अर्थात कुण्डलिनी जागृत होती है,कुण्डलिनी तथा सात ऊर्जा केन्द्र जिन्हैं चक्र कहते हैं,जो कि हमारे अन्दर जन्म से ही विद्यमान हैं। ये चक्र हमारे शारीरिक,मानसिक, भावनात्मक तथा आध्यात्मक पक्ष को नियन्त्रित करते हैं इन सभी
चक्रों में अपनी-अपनी विशेषता होती है,सबके कार्य बंटे हुये हैं ।कुण्डलिनी के जागृत होने पर सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में फैली हुई ईश्वरीय शक्ति के साथ एकाकारिता को  जिसमें हमारी आन्तरिक शक्ति अर्थात कुण्डलिनी जागृत होती है,कुण्डलिनी तथा सात ऊर्जा केन्द्र जिन्हैं चक्र कहते हैं,जो कि हमारे अन्दर जन्म से ही विद्यमान हैं। ये चक्र हमारे शारीरिक,मानसिक,भावनात्मक तथा आध्यात्मक पक्ष को नियन्त्रित करते हैं इन सभी
चक्रों में अपनी-अपनी विशेषता होती है,सबके कार्य बंटे हुये हैं ।कुण्डलिनी के जागृत होने पर सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में फैली हुई ईश्वरीय शक्ति के साथ एकाकारिता को अंहदयोग कहते हैं ।और कुण्डलिनी के सूक्ष्म जागरण तथा अपने  अन्तरनिहित खोज को (अंहदयोग) आत्म साक्षात्कार कहते हैं। आत्म साक्षात्कार के बाद  परिवर्तन  स्वतः जाता है ।वर्तमान तनावपूर्ण तथा प्रतिस्पर्धात्मक वातावरण में भी सामज्स्य बनाना सरल हो जाता है और सुन्दर स्वास्थ्य,आनंद,शान्तिमय जीवन तथा मधुर सम्बन्ध कायम करने में सक्षम होते हैं कहते हैं ।और कुण्डलिनी के सूक्ष्म जागरण तथा अपने  अन्तरनिहित खोज को आत्म साक्षात्कार कहते हैं। आत्म साक्षात्कार के बाद  परिवर्तन  स्वतः जाता है ।वर्तमान तनावपूर्ण तथा प्रतिस्पर्धात्मक वातावरण में भी सामज्स्य बनाना सरल हो जाता है और सुन्दर स्वास्थ्य,आनंद,शान्तिमय जीवन तथा मधुर सम्बन्ध कायम करने में सक्षम होते हैं कहते हैं ।और कुण्डलिनी के सूक्ष्म जागरण तथा अपने  अन्तरनिहित खोज को आत्म साक्षात्कार कहते हैं। आत्म साक्षात्कार के बाद  परिवर्तन  स्वतः जाता है ।वर्तमान तनावपूर्ण तथा प्रतिस्पर्धात्मक वातावरण में भी सामज्स्य बनाना सरल हो जाता है और सुन्दर स्वास्थ्य,आनंद,शान्तिमय जीवन तथा मधुर सम्बन्ध कायम करने में सक्षम होते हैं योग कहते हैं ।और कुण्डलिनी के सूक्ष्म जागरण तथा अपने  अन्तरनिहित खोज को आत्म साक्षा
त्कार कहते हैं। आत्म साक्षात्कार के बाद  परिवर्तन  स्वतः जाता है ।वर्तमान तनावपूर्ण तथा प्रतिस्पर्धात्मक वातावरण में भी सामज्स्य बनाना सरल हो जाता है और सुन्दर स्वास्थ्य,आनंद,शान्तिमय जीवन तथा मधुर सम्बन्ध कायम करने में सक्षम  होते हैं जीवन में परिपक्व बनने के लिए उदारता गुण होना चाहिए। इसके लिए भौतिक चीजों से मोह त्यागना होगा,उदारता का आनन्द पाने के लिए तो कुछ देना होता है।यदि एक बार आप उदारता का आनन्द लेने लगेंगे तो आप जान जायेंगे कि प्रेम और करुणॉ आपसे दूसरों तक बहने लगी है,यह प्रेम और करुणॉ सभी लोगों तक फैलनी चाहिए। आत्म निरीक्षण करें आपकी देह ही साधना का सबसे बड़ा मध्य हैं! अत: इसे अंहद योग द्वारा पूर्ण रूपेण स्वस्थ व प्राण प्रवाह से युक्त रख़े जिससे आपका मन मनोमय कोष से हटे और मन प्राण कोष मे प्रविष्ट हो सके ! आत्मा विजय के लिये पंच भूतो पर विजय परम् आवश्यक हैं ! 
प्रकृति के दिये इस शरीर मे सब कुछ हैं जो अनन्त ब्रह्मांड मे माजूद हैं बस हमे अपनी अंहद की ख़ोज का दायरा बढ़ाना होगा इस देह के अंहद मे सात द्वीपों के सहित सुमेरु पर्वत , सरिता, सागर,पर्वत क्षेत्र, क्षेत्रपाल,ऋषि मुनि,सभी ग्रह, नक्षत्र, आकाश गंगा,पुण्यै तीर्थ व पीठ,पीठ देवता,सभी विद्यमान हैं सूर्य-चन्द्र आदि आदि इस देह के अंहद सदा सदा ही विद्यमान रहते हैं तीनो लोको के सभी प्राणी शरीरस्थ सुमेरु के आश्रय मे हुये अपने अपने व्यवहार मे प्रवर्त रहते हैं यह जाने का मार्ग अंहद योग ही हैं,निसंदेह आप उदार बन सकते हो। उदार विवेक आपमें तभी आयेगा जब आप अपने जीन का लक्ष्य जान जान जायेंगे और यह जानेंगे कि आप किसलिए हैं। 

