अनहद का अर्थ
है:-
जिसका कोई हद न हो। अर्थात् जिसकी कोई सीमा न हो। यही कारण है कि अनहद शब्द का प्रयोग
ब्रह्म या ईश्वर के लिए एक विशेषण के रूप में अनेक स्थानों पर किया जाता है।पर मेरी
नज़र में अनहद की सीमा है और केवल योगी योग के माध्यम से अनहद को समझ सकता है वो ब्रहमांड
जिसकी कोई हद नही..पर येागी उस ब्रहमांड को सिमित दायरे मे. ला सकते है यु तो वेद पुराण
साक्षी है कि ब्रहमांड देह में ही बसता है यही नही देह मे करोडो ब्रहमांड बसते है तो
योगी योग के माध्य in से ब्रहमांड को चैतन कर सकता है चैतन ब्रहमांड ही ब्रह्म का ईश्वर
साकार रूप है अनहद. अनहद का अर्थ है वह जो हमारे हद में है पर उसका रास्ता बाहर से
नही अंदर से है वहा अंहद है वही सहज है वही चैतन जगत है वही ईशवर का रास्ता है बिना किसी
आघात के दिव्य प्रकृति के अन्तराल से जो ध्वनियाँ उत्पन्न होती हैं, उन्हें 'अनाहत'
या 'अनहद' कहते हैं।
अंहद क्या
हैं :-
अनन्त + हद :-वह अनहदयोग एक आसान पद्धति है जिसकी कोई हद नही सच ही तो हैं जो अनन्त
हैं तो हद कैसी ...? अनन्त वह जो दिख रहा हैं अनुभव हो रहा आरंभ हैं पर अंत नही, मध्य
का पता नही , वह अनन्त, जो आयु, समय से परै हैं बस हैं तो हर पल परिवर्तन ही परिवर्तन,
हलचल बस अनन्त जिसमे कुछ न कुछ घटित होता रहता हैं जहाँ हर पल निर्माण- निर्वाण हैं
वह अनन्त जिसे न नापा गया न नापा जा सकता हैं केवल अनुभव किया गया हैं वह अनन्त जो
स्वयं भ्रम का जाल बुनता हैं वही अनन्त ब्रह्म बनता हैं कोटी-कोटि दुरी तक फैला,
अपना आकर बडता तो कभी स्वयं सुकड़नै लगता हैं अनन्त का अंत नही , कोई हद नही ....
पर कौन कहता अनन्त को समझा नही जा सकता हैं कौन कहता हैं अनन्त को नही जाना जा सकता
मेरी सोच मे निगाहों से देखने पर अनन्त की हद नही पर अनन्त को अपनी हद मे लाया जा सकता
हैं वही तो अंहद योग हैं बस प्रयास की आवश्यकता हैं मेरा अनुभव कहता हैं जो हद मे लाया
जा सकता हैं वह साकार रूप हैं और जिसे हद मे नही लाया जा सकता वह निराकार रूप ब्रह्म
हैं दोनों को योग द्वारा प्रयोग मे लेने का सूत्र ही अंहद योग हैं आज के विज्ञान मे
मे अनन्त को समझने मे आयु, और समय सबसे बड़ी बाधा हैं न मनुष्य के पास बड़ी आयु हैं न
समय तो अनन्त को जानने का एक ही मार्ग बचत हैं एक ही सूत्र बचता हैं वह हैं अध्यात्म
मार्ग जो अनन्त ब्रह्माण्ड को हद मे ला सकता हैं खोज का सूत्र प्रयासों पर टिकता हैं
अँहद को प्रकार
भी जाने:-
1.
