Wednesday, November 6, 2024

मानस जाप अनहद जागृति

शिव: शक्तया युक्तो यदि भवति शक्त: प्रभावितं
न सीदेवं देवो न खलु कुशल: स्पंदितुमपि ।
अतस्त्वामाराद्यं हरिहरवीर्यंकादिभिरपि
प्राणन्तुं स्तोतुम् वा कथाकृतपुण्यः प्रभावति ।।
जब तुम मानस जाप करते हो तो विचार ज्यादा तेजी से पैदा होते हैं। मन इस प्रकार के काम से छटपटाएगा ही। 
मन से जाप का तरीका ये है कि शरीर में किसी प्रकार का स्पंदन न हो, होंठ नहीं हिलेंगे, कंठ में हलचल नहीं होना चाहिए, जिह्वा में किसी प्रकार का बेचैनी नहीं होनी चाहिए। ये थोड़े से अभ्यास से आ जाएगा। 
इस तरीका से यदि तुमने पंद्रह दिन भी मंत्र जाप कर लिया तो मंत्र तुम्हें अपने ही सामने से एक-एक शब्द गति करता हुआ दिखेगा। तुम्हें ये साफ एहसास होगा तुम जाप नहीं बल्कि मंत्र का एक-एक शब्द तुम्हारे सामने से गुजर रहा है। ये बिल्कुल अनुभव सिद्ध प्रक्रिया है। हमारे अनुभव से निकली हुई प्रक्रिया है। 
लेकिन इसे जब भी करें सुबह ही करें, स्वस्थ वातावरण में करें, आसानी होगी । ये ध्यान और योग की एक कंबाइन प्रक्रिया है। विपश्यना में श्वांस को देखना होता है। आपको मंत्र देखना नहीं है। जहां और जिस मन में विचार चल रहा है उस जगह पर मंत्र को चलाएं। विचार की जगह मंत्र को चलाएं । मंत्र के एक-एक शब्द को साफ उच्चारित होने दें। जीभ पर जोर नहीं पड़ना चाहिए । मस्तिष्क और शरीर किसी पर जोर नहीं पड़ना चाहिए, सब कुछ सामान्य गति से होने दें ।
मंत्र के करने में जब तक रिदम नहीं है। तो आपकी सारी मेहनत व्यर्थ हो जाती है। जैसे संगीत में एक प्रवाह होता है।बस ऐसे ही मंत्र करना होता है। संगीत सभी ने सुना होगा ध्वनि और विश्राम का तालमेल है। मंत्र भी ऐसा ही है। किस शब्द का कितना उच्चारण, कहां और कैसे विश्राम। वैसे तो आप इसे चलते फिरते कर सकते हैं। पर ऐसा न करें। क्योंकि आदत बन जाए तो विचार अन्यत्र मार्ग ढूँढने लगते हैं। छोटे अभ्यास से आदत बनाएं। गलतियाँ न करें । मंत्र, तंत्र में एक गलती भी पूरा जीवन तबाह कर सकती है। 
इसलिए मंत्र करने से पहले मंत्र कैसे किया जाए इसकी सही जानकारी का ठीक अभ्यास होना ही चाहिए। इसे किसी जाप करने वाले ब्राह्मण से मार्गदर्शन ले सकते हैं। मंत्र करने से पहले खुद को शारीरिक और मानसिक रूप से तैयार करें।
मंत्र में आपने देखा होगा ध्यान, आवाहन, आसन, पूजन यही सब होता है। आपको किसी को निमंत्रण भेजना है तो सबसे पहले उस व्यक्ति को दिमाग में लाया जाता है कि उनको आमंत्रित करते हैं। सम्मान उस स्तर का जिस स्तर का व्यक्ति है। ये है उस मंत्र के देवता का ध्यान। फिर आमंत्रण के लिए निवेदन पत्र लिखा है। ये है मंत्र के देवता का आवाहन। अब वो व्यक्ति हमारे घर आ गया। तो सबसे पहले उसे बैठने को कुर्सी जो कुछ भी है देते हैं। इसे ही आसन कहा जाता है। अब व्यक्ति हमारे घर आ गया तो उसका आदर सत्कार भी करते हैं, सबसे पहले नमस्कार से शुरू । अब मंत्र का देवता आसन पर विराज गया तो फिर उसका पूजन। पुष्प समर्पयामि, नैवद्यम समर्पयामि और भी जो कुछ सामग्री है उसे भेंट करते हैं। इसके बाद मंत्र जाप। बस सब कुछ वैसा ही हाँ जैसा हम अपने घर में करते हैं। ये किसी परम श्रद्धेय का आमंत्रण है।
अगर करने का मन ही बना लिया है तो पहले उसकी व्यवस्थित तैयारी करें । शारीरिक और मानसिक दोनों ही तैयारी जरूरी है। तंत्र में रात्रि कालीन जाप होते है। रात्रि 10 के बाद से सुबह चार बजे तक, आप अंदाज लगा सकते है कितना शारीरिक और मानसिक तैयारी की जरूरत होती है। बहुत से लोग सोचते हैं एक बार कर लेते हैं फिर जिंदगी भर बैठकर खाएंगे।ऐसी सोच लेकर साधना में न उतरें। कभी हित होने वाला नहीं है। दूसरों को देखकर प्रभावित होने की जरूरत नहीं है। बैराग वृत्ति से सब कुछ सफल है और आसक्ति तुम्हें गर्त में ही ले जाएगी। 
जब बहुत परेशानी में हों खुद मंत्र न करें। किसी से बदला लेने के ले लिए मंत्र न करें ईश्वर पर भरोसा रखें । गलत चीजों के परिणाम भी गलत ही होते हैं।.

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