'''अनहदयोग:'''
''अपने आप अपने को जानना (ईशवर को पाना) ही अनहद योग है! सच भीतर ईश्वर है पर उनका कोई नाम नही...
भीतरिय ईश्वर की सच मे कोई पहचान नही....
नाम और पहचान आपको देनी है क्योकि वह
आपका अपना निजि ईश्वर है उनके आनन्द का
अनुभव आप का निजि आनन्द है न आप दिखा सकतै है न ही अनुभव करा सकतै है''
वैसे ही जैसे गूँगा व्यक्ति दूसरे को गुड़ का स्वाद नही बता सकता
अनुभव ही ब्रह्म से मिला सकता है अनुभव हीनता भ्रम मे ले जायेगी !
अनहद अनहद का अर्थ है:- जिसका कोई हद न हो। अर्थात् जिसकी कोई सीमा न हो। यही कारण है कि अनहद शब्द का प्रयोग ब्रह्म या ईश्वर के लिए एक विशेषण के रूप में अनेक स्थानों पर किया जाता है।पर मेरी नज़र में अनहद की सीमा है और केवल योगी योग के माध्यम से अनहद को समझ सकता है वो ब्रहमांड जिसकी कोई हद नही..पर येागी उस ब्रहमांड को सिमित दायरे मे. ला सकते है यु तो वेद पुराण साक्षी है कि ब्रहमांड देह में ही बसता है यही नही देह मे करोडो ब्रहमांड बसते है तो योगी योग के माध्य से ब्रहमांड को चैतन कर सकता है चैतन ब्रहमांड ही ब्रह्म का ईश्वर साकार रूप है अनहद. अनहद का अर्थ है वह जो हमारे हद में है पर उसका रास्ता बाहर से नही अंदर से है वहा अंहद है वही सहज है वही चैतन जगत है वही ईशवर का रास्ता है बिना किसी आघात के दिव्य प्रकृति के अन्तराल से जो ध्वनियाँ उत्पन्न होती हैं, उन्हें 'अनाहत' या 'अनहद' कहते हैं।
-'''अनहदयोग''' एक आसान पद्धति है जिसे सीख कर हर इन्सान हर जगह व हर कार्य व अपने जीवन में इससे अपने आप को अच्छा कर सकता है व दूसरो की बुराइओ को दूर कर सकता हैं | वह समाज को पतन की तरफ जाते हुए उसे ऊपर उठा सकता है | यह बहुत आसान प्रक्रिया हैं जिसे प्रयोग में लाकर स्वास्थ्य अच्छा रख सकते है व बच्चो की स्मरण शक्ति को बढ़ा सकते हैं, तथा बच्चो को बचपन में चश्मे चढ़े हुए को उतार सकते है, बुजुर्गो को परेशानियो से बचा सकते है अपमान से बचा सकते है
अनहदयोग आत्मज्ञान को प्राप्त करने की अत्यंत सरल सुलभ और सहज ध्यान पद्धति है। यह परमात्मा की सर्वव्यापक शक्ति से जु़ड़ने का सरल एवं सिद्ध मार्ग है। अनहदयोग आत्म साक्षात्कार कर परमात्मा को जानने की सरल विधा सीखी।
अधिकतर लोग जानते हैं कि परमात्मा का वास मनुष्य के भीतर है, लेकिन बहुत कम लोगों ने इसका अनुभव किया है। परमात्मा की सर्वव्यापकता शक्ति का प्रतिबिम्ब कुंडलिनी के रूप में हर व्यक्ति की रीढ़ की हड्डी के निचले छोर पर स्थित पवित्र त्रिकोणकार अस्थि में सुप्तावस्था में विद्यमान है।
इस ईश्वरीय शक्ति के जागृत होने पर मानव के सृजनात्मक व्यक्तित्व व उत्तम स्वास्थ्य का विकास होने लगता है और उसकी अंतर्जात प्रतिभा खिल उठती है। उस पर परमात्मा की कृपा बरसने लगती है। मनुष्य तनाव रहित जीवन, निःस्वार्थ प्रेम एवं आनंद की स्थिति में स्थापित होने लगता है।
अनहदयोग में लाभ के नियमित अभ्यास से कैंसर, ब्लड प्रेशर, हाइपर टेंशन और हृदय के रोगियों को भी लाभ हुआ है। अनहदयोग भारत की एक अत्यंत पुरातन साधनाओंमेंसे एक ध्यान प्रणाली विधि है। जिसका अर्थ जो जैसा है, उसे ठीक वैसा ही देखना-समझना है।
''अपने आप अपने को जानना (ईशवर को पाना) ही अनहद योग है! सच भीतर ईश्वर है पर उनका कोई नाम नही...