अगोचर् निर्ंजन हिरण्यगर्भम् च दिव्यता
एतदै सयुक्त रूपेण अह्ड़्योगम
अ-अगोचर् ........अज्ञात, या जिसे न जाना गया
हो
न- निर्ंजन..........शुद्ध , झूठ से मुक्त
ह-हिरण्यगर्भम्.....ब्रह्मरूप आदित्य
द- दिव्यता.......परमात्मा का
वह जो अज्ञात हैं जिसे कोइ न जान पाया , जो शुद्ध सोने से भी खरा हैं जो झूठ से
मुक्त हैं झूठ(पाप) जिसके पास भी नही आ सकता जो ब्रह्म रूप आदित्य (ज्योति रूप) परमात्मा
का स्थान हैं वही अँहद हैं
2. इसे इस प्रकार भी जाने
अ- अतत्वार्यवत...... वास्तविकता का ज्ञान
(ब्रह्म)
न- नाभियान........... ध्यान केन्द्रित
ह- हित्वा...….…........होने वाला
द- दिव्यणा.............. आकाशीय
वह( ब्रह्म)वास्तविकता का ज्ञान जो ध्यान केंद्रित मे होने वाला आकाशीय रूप मे
हैं वही अँहद हैं
अंहदयोग:-एक आध्यात्मिक प्रकिया को कहते हैं जिसमें शरीर, मन और
आत्मा को एक साथ लाने (योग) का काम होता है
इसे इस प्रकार भी जाने
अनहदयोग एक
आसान पद्धति है:-अनहदयोग एक आसान पद्धति है जिसे सीख कर हर इन्सान हर जगह व हर कार्य व अपने जीवन में इससे अपने आप को अच्छा कर सकता है व दूसरो की बुराइओ को दूर कर सकता हैं वह समाज को पतन की तरफ जाते हुए उसे ऊपर उठा सकता है यह बहुत आसान प्रक्रिया हैं जिसे प्रयोग में लाकर स्वास्थ्य अच्छा रख सकते है व बच्चो की स्मरण शक्ति को बढ़ा सकते हैं तथा बच्चो को बचपन में चश्मे चढ़े हुए को उतार सकते है बुजुर्गो को परेशानियो से बचा सकते है स्त्रियो को अपमान से बचा सकते है
अनहदयोग आत्मज्ञान को प्राप्त करने की अत्यंत सरल सुलभ ध्यान पद्धति है। यह परमात्मा की सर्वव्यापक शक्ति से जु़ड़ने का सरल एवं सिद्ध मार्ग है। अनहदयोग आत्म साक्षात्कार कर परमात्मा को जानने की विधा सीखी।
परमात्मा का वास मनुष्य के भीतर है लेकिन बहुत कम लोगों ने इसका अनुभव किया है। परमात्मा की सर्वव्यापकता शक्ति का प्रतिबिम्ब कुंडलिनी के रूप में हर व्यक्ति की रीढ़ की हड्डी के निचले छोर पर स्थित पवित्र त्रिकोणकार अस्थि में सुप्तावस्था में विद्यमान है।
इस ईश्वरीय शक्ति के जागृत होने पर मानव के सृजनात्मक व्यक्तित्व व उत्तम स्वास्थ्य का विकास होने लगता है और उसकी अंतर्जात प्रतिभा खिल उठती है। उस पर परमात्मा की कृपा बरसने लगती है। मनुष्य तनाव रहित जीवन निःस्वार्थ प्रेम एवं आनंद की स्थिति में स्थापित होने लगता है।
अनहदयोग में लाभ के नियमित अभ्यास से कैंसर ब्लड प्रेशर हाइपर टेंशन और हृदय के रोगियों को भी लाभ हुआ है। अनहदयोग
भारत की एक अत्यंत पुरातन साधनाओं में से एक ध्यानविधि है। अनहदयोग लगभग २५०० वर्ष पूर्व भारत में यह पद्धति एक सार्वजनीन रोग के
सार्वजनीन इलाज, अर्थात् के रूप में सिखाया गया।
अनहदयोग का महत्व अनहदयोग करने से न केवल बीमारियों को दूर रखा जा सकता है बल्कि मानसिक तनाव से भी मुक्ति मिल सकती है। खासकर विद्यार्थियों के लिए तो अनहदयोग अमृत के समान है। जो विद्यार्थी अनहदयोग को अपने जीवन में नियमित रूप से शामिल करते हैं वे न केवल पढ़ाई में अव्वल आते रहते हैं साथ ही अन्य गतिविधियों में भी उनका कोई मुकाबला नहीं रहता। इस सार्वजनीन साधना-विधि का उद्देश्य