अंहदयोग का महत्व:-
वर्तमान समय में अपनी व्यस्त जीवन शैली कारण लोग सतोष पाने के लिए
अंहद योग करते हैं।अंहदयोग से न व्यक्ति का तनाव दूर होता है बल्कि मन और मस्तिष्क को भी शांति मिलती है।
अंहदयोग बहुत ही लाभकारी है।
अंहदयोग न केवल हमारे दिमाग, मस्‍तिष्‍क को ही ताकत पहुंचाता है बल्कि हमारी आत्‍मा को भी शुद्ध करता है। आज बहुत से लोग मोटापे से परेशान हैं, उनके लिए
अंहद योग बहुत ही फायदेमंद है।
अंहदयोग के फायदे से आज सभी जानते है, जिस वजह से आज
अंहदयोग विदेशों में भी प्रसिद्ध है
आत्मसाक्षात्कार प्राप्त करने के पश्र्चात् मनुष्य अपनी आत्मा से एकाकारिता प्राप्त कर आत्मस्वरूप चेतन को महसूस करता है 

Saturday, March 26, 2016

अँहद मार्ग:- अँहद की यात्रा हैं अभ् से नभ् की यात्रा


अँहद मार्ग:- अँहद की यात्रा हैं अभ् से नभ् की यात्रा
अभ् यानि ईडला से पिंगला (सुष्प्ति )से सहस्त्र की मह यात्रा का मार्ग हैं अँहद योग ये वह मार्ग जिस पर साधक को अकेले ही बढ़ना हैं इस मार्ग मे कोई साथ नही चलता , केवल एकांत मार्ग मे साधक अकेला ही आगे बढ़ता हैं 
यहाँ दर्शन शास्त्र मे अँहद की महा यात्रा पर अलग अलग मार्गो का वर्णन मिलता हैं 
परन्तु आवश्यकता मात्र विलय की हैं वह विलय ही आनन्द का प्रतिक हैं या कहै की आनन्द की प्राप्ति ही ईश्वर का सच्चा सुख 
हैं अँहद मार्ग अनुभव का विज्ञान हैं जहाँ भीतर और भीतर उतरने पर कुछ नया और बहतर अनुभव होगा 
सबसे बड़ी बात हैं हर पल अनुभव एक सा नही होगा हर बार अलग ही होगा इस मार्ग पर चलने पर आपकी शरीरिक मानसिक अवस्था मे बड़ा परिवर्तन होता हैं चेहरे पर दैवीय ओज, तेज प्रकट होता हैं देह रोग मुक्त, मन हल्का जान पड़ता हैं मन की शांति क्रोध रहित वातावरण बनती हैं दुसरो का क्रोध साधक हस कर भूल जाता हैं 

