आध्यात्मिक यात्रा , धन और अकेलापन :--
जब कोई व्यक्ति भीतर की यात्रा पर होता है आत्मिक स्तर पर जीने की शुरुआत करता है तब बहुत बदलाव उसके शरीर और बुद्धि पर होने लगते हैं ! भौतिक संसार व भौतिक सुख से उसका मन दूर होने लगता है ! वो अपने भीतर खोया रहना चाहता है जिससे वह ऐसा कुछ नही करना चाहता कि स्वयं को अपग्रेड कर सके माने धन संपत्ति बढ़ाए जैसे कि यदि बहुत धन कमाने की बात करें तो आध्यात्मिक दुनिया में जाने पर बहुत से लोग या सोच बना सकते हैं अधिक धनोपार्जन का क्या करना है , उनको जो "सुख" अधिक धन कमाकर चीजों को खरीदने से मिलेगा वह तो अध्यात्मिकता में जाने पर अभी ही महसूस कर रहे हैं किंतु यही सोच अधूरी ही सच है !
यदि अधिक धन कमा सकते हैं तो कमाना चाहिए यह बात अलग है कि यदि अधिक धन की इच्छा नहीं तो कोई बात नही यह धन उनपर खर्च कर सकते हैं जो पैसा कमाने में सफल नहीं हो पा रहे ! क्योंकि ऐसा करके भी आप दूसरों का जीवन सुधारने में अपना योग दान कर रहे हैं यदि धन नहीं होगा तो कैसे किसी के सहायक बनेंगे ?? सोचो "भला इससे बड़ा पुण्य कार्य और क्या हो सकता है" ??
आप इस भौतिक संसार को पूरी तरह नकार नहीं सकते माना आपकी बुद्धि और चेतना दोनों ही तीसरे आयाम से ऊपर की चीज हैं ! ""किंतु इन दोनों को जो "शरीर" सम्हाल कर चल रहा है वो " तीसरे आयाम और भौतिक संसार" से जुड़ा है ! यह शरीर इस भौतिक संसार की भाषा को ही जानता है इसीलिए इसे यहीं की चीजें पसंद आती हैं ! अतः यदि आपके माइंड में भी कुछ इस तरह के विचार आने लगें कि भौतिक संसार व्यर्थ की चीज है तो आपको अभी इस तरह के विचारों को बदल देने की जरूरत है !
*भौतिक संसार भी आध्यात्मिक संसार की भांति बहुत आवश्यक है क्योंकि बिना भौतिक जरूरतों को पूरा किए आप अध्यात्म की दुनिया में सही से प्रवेश नही कर पाएंगे ! आपको ये उपरोक्त विचार आश्चर्य से लगेंगे किंतु यह नीम सा सच है !*
इसलिए आपको इन दोनो में से किसी एक को चुनने की जरूरत नहीं अपितु दोनों संसार को एक साथ अपनाने की जरूरत है ! एक दूसरे संसार के कीमती नियमों को एक दूसरे संसार में सफलता प्राप्त करने की जरूरत है ! जैसे आत्मिक यात्रा में जाने के बाद ज्ञात होता है विचार कितने शक्तिशाली हैं और आप चाहे तो इसको कई बार परीक्षण भी करके भी देख सकते हैं और इसको सीखने के बाद इसी तरह के विचारों को आप भौतिक संसार में भी इस्तेमाल कर सकते हैं जिससे कि आपकी सफलता बहुत पहले ही निश्चित हो जाती है बस उसमें एक समय की दूरी होती है !
जब कोई भीतर की यात्रा में बहुत गहरे से जाने लगता है तब वह स्वयं को सबसे बड़ा आलसी महसूस करने लगता है ! जबकि उसकी आत्मा और बुद्धि बिल्कुल स्पष्ट बता देते हैं कि यदि वह कोई कार्य करेगा तो परिणाम क्या होंगे फिर भी वह आलसी बना रहता है इस तरह वो भीतरी यात्रा में जाने का भी लाभ नहीं उठा पता है !