विकारों का संपूर्ण निर्मूलन एवं परमविमुक्ति की अवस्था को प्राप्त करना है। इस साधना
का उद्देश्य केवल शारीरिक रोगों को नहीं बल्कि मानव मात्र के सभी दुखों को दूर करना
है।
गुण और दोष प्रत्येक व्यक्ति में होते हैं,
अंहदयोग से जुडने के बाद दोषों का शमन हो जाता है और गुणों में बढोतरी होने लगती है।
आत्मा में
परमात्मा का वास है, उसे देखने के लिए भीतर के चक्षु चाहिए। बाहरी चक्षुओं
से सूरज का उजाला मिलता है, परन्तु भीतर के चक्षुओं से आत्मा का उजाला मिलता है।
अंहदयोग का लक्ष्य:-
अनहदयोग का लक्ष्य स्वास्थ्य में सुधार से लाकर मोक्ष प्राप्त करने तक है अंहदयोग
का लक्ष्य मोक्श का रूप लेता है, जो सभी सांसारिक कष्ट एवं जन्म और मृत्यु के चक्र
(संसार) से मुक्ति प्राप्त करना है, उस क्षण में परम ब्रह्मण के साथ समरूपता का एक
एहसास है।
महाभारत में, अंहदयोग का लक्ष्य ब्रह्मा के दुनिया में प्रवेश के रूप में वर्णित किया
गया है, ब्रह्म के रूप में, अथवा आत्मन को अनुभव करते हुए जो सभी वस्तुएँ मे व्याप्त
है भक्ति संप्रदाय के वैष्णव धर्म में अंहदयोग का अंतिम लक्ष्य स्वयं भगवन का सेवा
करना या उनके प्रति भक्ति होना है, जहां लक्ष्य यह है की महाविष्णु के साथ एक शाश्वत
रिश्ते का आनंद लेना. शरीर के अंदर
मौजूद एक ऊर्जा शक्ति है, जिसे दिव्य शक्ति भी कहा जाता है। समस्त ब्रह्मांड
में परिव्याप्त सार्वभौमिक शक्ति है, शक्ति प्रत्येक जड़-चेतन सभी में अपने-अपने
रूप व गुणानुरूप अधिक या कम मात्रा में विद्यमान रहती है। शरीर में मौजूद यह
शक्ति (ऊर्जा शक्ति) सुप्तावस्था (सोई हुई अवस्था) में अनंतकाल से विद्यमान रहती
है। प्रकृति की यह महान ऊर्जा विद्युत शक्ति से कई गुना अधिक शक्तिमान है। यह शक्ति
बिना किसी भेदभाव के संसार के सभी मनुष्य में जन्मजात पायी जाती है। मनुष्य में यह
सब प्राणियों की अपेक्षा अधिक जाग्रत होती है। मनुष्य में यह पूर्ण रूप से जागती है
तो उसका परमात्मा से एकाकार हो जाता है। ऐसे में उसका मन और अहंकार शेष नहीं रहता है,
सबकुछ ईश्वर के प्रकाश से ज्योतिर्मय हो जाता है और अनेक प्रकार की सिद्धियां प्राप्त
हो जाती हैं।
अंहद की यात्रा कोई भी कर सकता हैं बस प्रयास करो तो परिवर्तन देख़ो अंहदयोग आत्म-निरीक्षण द्वारा आत्मशुद्धि
की साधना है। अपने ही शरीर और चित्तधारा पर पल-पल होनेवाली परिवर्तनशील घटनाओं को तटस्थभाव
से निरीक्षण करते हुए चित्तविशोधन का अभ्यास हमें सुखशांति का जीवन जीने में मदद करता
है। हम अपने भीतर शांति और सामंजस्य का अनुभव कर सकते हैं।
हमारे विचार, विकार, भावनाएं, संवेदनाएं जिन वैज्ञानिक नियमों के
अनुसार चलते हैं, वे स्पष्ट होते हैं। अपने प्रत्यक्ष अनुभव से हम जानते हैं कि कैसे
विकार बनते हैं, कैसे बंधन बंधते हैं और कैसे इनसे छुटकारा पाया जा सकता है। हम सजग,
सचेत, संयमित एवं शांतिपूर्ण बनते हैं
निरंतर अभ्यास से ही अच्छे परिणाम आते