अँहद मे हैं प्रकृति :-
आइये अब ब्रह्म को जाने वाले मह मार्ग को जाने जिसे वेदों मे ब्रह्म कह कर सम्बोधित किया हैं वही दुनिया के अन्य धर्म भी किसी न किसी रूप मे उस अनन्त शक्ति को मानते ही नही अपितु अनुभव भी करते हैं या यूँ कहै की धर्म से ऊपर वह शक्ति हैं जो सब का निर्वाह, निर्माण, निर्वाण करतीहैं 
अन्य जीवो की अपेक्षा मनुष्य अधिक बुद्धि जीवी, व संवेदनशील हैं ऐसा आज का विज्ञान मानता हैं परन्तु यह सत्य नही ..?
कई जीव और पेड मनुष्य से विज्ञान मे हजारो वर्ष आगे हैं 
आप हैरत मे पड़े आने वाले समय मे विज्ञान बता देगा 
आपके भीतर ऐसे ही सैंकड़ों प्रश्न उठते होंगे
ऐसे ही हजारों प्रश्न हैं जिसका उत्तर मनुष्य सभ्यता के आरम्भ से ढूंढ रहा हैं आज भी सैकड़ों प्रश्न हैं जिसका उत्तर विज्ञान के पास नही हैं प्रकृति अपने मे अनभिज्ञ रहस्यों की खान हैं या यु कहै की हम अभी प्रक्रति को समझने मे छोटे बच्चे के समान हैं जो चाँद को भी मेरा हैं मेरा हैं कहता हैं मानव जन्म के लाखो वर्ष के पश्चात भी हम आरम्भ मे हैं हॉ कुछ महा मानव भी हुऐ जो प्रक्रति को समझ पाये आदि काल। मे वह ही हमें यहाँ तक लाये उन्होंने ही वेदों की रचना की या ये कहना उचित हो गा की वह ही आज के विज्ञान के जनक हैं
कौन हैं मानव सभ्यता का निर्माता, कौन हैं जो हमें निर्वाण डाइट हैं क्या हैं पुनर्जन्म का रहस्य, क्या सच्च हैं पुनर्जन्म, क्या राज हैं आत्मा नाम तत्व का , हम खा से आये हैं और कहा जाना हैं कौन हैं जो प्रकृति मे नाड को जन्म देता हैं क्यूँ जरूरी हैं शब्द जब भविष्य मे बोलने की आवश्यकता ही नही होगी मानवीय तरगै विचारों का आदान प्रदान करेँगी 
कौन हैं जो फ़ूलो मे रंग भरता हैं कोई तो होगा जो हर गणित का कर्ता हैं क्यूँ धरती पर 71% जल राशि हैं क्यूँ शरीर मे 71%जल राशि हैं क्यूँ मानव सभ्यता के आरम्भ से ही हम किसी अनन्त शक्ति की और खींचे जाते हैं 
अभी मानव अपने शरीर और धरती को नही समझ पाया और बात करता हैं अंतरिक्ष, ब्रह्माण्ड, अनन्त, और अँहद की,
वेदों को आज का विज्ञान भी मान्यता प्रदान करता हैं क्या हैं वैद क्या सच मे वैद देव वाणी हैं...?
चलो मान लेते है वैद कुछ नही हैं तो वेदों मे व्यू रचना क्यों हैं ब्रह्माण्ड और ग्रहो की सटीक जान कारी कैसै हैं वो भी आज से 5000 साल पहले..? अनन्त की चर्चा कैसै ? जब की अभी विज्ञान ब्रह्मांड मे खोज पर उलझा हैं
यहाँ अँहद जो समझने के लिये मात्र आपको सिद्ध करने के लिये वेदों की बात कर रहा हूँ बाकी ये अनुभव का विज्ञान हैं वैद ब्रह्म वाक्यम् हैं और सदियों से वैद हमारा मार्ग दर्शन कर रहे हैं
को सन्धिअँहद विच्छेद कर समझे
 