भीतरिय ईश्वर की सच मे कोई पहचान नही....
नाम और पहचान आपको देनी है क्योकि वह
आपका अपना निजि ईश्वर है उनके आनन्द का
अनुभव आप का निजि आनन्द है न आप दिखा सकतै है न ही अनुभव करा सकतै है''
वैसे ही जैसे गूँगा व्यक्ति दूसरे को गुड़ का स्वाद नही बता सकता
अनुभव ही ब्रह्म से मिला सकता है अनुभव हीनता भ्रम मे ले जायेगी !
अनहद अनहद का अर्थ है:- जिसका कोई हद न हो। अर्थात् जिसकी कोई सीमा न हो। यही कारण है कि अनहद शब्द का प्रयोग ब्रह्म या ईश्वर के लिए एक विशेषण के रूप में अनेक स्थानों पर किया जाता है।पर मेरी नज़र में अनहद की सीमा है और केवल योगी योग के माध्यम से अनहद को समझ सकता है वो ब्रहमांड जिसकी कोई हद नही..पर येागी उस ब्रहमांड को सिमित दायरे मे. ला सकते है यु तो वेद पुराण साक्षी है कि ब्रहमांड देह में ही बसता है यही नही देह मे करोडो ब्रहमांड बसते है तो योगी योग के माध्य से ब्रहमांड को चैतन कर सकता है चैतन ब्रहमांड ही ब्रह्म का ईश्वर साकार रूप है अनहद. अनहद का अर्थ है वह जो हमारे हद में है पर उसका रास्ता बाहर से नही अंदर से है वहा अंहद है वही सहज है वही चैतन जगत है वही ईशवर का रास्ता है बिना किसी आघात के दिव्य प्रकृति के अन्तराल से जो ध्वनियाँ उत्पन्न होती हैं, उन्हें 'अनाहत' या 'अनहद' कहते हैं।
-'''अनहदयोग''' एक आसान पद्धति है जिसे सीख कर हर इन्सान हर जगह व हर कार्य व अपने जीवन में इससे अपने आप को अच्छा कर सकता है व दूसरो की बुराइओ को दूर कर सकता हैं | वह समाज को पतन की तरफ जाते हुए उसे ऊपर उठा सकता है | यह बहुत आसान प्रक्रिया हैं जिसे प्रयोग में लाकर स्वास्थ्य अच्छा रख सकते है व बच्चो की स्मरण शक्ति को बढ़ा सकते हैं, तथा बच्चो को बचपन में चश्मे चढ़े हुए को उतार सकते है, बुजुर्गो को परेशानियो से बचा सकते है अपमान से बचा सकते है
अनहदयोग आत्मज्ञान को प्राप्त करने की अत्यंत सरल सुलभ और सहज ध्यान पद्धति है। यह परमात्मा की सर्वव्यापक शक्ति से जु़ड़ने का सरल एवं सिद्ध मार्ग है। अनहदयोग आत्म साक्षात्कार कर परमात्मा को जानने की सरल विधा सीखी।
अधिकतर लोग जानते हैं कि परमात्मा का वास मनुष्य के भीतर है, लेकिन बहुत कम लोगों ने इसका अनुभव किया है। परमात्मा की सर्वव्यापकता शक्ति का प्रतिबिम्ब कुंडलिनी के रूप में हर व्यक्ति की रीढ़ की हड्डी के निचले छोर पर स्थित पवित्र त्रिकोणकार अस्थि में सुप्तावस्था में विद्यमान है।
इस ईश्वरीय शक्ति के जागृत होने पर मानव के सृजनात्मक व्यक्तित्व व उत्तम स्वास्थ्य का विकास होने लगता है और उसकी अंतर्जात प्रतिभा खिल उठती है। उस पर परमात्मा की कृपा बरसने लगती है। मनुष्य तनाव रहित जीवन, निःस्वार्थ प्रेम एवं आनंद की स्थिति में स्थापित होने लगता है।
अनहदयोग में लाभ के नियमित अभ्यास से कैंसर, ब्लड प्रेशर, हाइपर टेंशन और हृदय के रोगियों को भी लाभ हुआ है। अनहदयोग भारत की एक अत्यंत पुरातन साधनाओंमेंसे एक ध्यान प्रणाली विधि है। जिसका अर्थ जो जैसा है, उसे ठीक वैसा ही देखना-समझना है।

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