हैं। सारी समस्याओं का समाधान दस दिन में ही हो जायेगा ऐसी उम्मीद नहीं करनी चाहिए।
दस दिन में साधना की रूपरेखा समझ में आती है जिससे की निरंतर अभ्यास से ही अच्छे परिणाम
आते हैं। सारी समस्याओं का समाधान दस दिन में ही हो जायेगा ऐसी उम्मीद नहीं करनी चाहिए।
दस दिन में साधना की रूपरेखा समझ में आती है जिससे की जीवन में उतारने का काम शुरू हो सके। जितना जितना
अभ्यास बढ़ेगा, उतना उतना दुखों से छुटकारा मिलता चला जाएगा और उतना उतना साधक परममुक्ति
के अंतिम लक्ष्य के करीब चलता जायेगा। दस दिन में ही ऐसे अच्छे परिणाम जरूर आयेंगे
जिससे जीवन में प्रत्यक्ष लाभ मिलना शुरू हो जायेगा। जीवन में उतारने का काम शुरू हो
सके। जितना जितना अभ्यास बढ़ेगा, उतना उतना दुखों से छुटकारा मिलता चला जाएगा और उतना
उतना साधक परममुक्ति के अंतिम लक्ष्य के करीब चलता जायेगा। दस दिन में ही ऐसे अच्छे
परिणाम जरूर आयेंगे जिससे जीवन में प्रत्यक्ष लाभ मिलना शुरू हो जायेगा। यह साधना मन
का व्यायाम है। जैसे शारीरिक व्यायाम से शरीर को स्वस्थ बनाया जाता है वैसे ही से मन
को स्वस्थ बनाया जा सकता है। अगर ज्ञान प्राप्त करना है तो एकमात्र उपाय है एकाग्रशक्ति का प्रयोग करना। एक वैज्ञानिक प्रयोगशाला
में जाकर अपने मन की समस्त शक्तियों
को केन्द्रित कर, वस्तुओं का विश्लेषण करता है,उनपर प्रयोग करता, और फिर उनका रहस्य जान लेता है। खगोल- शास्त्री अपने मन की समस्त शक्तियों को एकत्र कर
दूरवीन के भीतर से आकाश में प्रयोग
करता है,और फिर सूर्य व तारों के रहस्यों का पता लगता है। हम किसी वस्तु मे मन का
जितना निवेश करते हैं उतना ही हम उस विशय में अधिक जान सकते हैं । यदि प्कृति के द्वार को खटखटाने और उसपर आघात करने का
ज्ञान प्राप्त हो जाय तो प्रकृति अपना रहस्य स्वतः खोल देती है। उस आघात की शक्ति और तीव्रता, एकाग्रता से ही आती है।
मानव मन
की शक्ति की कोई सीमा नहीं है,वह जितना एकाग्र
होता है, उतनी ही उसकी शक्ति एक लक्ष्य पर केन्द्रित होती है, यही एक रहस्य है । हर व्यक्ति के मन में परमात्मा के दर्शन की लालसा होती
है,उसकी जिन्दगी में ऐसा क्षण आता है कि वह अपने अहं और संस्कारों को भुलाकर अपनी खोज
का विश्लेषण करता है,और फिर दोबारा सत्य की खोज में निकलता है, इसी सत्य का साक्षात्कार
तथा अपनी आत्मा की उपस्थिति की अनुभूति ही अंहदयोग का संदेश है ।आत्मा प्रेरित करती
है और सरस्वती की कृपा से शव्द जुडते जाते हैं ।जिन्होंने swami harihar इस युग में
सत्य को पाने की एक सरल युक्ति अंहदयोग का वरदान मानव जाति को दिया है। परमात्मा द्वारा
हमारे शरीर में जिस आत्मा को जन्म दिया है उसका अनुभव करने की शक्ति हमें जन्म से ही
प्राप्त है,लेकिन इसके प्रकटीकरण करने के लिए हमारे भीतर तीव्र इच्छा तथा सही मार्गदर्शन
की आवश्यकता होती है, जब हमारे अन्दर इस शक्ति को जानने तथा पाने की तीव्र इच्छा होती
है,तब श्री swami harihar जी स्वयं मार्ग दर्शन करते हैं और हमें स्वयं ही अपनी आत्मा
का अनुभव होने लगता है्, और स्थिति में उस