अगोचर् :- यूँ हम चाहे तो शब्दों का प्रयोग अपनी इच्छा के अनुसार भी कर सकते हैं किन्तु शब्द स्वयं ही अपना अर्थ कहते हैं शब्द से छैड़ छाड़ घातक हो सकते हैं शब्द परमाणु शक्ति की तरह हैं शब्द का जन्म नाड से हुआ हैं नाड से निकलने वाली ध्वनि को शब्द का रूप देते हुए ध्यान की परम् आवश्यकता पड़ती हैं
अगोचर् वैदिक भाषा संस्कृत से निकल हैं सामान्य हिंदी मे इस का अर्थ अज्ञात हैं जिसे न जाना गया हो जिसे न जाना जा स्का जाये जो अज्ञात हो सदियो से जिसकी खोज जारी हो संस्कृत के अगोचर् का भले मूल अर्थ यही हो परन्तु अगोचर् सच मे विशाल हैं सहज नही हैं अगर योग की भाषा का प्रयोग करे तो अगोचर् को यूँ भी ख सकते हैं जिसे इन्द्रियों के द्वारा न जाना जा सके वही अगोचर् हैं कहि अगोचर् को इन्द्रियतित भी कहा गया हैं और कहि कहि ब्रह्म की संज्ञा भी दी गई हैं जो इंद्रियों मे हो कर भी इंद्रियों से परे हैं जिसे इन्द्रियों के द्वारा नही जाना जा सकता जो हैं जो अस्तित्व मे पर भी देखा, सुना या समझा न जा सके केवल अनुभव किया जाये इस अदृश्य न मालूम पड़ने वाला भी समझना चाहिये जो अँहद मे गोचर होगा जिसे कोई नाम नही दे सकता हर कोई अपने अनुसार बेम की संज्ञा देकर भजता हैं जो कण कण मे हैं जो स्वयं का अनुभव डाइट हैं परन्तु फिर एक पल मे भर्मित कर माया मे ओझल हो जाता हैं व्ही हैं अगोचर् जिसे कोई नही चराचर मे समजग सका

प्रथम पाँच यौगिक क्रियाये



 
प्रथम पाँच यौगिक क्रियाये 
पहले अपने आस-पास के वातावरण को शांत कर ले
हो सके तो भूमि पर आसन लगाये तथा कोई हल्का संगीत लगाये
यौगिक क्रिया करने से पहले बाये हाथ को धरती पर रखै दायिनै हाथ को अपने सर पर रखै और देखें की आपका ब्रह्मरन्ध्र (सर) क्या गर्म हैं
यदि हाँ तो प्रार्थना करें
हे प्रभु मेरे मस्तिक की उलझनों को को मिटाओ मुझे तनाव मुक्त करो , मेरे जीवन की बाधाओ को हरो मुझे रोग मुक्त करो
मुझे शारीरिक ,मानसिक शांति प्रदान करो

