स सच भीतर ईश्वर है पर उनका कोई नाम नही...
भीतरिय ईश्वर की सच मे कोई पहचान नही...
नाम और पहचान आपको देनी है क्योकि वह
आपका अपना निजि ईश्वर है उनके आनन्द का
अनुभव आप का निजि आनन्द है न आप दिखा सकतै है न ही अनुभव करा सकतै है
वैसे ही जैसे गूँगा व्यक्ति दूसरे को गुड़ का स्वाद नही बता सकता
अनुभव ही ब्रह्म से मिला सकता है अनुभव हीनता भ्रम मे ले जायेगी
भीतरिय ईश्वर की सच मे कोई पहचान नही...
नाम और पहचान आपको देनी है क्योकि वह
आपका अपना निजि ईश्वर है उनके आनन्द का
अनुभव आप का निजि आनन्द है न आप दिखा सकतै है न ही अनुभव करा सकतै है
वैसे ही जैसे गूँगा व्यक्ति दूसरे को गुड़ का स्वाद नही बता सकता
अनुभव ही ब्रह्म से मिला सकता है अनुभव हीनता भ्रम मे ले जायेगी

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