भीतर की यात्रा में जाने का सबसे बड़े लाभ में से एक यही है कि आपको इसमें जाने के बाद किसी भी कार्य को करने के पूरे के पूरे "ब्लूप्रिंट" मिल जाते हैं कि कोई कार्य कैसे सफलता पूर्वक पूर्ण किया जा सकता है ! लोग ब्लूप्रिंट को अपने माइंड में सोच सोचकर प्रसन्न होते रहते हैं कि वो जो भी करना चाहते हैं उसे जब चाहे तब कर सकते हैं हैं और इसी कारण आलसी बने रहते हैं ! यदि आपके साथ भी ऐसा ही हो रहा है तो अपने ब्लूप्रिंट को साकार करने के लिए अपने शरीर और बुद्धि को पुनः से तैयार कीजिए और अपने कार्य पर लग जाइए !
चूंकि अक्सर हमारा माइंड ही यहां पर गेम खेल रहा होता है और लोगों को बस कल्पनाओं में खोए रखता है जिसमें वे बहुत सी अलग-अलग तरह की कल्पनाएं करते रहते हैं ! अब जबकि आपको कल्पना करने की जरूरत तो है किंतु रोज-रोज अलग-अलग तरह की नहीं ! बस आप अपने आप को एक ही तरह की कल्पना पर रोकना सीख लो और फिर देखो कैसे यही आपका दिमाग खुद के ही जल में फंस जाएगा और आपका सोचा गया कार्य इसकी गलती से सही किंतु पूरा अवश्य होगा !
जब कोई व्यक्ति भीतर की यात्रा में गहरे से जाता है तब वह स्वयं को दूसरों से अकेला सा महसूस करने लगता है और कभी-कभी तो बहुत ही ज्यादा स्वयं को अकेला महसूस करता है ! अकेलापन भी दो तरह का होता है ! एक तो अकेलापन भीतरी यात्रा के कारण किसी को तब तक महसूस होता है जब तक कोई व्यक्ति पूरी तरह से अध्यात्मिकता में नहीं चला जाता एवं यहां के सभी नियम नहीं सीख जाता ! इसी कारण जब भी किसी को अकेलापन महसूस होता है वह इस समय बहुत सी नई-नई चीज रोजाना सीखना जाता है पर परेशान- दुखी नहीं होता !
जब वह उतना सबकुछ सीख जाता है जितना उसके लिए पर्याप्त होता है तब उसका संबंध इस दुनिया के लोगों से ही नहीं अपितु दुनिया की हर चीज से "जोड़" दिया जाता है आप इसको ऐसे कहा सकते हो ऐसे व्यक्ति का संबंध इस दुनिया के हर जीव से अपने आप ही जुड़ जाता है ! जब ऐसा किसी के साथ हो जाता है तो तभी उसका अकेलापन किसी भीड़ से भी अधिक अच्छा होता है !
दूसरे अकेलापन वह होता है जिसमें कोई किसी से इसलिए नहीं मिलना चाहता है क्योंकि उसे दूसरों में कोई भी दिलचस्पी नहीं लेकिन इस समय ऐसा व्यक्ति स्वयं में भी दिलचस्पी नहीं ले रहा होता जिससे वह बहुत सी चीजों के लिए मन ही मन असहज होने लगता है ! यदि ऐसा किसी के साथ हो रहा है तो आप समझ सकते हैं कि ऐसा किसी नेगेटिव सोच विचार के कारण भी हो जाता है इसमें आध्यात्मिकता का कोई हाथ नहीं इसलिए आपको यह समझना भी बहुत आवश्यक है !
यदि उपरोक्त सभी बातों को सोचा विचार जाए तो जब भी किसी व्यक्ति की आत्मिक ग्रोथ शुरू होती है तो उसके अंदर बहुत से बदलाव कर देती है जिसका स्वयं उस व्यक्ति को भी विश्वास नहीं होता है जो कि सारे के सारे पॉजिटिव होते हैं ! लेकिन यदि आपको लगता है कि भीतर की यात्रा से आपके भीतर किसी तरह की नेगेटिविटी चल रही है तो आप समझ सकते हैं कि आपने अपनी आत्मा की पावर का गलत उपयोग कर लिया जिसको यदि आप खोजोगे तो पाओगे कि इसमें आपके माइंड और उसमे चल रहे निगेटिव विचार ही शामिल मिलेंगे ! इसलिए आपको अपने विचारों पर भी आपको थोड़ा अधिक ध्यान देने की जरूरत है क्योंकि आप जो जो भी विचार सोच रहे हो उसका आपके जीवन में बहुत बड़ा योगदान होता है !
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