साँस कर्म :-अपनी दोनों आँखों को धीरे-धीरे बन्द करे , पांच बार अंदर बाहर धीरे धीरे लम्बी लम्बी साँस ले सांसो पर ध्यान लगाये
आँखै खोले पुनः बाये हाथ को धरती पर तथा दाये हाथ को सर पर रखै
प्रार्थना करे हे माँ धरती दैवी मेरे शरीर से निकलने वाली तामसिक ऊर्जा को शांत करे हमें सात्विक ऊर्जा प्रदान करे
1.प्राणवायु सूत्र :-दोनों हाथो की कनिष्ठा तथा अनामिका अंगुलियो के अग्रभाग को अंगूठे के अग्रभाग से मिलाये
साँस कर्म पहले की तरह हो ,
अब इसी मुद्रा द्वारा नाभिं से दो अंगुल नीचे धीरे धीरे दवाब दे तथा उसे ऊपर की और धकेले यह कार्य हल्के हल्के झटके से करे
ऐनिमेशन न.1
2.आपन वायु सूत्र:- दोनों हाथो की मध्यमा तथा अनामिका अंगुलियो को अंगूठे के अग्रभाग से लगा दे साँस कर्म पूर्व की तरह ही हो इस बार दाये हाथ के अंगूठे को मुद्रा सहित नाभी पर रखै बाये हाथ की मुद्रा सहित कनिष्ठ का व तर्जनी अंगुली को अपनी दोनों आँखों पर रखै अपने भीतर सांसो के साथ भीतर उतरने का प्रयास करे
3.समानवायु सूत्र:-दोनों हाथो की कनिष्ठा अंगुली को अंगूठे से लगा कर मिलाये साँस कर्म पूर्व की तरह हो इसी मुद्रा को करते हुए दाये हाथ को ह्रदय पर रखै तथा बाये हाथ से नाभि पर दाब दे पांच बार अंदर बाहर धीरे धीरे लम्बी साँस ले अपनी आँखों को बन्द ही रखै अपने भीतर उतरने का का प्रयास जारी रहे तथा अपनी सांसो को सुनने का प्रयत्न करे
4.व्यान वायु सूत्र:-दोनों हाथो के अंगूठे को तर्जनी अंगुली के सिरे पर लगा दे शेष तीनो अंगुलियो को सीधी रहेगी अब दाये हाथ से मुद्रा को मिला कर अपनी दोनों आँखों के मध्य (त्रिनेत्र पर रखै) सांसो की क्रिया बैसे ही हो मुद्रा से त्रिनेत्र पर पञ्च बार बाये और फिर दाये घुमाये और देखै आपको कौन सा रंग अनुभव हो रहा हैं दूसरे हाथ की मुद्रा आकाश की तरफ हो

Friday, February 26, 2016

'''अनहदयोग:'''