आत्मा का परमात्मा से योग हो जाता है। वैसे इच्छाओ की तृप्ति में मनुष्य कभी सन्तुष्ट
नहीं होता मगर जब उसे उस परमात्मा का प्रेम और परम चैतन्य की अनुभूति होती है तो,वह
तृप्त हो जाता है।जिसमें सत्य के साथ रहने तथा सत्य के लिए अपने आप से प्रश्न करने
की हिम्मत हो, परमात्मा की कृपा से उसकी इच्छाऐं पूर्ण होती हैं जिसमें हमारी आन्तरिक शक्ति अर्थात कुण्डलिनी जागृत होती है, कुण्डलिनी तथा सात ऊर्जा केन्द्र जिन्हैं चक्र कहते हैं,जो कि हमारे अन्दर जन्म से ही विद्यमान हैं। ये चक्र हमार शारीरिक,मानसिक, भावनात्मक तथा आध्यात्मक पक्ष को नियन्त्रित करते हैं । इन सभी
चक्रों में अपनी-अपनी विशेषता होती है,सबके कार्य बंटे हुये हैं ।कुण्डलिनी के जागृत होने पर सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में फैली हुई ईश्वरीय शक्ति के साथ एकाकारिता को जिसमें हमारी आन्तरिक शक्ति अर्थात कुण्डलिनी जागृत होती है, कुण्डलिनी तथा सात ऊर्जा केन्द्र जिन्हैं चक्र कहते हैं,जो कि हमारे अन्दर जन्म से ही विद्यमान हैं। ये चक्र हमार शारीरिक,मानसिक, भावनात्मक तथा आध्यात्मक पक्ष को नियन्त्रित करते हैं । इन सभी
चक्रों में अपनी-अपनी विशेषता होती है,सबके कार्य बंटे हुये हैं ।कुण्डलिनी के जागृत होने पर सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में फैली हुई ईश्वरीय शक्ति के साथ एकाकारिता को जिसमें हमारी आन्तरिक शक्ति अर्थात कुण्डलिनी जागृत होती है,कुण्डलिनी तथा सात ऊर्जा केन्द्र जिन्हैं चक्र कहते हैं,जो कि हमारे अन्दर जन्म से ही विद्यमान हैं। ये चक्र हमारे शारीरिक,मानसिक, भावनात्मक तथा आध्यात्मक पक्ष को नियन्त्रित करते हैं । इन सभी
चक्रों में अपनी-अपनी विशेषता होती है,सबके कार्य बंटे हुये हैं ।कुण्डलिनी के जागृत होने पर सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में फैली हुई ईश्वरीय शक्ति के साथ एकाकारिता को जिसमें हमारी आन्तरिक शक्ति अर्थात कुण्डलिनी जागृत होती है,कुण्डलिनी तथा सात ऊर्जा केन्द्र जिन्हैं चक्र कहते हैं,जो कि हमारे अन्दर जन्म से ही विद्यमान हैं। ये चक्र हमारे शारीरिक,मानसिक,भावनात्मक तथा आध्यात्मक पक्ष को नियन्त्रित करते हैं । इन सभी
चक्रों में अपनी-अपनी विशेषता होती है,सबके कार्य बंटे हुये हैं ।कुण्डलिनी के जागृत होने पर सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में फैली हुई ईश्वरीय शक्ति के साथ एकाकारिता को अंहदयोग कहते हैं ।और कुण्डलिनी के सूक्ष्म जागरण तथा अपने अन्तरनिहित खोज को (अंहदयोग)
आत्म साक्षात्कार कहते हैं। आत्म साक्षात्कार के बाद परिवर्तन स्वतः आ जाता है ।वर्तमान तनावपूर्ण तथा प्रतिस्पर्धात्मक वातावरण में भी सामज्स्य बनाना सरल हो जाता है और सुन्दर स्वास्थ्य,आनंद,शान्तिमय जीवन तथा मधुर सम्बन्ध कायम करने में सक्षम होते हैं । कहते हैं ।और कुण्डलिनी के सूक्ष्म जागरण तथा अपने अन्तरनिहित खोज को आत्म साक्षात्कार कहते हैं। आत्म साक्षात्कार के बाद परिवर्तन स्वतः आ जाता है ।