'''अनहदयोग:''' 
''अपने आप अपने को जानना (ईशवर को पाना) ही अनहद योग है! सच भीतर ईश्वर है पर उनका कोई नाम नही...
भीतरिय ईश्वर की सच मे कोई पहचान नही....
नाम और पहचान आपको देनी है क्योकि वह
आपका अपना निजि ईश्वर है उनके आनन्द का
अनुभव आप का निजि आनन्द है न आप दिखा सकतै है न ही अनुभव करा सकतै है'' 
वैसे ही जैसे गूँगा व्यक्ति दूसरे को गुड़ का स्वाद नही बता सकता
अनुभव ही ब्रह्म से मिला सकता है अनुभव हीनता भ्रम मे ले जायेगी  !
अनहद  अनहद का अर्थ है:- जिसका कोई हद न हो। अर्थात् जिसकी कोई सीमा न हो। यही कारण है कि अनहद शब्द का प्रयोग ब्रह्म या ईश्वर के लिए एक विशेषण के रूप में अनेक स्थानों पर किया जाता है।पर मेरी नज़र में अनहद की सीमा है और केवल योगी योग के माध्यम से अनहद को समझ सकता है वो ब्रहमांड जिसकी कोई हद नही..पर येागी उस ब्रहमांड को सिमित दायरे मे. ला सकते है यु तो वेद पुराण साक्षी है कि ब्रहमांड देह में ही बसता है यही नही देह मे करोडो ब्रहमांड बसते है तो योगी योग के माध्य से ब्रहमांड को चैतन कर सकता है चैतन ब्रहमांड ही ब्रह्म का ईश्वर साकार रूप है अनहद. अनहद का अर्थ है वह जो हमारे हद में है पर उसका रास्ता बाहर से नही अंदर से है वहा अंहद है वही सहज है वही चैतन जगत है वही ईशवर का रास्ता है बिना किसी आघात के दिव्य प्रकृति के अन्तराल से जो ध्वनियाँ उत्पन्न होती हैं, उन्हें 'अनाहत' या 'अनहद' कहते हैं।
-'''अनहदयोग''' एक आसान पद्धति है जिसे सीख कर हर इन्सान हर जगह व हर कार्य व अपने जीवन में इससे अपने आप को अच्छा कर सकता है व दूसरो की बुराइओ को दूर कर सकता हैं | वह समाज को पतन की तरफ जाते हुए उसे ऊपर उठा सकता है | यह बहुत आसान प्रक्रिया हैं जिसे प्रयोग में लाकर स्वास्थ्य अच्छा रख सकते है व बच्चो की स्मरण शक्ति को बढ़ा सकते हैं, तथा बच्चो को बचपन में चश्मे चढ़े हुए को उतार सकते है, बुजुर्गो को परेशानियो से बचा सकते है अपमान से बचा सकते है
 अनहदयोग  आत्मज्ञान को प्राप्त करने की अत्यंत सरल सुलभ और सहज ध्यान पद्धति है। यह परमात्मा की सर्वव्यापक शक्ति से जु़ड़ने का सरल एवं सिद्ध मार्ग है। अनहदयोग आत्म साक्षात्कार कर परमात्मा को जानने की सरल विधा सीखी।
अधिकतर लोग जानते हैं कि परमात्मा का वास मनुष्य के भीतर है, लेकिन बहुत कम लोगों ने इसका अनुभव किया है। परमात्मा की सर्वव्यापकता शक्ति का प्रतिबिम्ब कुंडलिनी के रूप में हर व्यक्ति की रीढ़ की हड्डी के निचले छोर पर स्थित पवित्र त्रिकोणकार अस्थि में सुप्तावस्था में विद्यमान है।
इस ईश्वरीय शक्ति के जागृत होने पर मानव के सृजनात्मक व्यक्तित्व व उत्तम स्वास्थ्य का विकास होने लगता है और उसकी अंतर्जात प्रतिभा खिल उठती है। उस पर परमात्मा की कृपा बरसने लगती है। मनुष्य तनाव रहित जीवन, निःस्वार्थ प्रेम एवं आनंद की स्थिति में स्थापित होने लगता है।
अनहदयोग में लाभ  के नियमित अभ्यास से कैंसर, ब्लड प्रेशर, हाइपर टेंशन और हृदय के रोगियों को भी लाभ हुआ है। अनहदयोग भारत की एक अत्यंत पुरातन साधनाओंमेंसे एक ध्यान प्रणाली विधि है। जिसका अर्थ जो जैसा है, उसे ठीक वैसा ही देखना-समझना है।

Thursday, February 25, 2016

आपका अपना निजि ईश्वर

स सच भीतर ईश्वर है पर उनका कोई नाम नही...
भीतरिय ईश्वर की सच मे कोई पहचान नही...
नाम और पहचान आपको देनी है क्योकि वह
आपका अपना निजि ईश्वर है उनके आनन्द का
अनुभव आप का निजि आनन्द है न आप दिखा सकतै है न ही अनुभव करा सकतै है 
वैसे ही जैसे गूँगा व्यक्ति दूसरे को गुड़ का स्वाद नही बता सकता
अनुभव ही ब्रह्म से मिला सकता है अनुभव हीनता भ्रम मे ले जायेगी