वर्तमान तनावपूर्ण तथा प्रतिस्पर्धात्मक वातावरण में भी सामज्स्य बनाना सरल हो जाता है और सुन्दर स्वास्थ्य,आनंद,शान्तिमय जीवन तथा मधुर सम्बन्ध कायम करने में सक्षम होते हैं । कहते हैं ।और कुण्डलिनी के सूक्ष्म जागरण तथा अपने अन्तरनिहित खोज को आत्म साक्षात्कार कहते हैं। आत्म साक्षात्कार के बाद परिवर्तन स्वतः आ जाता है ।वर्तमान तनावपूर्ण तथा प्रतिस्पर्धात्मक वातावरण में भी सामज्स्य बनाना सरल हो जाता है और सुन्दर स्वास्थ्य,आनंद,शान्तिमय जीवन तथा मधुर सम्बन्ध कायम करने में सक्षम होते हैं । योग कहते हैं ।और कुण्डलिनी के सूक्ष्म जागरण तथा अपने अन्तरनिहित खोज को आत्म साक्षात्कार कहते हैं। आत्म साक्षात्कार के बाद परिवर्तन
स्वतः आ जाता है ।वर्तमान तनावपूर्ण तथा प्रतिस्पर्धात्मक वातावरण में भी सामज्स्य बनाना सरल हो जाता है और सुन्दर स्वास्थ्य,आनंद,शान्तिमय जीवन तथा मधुर सम्बन्ध कायम करने में सक्षम होते हैं । जीवन में परिपक्व बनने के लिए उदारता गुण होना चाहिए। इसके
लिए भौतिक चीजों से मोह त्यागना होगा,उदारता का आनन्द पाने के लिए तो कुछ देना होता
है।यदि एक बार आप उदारता का आनन्द लेने लगेंगे तो आप जान जायेंगे कि प्रेम और करुणॉ
आपसे दूसरों तक बहने लगी है,यह प्रेम और करुणॉ सभी लोगों तक फैलनी चाहिए। आत्म निरीक्षण
करें आपकी देह ही साधना का सबसे बड़ा मध्य हैं! अत: इसे अंहद योग द्वारा पूर्ण रूपेण
स्वस्थ व प्राण प्रवाह से युक्त रख़े जिससे आपका मन मनोमय कोष से हटे और मन प्राण कोष
मे प्रविष्ट हो सके ! आत्मा विजय के लिये पंच भूतो पर विजय परम् आवश्यक हैं
!
प्रकृति के दिये इस शरीर मे सब कुछ हैं जो अनन्त ब्रह्मांड मे माजूद हैं बस हमे अपनी
अंहद की ख़ोज का दायरा बढ़ाना होगा इस देह के अंहद मे सात द्वीपों के सहित सुमेरु पर्वत
, सरिता, सागर,पर्वत क्षेत्र, क्षेत्रपाल,ऋषि मुनि,सभी ग्रह, नक्षत्र, आकाश गंगा,पुण्यै
तीर्थ व पीठ,पीठ देवता,सभी विद्यमान हैं सूर्य-चन्द्र आदि आदि इस देह के अंहद सदा सदा
ही विद्यमान रहते हैं तीनो लोको के सभी प्राणी शरीरस्थ सुमेरु के आश्रय मे हुये अपने
अपने व्यवहार मे प्रवर्त रहते हैं यह जाने का मार्ग अंहद योग ही हैं,निसंदेह आप उदार
बन सकते हो। उदार विवेक आपमें तभी आयेगा जब आप अपने जीन का लक्ष्य जान जान जायेंगे
और यह जानेंगे कि आप किसलिए हैं।
अंहदयोग का महत्व:-
वर्तमान समय में अपनी व्यस्त जीवन शैली कारण लोग सतोष पाने
के लिए
अंहद योग करते हैं।अंहदयोग से न व्यक्ति का तनाव दूर होता है बल्कि मन और मस्तिष्क
को भी शांति मिलती है।
अंहदयोग बहुत ही लाभकारी है।
अंहदयोग न केवल हमारे दिमाग, मस्तिष्क को ही ताकत पहुंचाता है बल्कि हमारी
आत्मा को भी शुद्ध करता है। आज बहुत से लोग मोटापे से परेशान हैं, उनके लिए
अंहद योग बहुत ही फायदेमंद है।
अंहदयोग के फायदे से आज सभी जानते है, जिस वजह से आज
अंहदयोग विदेशों में भी प्रसिद्ध है
आत्मसाक्षात्कार प्राप्त करने के पश्र्चात् मनुष्य अपनी आत्मा से एकाकारिता प्राप्त
कर आत्मस्वरूप चेतन को महसूस करता है